समर्थ को सहायता एक अकाट्य सत्य

संन्यास एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ पहुंचकर आप वह सब देख व समझ पाते हैं, जो समान्य जीवन जीते हुए नहीं समझ पाते | हम यह कभी चिन्तन नहीं कर पाते अपनी दैनिक जीवन के उलझनों में कि समाज हमेशा समर्थ की सहायता को तत्पर क्यों रहता है ? हम यह कभी चिंतन-मनन नहीं कर पाते कि जिनके पेट भरे हुए होते हैं, उन्हें खिलाने पिलाने के लिए हर कोई आतुर रहता है, लेकिन जो भूख से मर रहे होते हैं, उन्हें पूछने कोई नहीं जाता | हम यह नहीं देख पाते कि बड़े बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों को खरबों का कर्ज माफ़ कर दिया जाता है, लेकिन किसी विवश लाचार व्यक्ति का घर नीलाम करके भी कर्ज वसूल लिया जाता है |

अभी हाल ही में पुण्य प्रसुन्न बाजपेयी ने अपने किसी टीवी शो में बताया कि 17 हज़ार करोड़ रूपये की कर्ज माफ़ी पिछले तीन वर्षों में उद्योगपतियों को दी गयी | एक और शो में उन्होंने बताया कि उद्योपतियों को दिए गये 48 खरब रूपये सरकार ने बट्टे खाते में डाल दिए, यानि वे कर्ज माफ़ कर दिए गये | लेकिन किसानो के लिए उनके पास पैसा नहीं है | किसानो को कर्ज माफ़ी के रूप में चेक दिए भी गये तो अस्सी पैसे से अट्ठारह रूपये तक के |

सभी धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबों में यही पढ़ने को मिलता है कि दीन-दुखियो की सहायता करो, गरीबों की सहायता करो, असहायों की सहायता करो लेकिन सहायता हमेशा अमीरों की ही होती है, समर्थ व समृद्धों की ही होती | लाखों समाजसेवी संस्थाएं होंगी इस दुनिया में, लेकिन लाख लोगों की भी सहायता नहीं हो पाती | अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बेघर भिखारियों को देखा जा सकता है जो फुटपाथों पर जीवन गुजारते हैं |

लेकिन ऐसा होता क्यों हैं, जिन्हें आवश्यकता है उनकी सहायता करने की बजाये उनकी सहायता क्यों की जाती है जो समर्थ हैं ? समाज ने कभी भी इस बात पर चिंतन नहीं किया | जिन्होंने चिंतन मनन किया, समझा जाना, वे समाज को समझा नहीं पाए या समाज ने उन्हें सुना ही नहीं |

समाज समर्थ का सहयोगी क्यों ?

समाज समर्थ का सहयोगी इसीलिए होता है क्योंकि सहयोग की सार्थकता उन्हें दिखाई देती है | उन्हें ऐसा लगता है कि हम जिसका सहयोग कर रहे हैं वह चूँकि अपने आप में समर्थ है, आत्मनिर्भर है, समृद्ध है, इसीलिए वह धन का दुरूपयोग नहीं करेगा |

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दूसरा प्रमुख कारण है किसी भी समृद्ध, ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की सहायता करके वास्तव में व्यक्ति अपने ही अहंकार को तृप्त करता है | वह उस समृद्ध व्यक्ति से स्वयम को जुड़ा हुआ पाता है और स्वयं को यह सांत्वना दे पाता है कि वह उतना अमीर या प्रसिद्द न सही, पर इस योग्य तो हुआ कि वह उस अमीर की योजनाओं में सहयोगी हुआ |

शेयर में पैसे लगाना, व्यापार में पैसे लगाना, राजनैतिक पार्टियों को चंदा देना, राजनेताओं को चंदा देना आदि सब व्यापारिक सहयोग हैं परमार्थ या परोपकार नहीं | बदले में उन्हें कुछ न कुछ चाहिए होता है | लेकिन यदि किसी गरीब की सहायता करते हैं, किसी असफल व्यक्ति की सहायता करते हैं तो पैसे बट्टे खाते में जाते हुए दिखाई देते हैं | उससे कोई लाभ नहीं होता उन्हें | यही कारण है कि समर्थ व समृद्ध व्यक्तियों को हर कोई सहायता देने के लिए तत्पर रहता है |

