हर विभाग में भ्रष्ट नेताओं व अधिकारीयों को प्राथमिकता मिलती है

“क़ानून कागज पर लिखे गये शब्दों का एक ऐसा संग्रह है, जिन्हें उन लोगों ने लिखा है जो सामान्यतः चोर, झूठे वायदे करने वालों के रूप में जाने जाते हैं | इसलिए कानूनी क्या है खोजने के बजाय, सही क्या है वह खोजें |” -जो रोगन
उपरोक्त कथन वर्तमान कानून व्यवस्था पर पुर्णतः लागू होते हैं | जितने भी कानून बने हैं या बनते आ रहे हैं, उन्हें हम पढ़ें तो ऐसा लगता है कि वे आमजन के हित को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा होता नहीं | आज कानून बनते हैं , पूंजीपतियों, नेताओं और अपराधियों के हित को ध्यान में रखकर, न कि आमजनों को | आज कानून बनते हैं कृषि क्षेत्र, वनों, किसानों व आदिवासियों को मिटा कर कंक्रीट के जंगल और कारखाने खड़े करने के लिए | आज कानून बनते हैं दागी मंत्रियों, विधायकों को बचाने के लिए…..

ईश्वरीय किताबें व क़ानूनी किताबें, लगभग एक ही भूमिका निभातीं हैं | दोनों ही किताबों में अच्छी अच्छी बातें लिखीं होतीं हैं लेकिन व्यवहारिक रूप में वे लागू नहीं हो पातीं | उदाहरण के लिए आतंकवाद, बलात्कार, चोरी, घोटाले, दूसरों की भूमि छीनना, दूसरों पर अत्याचार करना… आदि सामान्यतः सभी ईश्वरीय, धार्मिक ग्रंथों के अलावा क़ानूनी किताबों में भी अस्वीकृत है, लेकिन हो यही सबसे अधिक रहा है | जो धन और बाहुबल से समृद्ध है, उनके लिए कोई भी चीज अनैतिक नहीं है और लोग यह कहकर तसल्ली कर लेते हैं कि ईश्वर सब देख रहा है…. लेकिन ईश्वर कुछ नहीं देखता | कुछ उदाहरण है जैसे; निठारी काण्ड के एक समृद्ध आरोपी को बरी कर दिया जाता है, लेकिन नौकर को सूली पर लटका दिया जाता है | घोटालों के आरोपी चुनाव लड़ते हैं, आराम से बाहर घूमते हैं, लेकिन एक मामूली चोर जेल में बंद अपनी सजा की प्रतीक्षा में कई वर्ष बिता देता है | कानून कहता है कि एफआईआर लिखना अनिवार्य है और निःशुल्क है, लेकिन दरोगा, पहले तो एफआईआर लिखता ही नहीं यदि कोई गरीब शिकायत लेकर जाए किसी धनी व्यक्ति के विरुद्ध और यदि लिखेगा भी तो दो ढाई सौ लिए बिना नहीं लिखेगा | उसके बाद हर तहकीकात के लिए शिकायतकर्ता को हज़ार-पाँच सौ का चढ़ावा अलग भरना पड़ता है |
पूंजीपति, उद्योगपति, भूमाफिया, अपराधी, नेता, सरकारी विभाग व पुलिस सभी आपस में मिले होते हैं और यदि कोई पुलिस अधिकारी गलती से ईमानदारी से काम करने का प्रयास करे तो उपर बैठे अधिकारी उसके हाथ पाँव बाँध देते हैं | और आश्चर्य की बात है कि कानून और भगवान्, दोनों ही उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते |
आइये देखते हैं मनुस्मृति क्या कहती है राजा, प्रशासन के विषय में |
नगरे नगरे चैकं कुर्यात्सर्वार्थचिंतकम |
उच्चै: स्थानं घोररूपं नक्षत्राणामिव ग्रहम् || 
                                                                                                                                          -अध्याय ७, श्लोक १२१

हरेक नगर में राजा को सभी नागरिकों के हित की चिंता करने वाले, अच्छे कुल के और तेजस्वी व्यक्ति को नगराधिपति नियुक्त करना चाहिए | या व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो शुक्र के समान तेजस्वी तथा किसी से भी भयभीत नहीं होने वाला हो |

स ताननुपरिक्रमामेत्सर्वानेव सदा स्वयम् |
तेषां वृत्तं परिणयेत्सम्यग्राष्ट्रेषु त्च्चरैः ||
                                                                                                                                 
-अध्याय ७ श्लोक १२२

नगर के अधिपति को गाँवों में जाकर वहाँ के मुखियाओं के कार्यों का निरिक्षण करना चाहिए | मुखियाओं की सूचनाओं को देने वाले दूतों से भी उन्हें संपर्क बनाये रखना चाहिए |

ये कार्यिकेभ्योSर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः |
तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम् ||
                                                                                                                                          –अध्याय ६ श्लोक १२४

प्रजा के किसी भी कार्य को करने के बदले घुस (रिश्वत) लेने वाले अपवित्र बुद्धि वाले अधिकारीयों की संपत्ति छीनकर उन्हें देशनिकाला दे देना चाहिए |

लेकिन क्या वर्तमान में ऐसा हो रहा है ?
बिलकुल विपरीत हो रहा है, घूसघोर, घोटालेबाज सत्तासुख भोगते हैं और आमजन शोषित व प्रताड़ित हो रही है इनके द्वारा | ये लोग न केवल आमजनों की मेहनत की कमाई लूट रहे हैं, बल्कि सम्बंधित पद, प्रतिष्ठान को भी कलंकित कर रहे हैं | दुनिया भर की अपराध नियंत्रण केंद्र व संस्थाएं बनी हुईं हैं, शिकायत केंद्र बने हुए हैं, लेकिन कोई लाभ नहीं… क्योंकि हर विभाग में भ्रष्ट अधिकारीयों को प्राथमिकता मिलती है और ईमादार, कर्मठ अधिकारीयों को निरंतर स्थानांतरित करके उसकी योग्यता व कर्त्तव्यपरायणता को कुंठित किया जाता है | अपराधी सरकार चलाते हैं और ईमानदार इनके रहमों करम पर अपने दिन काटते हैं |
लेकिन दोषी कौन है ?
दोषी हैं हम !! हमारे जैसे कायर, नपुंसक तथाकथित सभ्य नागरिक जो अपराधियों का साथ देते हैं व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ व भयवश | हम कभी ईमानदार, कर्मठ अधिकारी का साथ नहीं देते, उनको विश्वास नहीं दिला पाते कि वे यदि जनता के हित में कार्य कर रहे हैं तो जनता भी उनके साथ है | होता यह है कि अपराधियों का साथ देने पर अपराधी अवश्य उनके संकट काल में उनका साथ देते हैं, लेकिन जनता तो व्यक्ति स्वार्थ पूर्ति तक ही उनका साथ देती है |
जानता हूँ, इतना लम्बा लेख अधिकाँश तो पढेंगे ही नहीं और यदि किसी ने पढ़ भी लिया तो डायलॉग मार देंगे, “कलयुग है भाई !” ~विशुद्ध चैतन्य
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