क्या बातें करें अध्यात्म की हम ?

 जीवन के अंतिम पड़ाव में अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा में बैठे लोग ही अध्यात्म में रूचि लेते हैं क्योंकि अब कुछ और करने लायक रह ही नहीं गये | नाती-पोते हो गये, गंभीरता दिखानी ज़रूरी हो गयी नहीं तो समाज क्या कहेगा… आदि इत्यादि |

युवाओं के पास अपना दुःख है | नौकरी के लिए पढाई की थी, लेकिन नौकरी है कि मिल नहीं रही | मनपसन्द नौकरी तो दूर, चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल पा रही इंजीनियरिंग करने के बाद भी | तो उनका गुस्सा अपनी जगह है क्योंकि उनको लगता है कि उनको गलत दिशा में दौड़ा दिया गया और अब लौटने का कोई रास्ता ही नहीं है | अब वे बचपन में वापस नहीं लौट सकते और समाज और सरकार अपनी ही दुनिया में खोई हुई है | उनकी समझ में नहीं आता कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए |

कई युवा मुझे बताते हैं जिनमें लड़कियां अधिक हैं कि पढ़ाई पूरी कर ली लेकिन अब समझ में नहीं आ रहा कुछ भी | सरकारी नौकरी चाहिए लेकिन कब मिलेगी कैसे मिलेगी समझ में नहीं आ रहा… डिप्रेशन बढ़ता जा रहा है और कई बार आत्महत्या करने का मन करता है…….
अब ऐसे लोगों को फेसबुक एक ऐसा माध्यम मिल गया जिसमें वे अपने उस गुस्से को निकालते हैं सेकुलरों को गालियाँ देकर या फिर किसी भी पोस्ट में जाकर उल्टियाँ करके | कुछ लोग उन नेताओं के साथ खड़े हो जाते हैं जो मारकाट की बातें करते हैं, कब्रों से निकालकर महिलाओं से बलात्कार करने को कहते हैं | इन युवाओं को लगता है कि यही नेता हमें बदला लेने का अवसर देगा उस समाज से जिसने हमें गुमराह किया | हमें ऐसे रास्ते पर दौड़ा दिया जहां से हम वापस अब नहीं लौट सकते | हम भूल ही गये कि हम दुनिया में क्यों आये थे, हम वास्तव में हैं कौन….. | ऐसे युवा स्वयं के आस्तित्व को महत्वहीन मानने लगते हैं और नेताओं को अपना चेहरा | मुखौटा लगाकर घूमते हैं क्योंकि अपनी शक्ल से नफरत हो जाती है |

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सोचा था कि अध्यात्म पर चर्चा किया करूँगा, लेकिन अध्यात्म तो अब मात्र मुर्ख बनाने का माध्यम मात्र रह गया है | हजारों वर्षो से लोग अध्यात्म सिखा रहे हैं, भक्ति सिखा रहे हैं, मन्त्रों और कर्मकांडों के महत्व समझा रहे हैं… लेकिन मानव जाति नीचे ही गिरती जा रही है | क्योंकि कुछ लोग मानवों को भेड़-बकरी बनाने में जुटे हुए हैं धर्म और अध्यात्म के नाम पर और कुछ लोग उन भेड़ों-बकरियों को अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा के लिए दंगों आदि की भेंट चढ़ा रहे हैं | उनको कमाने में लगा रखा है १२ घंटे की नौकरी में | वे बेचारे न देश के लिए कुछ सोच पाते हैं और न ही समाज के लिए | ऐसे में अध्यात्म और ये धर्म के नाम से लोगों को उकसाया जाता है ताकि देश में अशांति व अराजकता का माहौल बना रहे | मुख्य मुद्दों पर को बात न करे, उन विषयों पर कोई सवाल न करे जिनके नाम पर सरकार या नेता सत्ता पर आते हैं | आप लोगों ने देखा ही होगा कि जो मुद्दे नेताओं के समर्थक चुनावी मौसम में उछालते हैं और रात दिन एक करके बताते हैं कि हमारा नेता आएगा तो इन सब समस्याओं से मुक्ति मिल जायेगी वह भी सौ दिनों के अंदर… वे ही समर्थक गधे के सर से सींग की तरह गया हो जाते हैं चुनावों के बाद | और फिर मुद्दे उछलते हैं कुछ और…. वे मुद्दे बिलकुल भी गायब कर दिए जाते हैं | फिर सांसद और नेता भी ऐसे ऐसे बयान देना शुरू करते हैं कि लगता है कि इन लोगों को संसद तक भेजने वाला ही मुर्ख होगा |

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इसलिए मैंने अब अध्यात्मिक विषयों को रोक कर उन विषयों पर लोगों को आकर्षित करना शुरू किया, जिनसे सामान्यतः आध्यात्मिक लोग परहेज करते हैं | मेरा मानना है कि आध्यात्म का अर्थ बेहोशी या अफीम की पिनक में रहना नहीं है, बल्कि अध्यात्म पूर्ण जागरूकता लाता है समाज, राष्ट्र व मानवता के प्रति | जो खाते पीते घर के हैं उनको कोई फर्क नहीं पड़ेगा देश के नेता कुछ भी करें, लेकिन जो आदिवासी हैं, किसान हैं, जो नौकरी-पेशा हैं, मजदूर हैं…. उनकी जिन्दगी तो प्रभावित होती ही है | एक अध्यात्मिक रूप से जागृत व्यक्ति को इन विषयों पर स्वतः ही ध्यान देना चाहिए यही आध्यात्मिक ज्ञान का सदुपयोग है | उन युवाओं को सही मार्ग दिखाना चाहिए आध्यात्मिक गुरुओं को जो आज क्रोध और नफरत से भरे हुए हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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