सन्यास समाज के लिए उपयोगी होने के लिए किया जाने वाला प्रयोजन मात्र है

पूर्वजन्मों के संस्कार या संचितकर्म ही तय करते हैं कि वह भेड़ या दुमछल्लों का जीवन जियेगा या एक सन्यासी का जीवन | सन्यासी वही हो सकता है जिसने पूर्वजन्मों में समाज का गहन अध्ययन व अनुभव किया हो | जिसने जाना हो समाज के दोषों और कमजोरियों को और भोगा हो उन दुष्परिणामों को जिससे समाज मुक्त होना चाहता है लेकिन कायरता के कारण मुक्त नहीं हो पाता | कुछ मुट्ठी भर लोगों के गुलाम बनकर जीवन बीता देते हैं ऐसे सामाजिक लोग |

जैसे सुभाषचन्द्र बोस की अन्तःप्रेरणा इतनी प्रबल थी कि वे एक समय तय कर लिए कि वे जिस काम के लिए इस धरा में आये हैं वही करेंगे न कि वह काम जो भेड़ों का समाज करवाना चाहता है | कई बार हम स्वयं की आवाज किसी न किसी उम्र में सुन ही लेते हैं और उसके अनुसार कार्य करने लगते हैं | कई उदाहरण है कि व्यक्ति साठ वर्ष के पार होने के बाद वह कर पाए जो वे बचपन में कभी सोचा करते थे फिर चाहे वह पियानों बजाना ही क्यों न हो | क्योंकि जब व्यक्ति जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाता है तभी वह एक समय ऐसी स्थिति में पहुँचाता है जब वह स्वयं की आवाज को सुन व समझ सकता है, अन्यथा तो केवल दूसरों के दिखाए, बनाये मार्ग पर भेड़-बतखों की तरह चलते रहते हैं |

ज्योतिषी भी (यदि जानकार हों) तो सहयोगी बन जाते हैं पूर्वजन्मों के संचित कर्मों के आधार पर मार्गदर्शन पाने में | कल ही मेरे एक मित्र ने मुझे मैसेज किया कि मैं कुछ समय पहले जो ज्योतिष को गलत कहता था, अब वह विचार वापस लेता हूँ | क्योंकि ज्योतिषी ने बचपन में भविष्यवाणी की थी कि मैं सन्यासी बनूँगा लेकिन मैं पढ़ाई में टॉपर्स रहा और कभी सन्यासी होने का विचार नहीं आया, मेडिकल की पढ़ाई की..नौकरी ली…. लेकिन अब अचानक मन उचट गया समाज के आडम्बरों से | मैं अब जा रहा हूँ सन्यास लेने और केवल यह बताना चाहता था कि ज्योतिषी ने झूठी भविष्यवाणी नहीं की थी |

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सारांश यह कि संन्यास का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर अर्थात स्वयं के भीतर बैठे वह शुभ आत्मा जो इस शरीर को नियंत्रित करती है उसे समझने व जानने के लिए किये जाने वाले कार्य और वातावरण की खोज करके समाज से हट कर स्वयं के भीतर जाना | जब व्यक्ति स्वयं से परिचित हो जाता है तो वह समाज में चाहे तो लौट सकता है या फिर प्रतीक्षा कर सकता है अगले जन्म की यदि वह शारीरिक व मानसिक रूप स्वयं को अक्षम पाता है समाज में लौटने में तब |

सन्यास में व्यक्ति स्वयं से परिचित हो जाता है और वही है ईश्वर की प्राप्ति क्योंकि तब आप दिशा निर्देश भीतर से लेने में सक्षम हो जाते हैं और समाज की भेड़ नीति के विरुद्ध खुलकर आवाज उठा पाते हैं | तब आप समाज को कुछ नया व उपयोगी दे पाते हैं, अन्यथा नौकरी करते जीवन बिता देते हैं |

सन्यास संसार से मुक्ति का नाम नहीं, सन्यास समाज के लिए उपयोगी होने के लिए किया जाने वाला प्रयोजन मात्र है | यदि संयासियों का संसार से कोई लेना देना नहीं होता तो न आश्रम होते और न ही होते गोत्र | न वेद होते और न होते पुराण | आज भी ये सन्यासी जो स्वयं को सतयुगी संयासी मानते हैं, कर क्या रहे हैं ? उसी संसार में भटक रहे हैं जिससे मुक्त होने का दावा करते हैं | वही लोगों से भीख माँगते हैं कुछ तो कुछ महँगी कारों में घूमते हैं | कुछ आलिशान फाइवस्टार आश्रमों में रहते हैं तो कुछ झोपड़ पट्टी में…. लेकिन कुल मिलाकर संसार से मुक्त होता कौन है ?

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यह ब्रम्हचर्य और सांसारिक वस्तुओं का त्याग के नाम पर चल् रहे आडम्बरों के नाम पर कितने पुरुषों को अपना पुरुषत्व खोना पड़ता है और कितनों को आजन्म गुलामों का जीवन जीना पड़ता है | गुलाम इसलिए क्योंकि उनका व्य
क्तिगत अहंकार मिटा दिया जाता है और उसे भेड़ों का जीवन जीने के लिए विवश कर दिया जाता है | उसकी सोचने समझने की शक्ति छीन ली जाती है झूठे उपाधियों (संत, महंत, मंडलेश्वर……आदि) देकर | वह एक कठपुतली सा जीवन जीता है और लोग उसे भी पत्थर की मूर्ति के समान ही जीवन जीता देखकर जय जयकार करते हैं | लेकिन वास्तव में सन्यासियों का यह उद्देश्य नहीं होता | संयासी वही होता है जो आयुर्वेद, शल्यचिकित्सा, वेद, नीति, कृषि विज्ञान जैसे खोज करते हैं और समाज के लिए उपयोगी होते हैं | उन्हें यदि आवश्यक लगा तो वे विवाह भी करते हैं क्योंकि उनका अंश समाज और श्रेष्ठ कुछ दे पाने में सहयोगी होता है | उसके अंश में वही गुण विद्यमान हो सकते हैं जो सन्यासी में हैं और कम मेहनत से ही कम समय में वह उस जगह पहुँच सकता है जहाँ उसके पिता थे | -विशुद्ध चैतन्य

नोट: यह किसी शास्त्र से पढ़कर नहीं कहा गया गया है, यह पुर्णतः मेरे व्यक्ति विचार हैं | अतः किसी शास्त्रों के ज्ञाता को असहमति हों तो वे स्वतंत्र हैं असहमत होने के लिए |

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