आज राम का धनुष, शिव का त्रिशूल… आदर्श बन गया क्योंकि अब श्रृद्धा व भक्ति का उद्देश्य बदल गया

ब्राह्मण होने का अर्थ होता था कि वह समाज को ज्ञान व आध्यात्म की शिक्षा देगा | वह नैतिकता व कर्तव्यों के प्रति समाज को सजग करेगा | बचपन में जब मैं अ अनार क कबूतर और ब बामन पढ़ता था तब बामन के हाथ में कोई किताब होता था कुल्हाड़ी नहीं |

लेकिन आज बामन यानि परशुराम और कुल्हाड़ी है | क्योंकि अब बामन शिक्षा से दूर हो चुका है और अब तो बाकायदा कॉन्ट्रैक्ट किलर का पेशा भी अपनाने
लगे हैं कुछ | हमारे देवघर में ही कुछ महीने पहले ब्राहमणों के बच्चों ने की बैद्यनाथ मंदिर के पास ही एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी | मेरे आश्रम के सामने ही तीर्थयात्रियों को लूट कर तमंचे से गोली चलाकर घायल करके हवा में तमंचा लहराते निकल गये……
तो इस चित्र को जिसने भी अपना प्रोफाइल पिक बनाया होगा, वह किसी प्रकार का ब्राह्मण होगा आप समझ ही सकते हैं | परशुराम की तपस्या, अपने पिता के प्रति भक्ति और माँ, भाइयों से प्रेम व किसी के क्रोध को शांत करने के लिए स्वयं मातृहत्या का पाप ले लेने का दुस्साहस करने वाले परशुराम का वह गुण इनको नहीं दिखा लेकिन फरसा और उनका क्रोध को आदर्श बना लिया |

एक बार उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदान स्वरूप उनका जीवित होना माँगा। परशुराम के पिता ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान माँगे-

  1. माँ पुनर्जीवित हो जायँ,
  2. उन्हें मरने की स्मृति न रहे,
  3. भाई चेतना-युक्त हो जायँ और
  4. मैं परमायु होऊँ।

जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिये।

आज राम का धनुष, शिव का त्रिशूल… आदर्श बन गया क्योंकि अब श्रृद्धा व भक्ति का उद्देश्य बदल गया | अब रामभक्तों और शिवभक्तों को भड़काने के लिए खुद को राम और शिवभक्त दिखाना आवश्यक हो गया है धर्म के ठेकेदारों और नेताओं को | क्योंकि तभी तो वे उन्हें उकसा सकेंगे और आपस में लडवा सकेंगे एकता के नाम पर ?

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हर कोई नफरत से भरा हुआ है और हर कोई मारकाट चाहता है क्योंकि सरकार का वह कुछ नहीं बिगाड़ सकते, बेरोजगारी और भुखमरी हटा सकते नहीं क्योंकि हर पार्टी, संगठन और समाजिक संस्थाएं किसी न किसी पार्टी या नेता के दम खड़ी हुई है | सारा प्रशासन चन्द रुपयों के लिए ईमान बेच रहा है और मीडिया तो अब वह रखैल हो चुकी है जो केवल पैसों के लिए मर्द बदल लेती है |

तो जनता करे भी तो क्या करे…. गुस्सा भीतर ही भीतर बारूद बनता जाता है और नेताओं के दुमछल्ले उन बारूदों को ढूंढ ढूंढ कर इकठ्ठा करने के प्रयासों में हर जगह फ्रेंडरिक्वेस्ट भेज रहे होते हैं | फिर उनको अपने संगठन में आमंत्रित करते हैं और प्रतीक्षा करते हैं उपरी आदेश की और इशारा मिलते ही दंगा भड़क जाता है |

यदि जनता थोड़ी भी सतर्क रहेगी तो दंगा इस द
ेश में कभी भड़क ही नहीं सकता | और ब्राह्मणों को जन्म के अनुसार नहीं कर्म के अनुसार पहचाना जाए तो ये फरसा छाप ब्राह्मणों को फेसबुक में नहीं, सेना में होना चाहिए | ~विशुद्ध चैतन्य

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