धर्म व आध्यात्म में निःस्वार्थ दान का महत्व

सभी सम्प्रदायों में दान या जकात का बहुत महत्व बताया गया है | इसका प्रमुख कारण था कि जो समर्थ नहीं हैं, असफल हैं, गरीब हैं, अयोग्य हैं, उनकी सहायता हो सके | लेकिन ऐसा होता नहीं | क्योंकि साल में एक बार या किसी धार्मिक पर्व में सौ पचास रूपये दान करके लोग समझते हैं कि उन्होंने अपना धर्म निभा लिया | वास्तव में इन्होंने दान किया ही नहीं होता, केवल ढोंग कर रहे होते हैं दान का |

यदि समाज वास्तव में दान कर रहा होता, वास्तव में जकात दे रहा होता, तो समाज में गरीबी देखने नहीं मिलती | कोई भूखा न मर रहा होता और कोई किसान धनाभाव में आत्महत्या नहीं कर रहा होता |

फिर किसी को धन छुपाने के लिए गोदामों, पनामा या स्विसबैंक न खोजना पड़ता और न ही किसी को काला धन सफ़ेद करने वाले नेताओं और बाबाओं की आवश्यकता पड़ती |

दान पुण्य का महत्व समाप्त हुआ भी तो उन मुफ्तखोरों की वजह से, जिन्होंने दान बटोरना ही धंधा बना लिया | कभी समाज सेवी संस्थाओं के नाम पर दान वसूलते हैं, लेकिन जिनकी सेवा का दावा करते हैं, उन तक पैसा पहुँचता ही नहीं | कई लोग भीख मांगने को ही धंधा बना रखे हैं | बड़ी बड़ी कोठियाँ बना लेते हैं, उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे होते हैं, लेकिन पेशा भीख मांगने का अपना रखे हैं |इसीलिए दान धर्म गर्त में चला गया |

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मेरी अपनी समझ कहती है कि दान या जकात का मुख्य उद्देश्य किसी को सहयोग देकर आत्मनिर्भर बनाना होता है, किसी को सहयोग देकर उसे समस्याओं से बाहर निकालना होता है, न कि भिखारियों की तरह सौ पचास रूपये का चंदा देकर टरका देना |

दान भी लेना है तो पहले स्वयं को समर्थ करो

दुनिया में जितने भी महान दार्शनिक आये, जितने भी लोगों ने सत्य को जाना, जितने लोगों ने आध्यात्मिक या भौतिक उन्नति पायी, सभी के उपदेशों व सूत्रों में एक मूल सन्देश अवश्य छुपा मिलता है और वह है ‘स्वयं को जानो, स्वयं को पहचानो !’ गौतम बुद्ध ने भी कहा था, “अप्प दीपो भव:” अर्थात स्वयं का प्रकाश बनो !

इन्होने सत्य को जाना कि जब तक आप स्वयं को समर्थ, सबल नहीं बनाते, कोई भी आपकी सहायता करने को उत्सुक नहीं होगा | एक दो बार कोई सहायता कर भी देगा, लेकिन बाद में वह भी अपने हाथ खींच लेगा | चूँकि आप आलसी हैं या अयोग्य हैं, इसीलिए आप उन सहायता का सदुपयोग नहीं कर पाते, आपकी स्थिति वैसी ही दयनीय बनी रहती है | और अंत में आप दुनिया को कोसते हुए इस दुनिया से विदा ले लेते हैं भुखमरी और तंगी में जीते हुए | आपकी सारी महत्वाकांक्षाएँ भीतर ही दफन होकर रह जाती है | आप समाज सेवा भी करना चाहते हों, आप देश के लिए कुछ महत्वपूर्ण भी करना चाहते हों, तब भी लोग आपकी सहायता को आगे नहीं आएंगे | क्योंकि आप अयोग्य हैं, असमर्थ हैं, असफल हैं | और सदैव स्मरण रखें, खुद का पेट भरने या परिवार पालने की योग्यता न हो और सपने दूसरों की सेवा या सहायता की देख रहे हैं, तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं | पहले स्वयं को व स्वयं के परिवार को पालने योग्य बनिए, स्वयं  व स्वयं के परिवार को इतना समर्थ व समृद्ध बना लीजिये कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपकी मानसिक स्थिति डाँवाडोल न हो सके |

