श्रृद्धा व विश्वास

एक नास्तिक और एक आस्तिक में अंतर यह होता है कि नास्तिक केवल तर्क को मानता है और आस्तिक तर्क से परे जाने की क्षमता रखता है | आस्तिक आध्यात्म की ऊँचाइयों पर पहुँच सकता है लेकिन नास्तिक के लिए यह असम्भव हो जाता है | ठीक वैसे ही जैसे एक अच्छा संगीतकार बनने के लिए नोटेशन से ऊपर उठना पड़ता है | एक नोटेशन पर टिका हुआ व्यक्ति केवल संगीत में साथ दे सकता है, लेकिन नए संगीत की रचना नहीं कर सकता | वह किसी भी संगीत का नकल तो कर सकता है और हुबहू बजा भी सकता है, लेकिन नई संगीत नहीं रच सकता | लेकिन संगीत जिसके दिल की गहराई पर हो वह न केवल किसी के साथ संगत कर सकता है, वह नयी रचना भी कर सकता है | वह संगीत में वह भाव पैदा कर सकता है जो किसी के भी दिल में उतर जाये, लेकिन तकनीक और दिमाग पर आधारित संगीत कुछ समय तक तो ठीक लगते हैं, लेकिन फिर खो जाते हैं जैसे आधुनिक संगीत | जबकि जो दिल से रचे गये संगीत होते हैं, वे सदाबहार हो जाते हैं |

भक्ति भी ठीक वैसी ही होती है और उसका असर भी वैसा ही होता है | वह भीतर से असर करता है और कैसे असर करता है उसका विज्ञान से समझना या समझाना कठिन हो जाता है | एक उदाहरण यहाँ में अपने ही जीवन की दो घटनाओं से देना चाहता हूँ |

कई वर्ष पहले मेरे कार्यालय के एक सहयोगी की एक साल की बेटी बहुत बीमार हो गयी और तब मैं कोई सन्यासी वगैरह नहीं था, लेकिन वे सभी बहुत सम्मान देते थे मुझे | तो जब वह दिन डॉक्टर से दावा लेने के बाद भी दिन भर ठीक नहीं हुई और स्थिति और बिगड़ने लगी तो मुझे फोन किया कि आप हमारे घर आ जाइये बिटिया की तबियत बहुत बिगड़ने लगी है | मैंने उनको कहा कि ठीक हैं मैं आ रहा हूँ | थोड़ी दूर पर ही उनका घर था तो जब तक मैं तैयार होता तब तक फोन आया कि आप कहाँ तक पहुँचे | मैंने कहा कि मैं बस निकल रहा हूँ | उन्होंने पूछा कि आपसे बात करने के दो मिनट बाद ही बिटिया स्वस्थ होने लगी | मैं आधे घंटे बाद वहाँ पहुँचा तो देखा कि वह तो दौड़-धुप में लगी हुई थी, बस चेहरा उतरा हुआ था उसका | पता चला कि सुबह से जाकर अब दूध पीया है…..

READ  सन्यासी हो ही नहीं सकते, क्योंकि आप राजनीति की बातें करते हैं...

तो यहाँ जो घटना घटी वह विश्वास ही था उनका न कि मैंने कुछ किया था | उनका विश्वास था कि मैंने उनके लिए शुभकामना की तो सब ठीक हो जायेगा.. और वही हुआ उनके साथ | अब यदि मैं इस भावना का दुरूपयोग करता और उनसे कहता कि मुझे इसकी कीमत दो…. तो मैं विश्वास व श्रृद्धा का अपमान करता |

दूसरी घटना पिछले वर्ष की है, जब एक व्यक्ति का बेटा जो दो वर्ष से डॉक्टर से इलाज ले रहा था और गोद से नहीं उतरता था | डॉक्टर ने कहा था कि दो तीन साल और इसी प्रकार इसे इंजेक्शन और दवा देते रहना पड़ेगा तब जाकर ठीक होगा | मैंने पूछा कि बीमारी क्या है तो वे बोले कि वह तो डॉक्टर को ही पता होगा | हर हफ्ते उसे इंजेक्शन दिया जाता था, लेकिन वह स्वस्थ नहीं हो रहा था और न ही कुछ खाता था | जबरदस्ती उसे दूध दिया जाता था…. उसे मेरे पास लाया गया | मैंने एक हफ्ते उसे हीलिंग दी और वह एक हफ्ते में ही स्वस्थ होकर चलना फिरना शुरू कर दिया | खाना भी खाने लगा | उसके एक साल बाद जब अभी वह आया तो सारे दिन दौड़-धुप में लगा रहता और खाना भी डट कर खाता था | मैंने पूछा कि डॉक्टर ने बताया कि और कितने दिन इलाज चलेगा ? वे बोले कि वह तो पिछले साल ही आपसे दिखाने के बाद डॉक्टर के पास नहीं गए | न तो कोई इंजेक्शन दिया… जब बच्चा ठीक है तो क्यों जाते डॉक्टर के पास ?

ये दो उदाहरण है जो सिद्ध करते हैं कि कुछ चीजें हैं जो अभी विज्ञान से परे हैं और ये पूजा पाठ, कर्मकांड इन्हीं क समझने व समझाने के लिए होते हैं | लेकिन यदि व्यापार और व्यापारी इसपर हावी हो जाएँ तो स्थिति बिगड़ जाती है | आध्यात्म और भौतिकता जीवन के दो पहलू हैं, और दोनों का महत्व है अपनी अपनी जगह | इसलिए नास्तिक केवल दवाओं से ही ठीक होते हैं और आस्तिक दुवाओं से भी
ठीक हो जाते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

READ  यदि ऑक्सिजन की खोज में मछलियाँ हिमालय में जाकर तप करने लगें...

नोट: दोनों घटनाएँ केवल विश्वास के महत्व व प्रभाव को समझाने के लिए यहाँ रखा था, न कि बीमारों को आमंत्रित करने के लिए | इसलिए यदि कोई बीमार है तो उसे डॉक्टर के पास ही लेकर जाएँ मेरे पास न लेकर आयें |

[youtube https://www.youtube.com/watch?v=g4Ay1yEJ4w4?feature=player_detailpage]

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of