जरा सोचिये अर्जुन कर्ण क्यों नहीं बना और कर्ण कृष्ण क्यों नहीं बना ?

यह युग पढ़े लिखों का युग है और हर कोई पुस्तक में जैसे उदाहरण दिए गये होते हैं वैसा ही बनना या दिखना चाहता है | पहले भरे पूरे जिस्म की लड़कियों को सुन्दर माना जाता था और अब कंकालों को सुन्दर माना जाता है | तब लड़कियां खाने पीने को महत्व देती थीं और नए नए व्यंजन बनाना सीखतीं थी, लेकिन अब डायटिंग को महत्व दिया जाता है और लड़कियां उन रेस्टोरेंट का फोन नंबर और पता रखती हैं जहाँ लो केलोरी फ़ूड मिलता है |

लेकिन क्या ये लोग वही हैं जो ये हैं ?


मेरा मानना है कि ये लोग वह नहीं हैं जो होने को आये थे, ये वे लोग हैं जो मोल्ड हो गये दूसरों के कहने पर और स्वयं को मिटा दिए | भूल गये की क्यों आये थे दुनिया में और ईश्वर उसे क्या बनाया था | लोग तो अब लिंग भी बदल लेते हैं |

जरा सोचिये अर्जुन कर्ण क्यों नहीं बना और कर्ण कृष्ण क्यों नहीं बना ?

क्योंकि वे लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे | उनके माँ बाप भी अंग्रेजी नहीं जानते थे, इसलिए वे उनको यह नहीं कह पाए कि वह मत मत बनो जो बनने के लिए आये हो, वह बनो जो दूसरे बन चुके हैं |

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है की कोई किसी को कुछ बना सकता है | कई स्कूल ऐसा दावा अवश्य करते है कि उनके स्कूल में गधे को भी घोड़ा बनाया जाता है | लेकिन वास्तव में वे केवल घोड़ों को ही चुनते हैं इंटरव्यू में | कुछ स्कूलों में तो माँ-बाप को इंटरव्यू पास करना होता है, तब जाकर बच्चे को दाखिला मिलता है | लेकिन ऐसे स्कूल केवल कोकाकोला की बोतलें तैयार करते हैं यह अच्छे नौकर, न कि वास्तविक मानव | वे तो केवल इस बात के विशेषज्ञ होते हैं कि कैसे बच्चों के पूर्वजन्म के संस्कारों को दबा कर गुलाम मानसिकता थोपी जाए | ताकि वे एक अच्छे नौकर सिद्ध हो पायें और जितना अच्छा नौकर होगा उतना ही अच्छी सेलेरी मिलेगी उसे |

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तो यदि हम अपनी वर्तमान स्थिति को देखें तो अधिकाँश यही कहेंगे कि वे वह नहीं हैं जो वे होना चाहते थे | जो भी वे हैं, वे थोपी गयी है | मैं आपसे कभी नहीं कहूँगा कि आपको किसकी तरह होना चाहिए और न ही कभी आप से यह कहूँगा कि मेरे पीछे चलिए या मेरी नकल कीजिये | मैं आपसे यह भी नहीं कहूँगा कि आप किसे मानिये और किसे नहीं | क्योंकि मैं जानता हूँ कि झील, तालाब या कुँए को आप सागर मानते हैं तो मेरे कहने से आप अपनी मान्यता नहीं बदल लेंगे | आपकी मान्यता उस दिन बदलेगी जिस दिन वास्तविक सागर को आप देख लेंगे | अभी तो आप पढ़े-लिखे हैं बड़ी बड़ी डिग्रियाँ हैं और सभी में लिखा है कि सागर केवल एक भ्रम है मिथ्या है | अभी स्वयं को जानने की बात कहता हूँ तो वह भी केवल पागलपन लगता है कुछ लोगों को और मुझे वेद और पुराण पढ़ने की सलाह देते हैं और कुछ अपने अपने संगठन और गुरुओं से मिलने की सलाह देते हैं | उनको लगता है कि मैं पागल हो गया हूँ और बहकी बहकी बातें कर रहा हूँ | कुछ मुझे रामदेव जी से मिलने के लिए कहते हैं तो कुछ ब्रम्हज्ञानियों से |

चलिए बातों बातों में ध्यान आया कि मेरा आश्रम विश्वशांति के मिशन के साथ शुरू हुआ था जिसकी आधार शिलाशिला ठाकुर दयानंद देव जी 1909 में रखी थी | विवेकानंद जी स्वयम उनसे मिलने आये थे और उनके विश्वशांति अभियान की सराहना भी की थी | वे भी किसी हिंदूवादी संगठनों या सभाओं से दूर रहा करते थे….. इसलिए यदि कोई सज्जन अपने अपने धर्म के श्रेष्ठ ग्रन्थ जिसे वे समझते हैं कि मुझे या पढ़ना चाहिए या मेरे आश्रम में रहना चाहिए रेफेरेंस के लिए, तो वे भेंट कर सकते हैं | पुरानी पुस्तकें भी भेज सकते हैं और किसी भी धर्म या सम्प्रदाय की भेज सकते हैं | अभी आश्रम इस योग्य नहीं है की पुस्तकों पर व्यय कर सके लेकिन भविष्य
में एक सर्वधर्म लाइब्रेरी अवश्य बनाई जा सकती है जहाँ सभी धर्मो और मान्यताओं के लोग एक दूसरे के धर्मग्रंथों को पढ़ व समझ सकें व आपस में चर्चा कर सकें | क्योंकि जब लोग समझेंगे नहीं श्रेष्ठ भारत नहीं बन सकता और न ही सम्मान कर पायेंगे एक दूसरे की मान्यताओं और संस्कृतियों की | धार्मिक या साम्प्रदायिक होने के लिए तो किसी भी बाड़े में कूद जाओ यानि धर्म परिवर्तन कर लो और हो गये धार्मिक | लेकिन मानव बनने के लिए सागर को जानना पड़ेगा और उसके लिए बाड़े से बाहर आना होगा |
~विशुद्ध चैतन्य

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