इसीलिए पहले स्वयं को समर्थ व सफल बनाइये, दूसरों के सामने हाथ फैलाना बंद कर दीजिये | जब आप दूसरों की तरफ देखना बंद कर देते हैं, तब आप स्वयं की ओर मुड़ते हैं स्वयं की शक्तियों व योग्य्ताताओं को पहचान पाते हैं |

बुरा वक्त क्या वास्तव में बुरा होता है ?

बुरा वक्त कभी भी बुरा नहीं होता | बुरा वक्त वास्तव में वह समय होता है, जो प्रकृति आपको उपलब्ध करवाती है, स्वयं को जानने व समझने के लिए | जब तक व्यक्ति के जीवन में बुरा वक्त नहीं आता, वह इंसान नहीं बन पाता | उसे दूसरों के दुःख-दर्द समझ में नहीं आते | और जिन्हें दूसरों के दुःख-दर्द नहीं समझ में आते, उनमें दूसरों की सहायता के लिए बढ़ने की भावना विकसित नहीं हो पाती, वह मनुष्य नहीं बन पाता | वास्तव में मनुष्य योनी में जन्म लेने का मुख्य कारण यही होता है कि हम पशु योनी में कुछ ऐसा काम कर जाते हैं जो उस योनी के सामान्य व्यवहारों से अलग होता है | आपने कई बार पढ़ा होगा कि किसी मछली ने या किस हिंसक पशु ने किसी की जान बचाई | तो ये उनके सामान्य व्यव्हार के विरुद्ध होता है, और जब कोई पशु अपनी जाति से अलग किसी और जाति या प्रजाति के जीव के प्रति सद्भावना से भरने लगता है, तब वह मनुष्य योनी के अनुकूल होने लगता है | क्योंकि मनुष्यता का अर्थ ही है परस्पर सहयोगिता, दया, करुणा, प्रेम, सेवा का मिश्रित भाव से भरा होता है मनुष्य |

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दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति के भीतर भी ये भाव होते हैं, लेकिन वे सब बचपन में मिले अनुभवों, परवरिश, व विश्वासघातों के परिणाम स्वरुप भीतर ही दफन होकर रह जाते हैं | वे अब चाहकर भी उन भावों को नहीं खोज पाते क्योंकि अनुभव ही उनका बुरा रहा | इसीलिए ही क्षमा शब्द का महत्व हो गया | विद्वानों ने कहा कि जो बीत गया उसे भुला दो, क्षमा कर दो उन्हें जिन्होंने तुम पर अत्याचार किया | तुम उस समय इतने ताकतवर नहीं थे कि तुम अत्याचारियों का सामना कर पाते, इसीलिए उस विषय पर अब चिन्तन करने उसके आधार पर वर्तमान में दूसरों से नफरत करने का कोई लाभ नहीं | क्षमा कर दो उन्हें और क्षमा कर दो स्वयं को और आगे बढ़ो | स्वयं को खोजो, स्वयं को जानो और स्वयं को समृद्ध, शक्तिशाली बनाओ |

दूसरों से सहायता की आस लगाए बैठे रहने वाले लोग कभी भी सफल नहीं हो पाते | और जब आप स्वयं समर्थ, शक्तिशाली हो जायेंगे, तो दुनिया स्वतः ही आपकी सहायता करने वैसे ही आगे बढ़ेगी, जैसे कि आज बड़े बड़े धूर्त नेताओं, व्यापारियों, ठगों, देश व जनता के लुटेरों की सहायता के लिए पलकें बिछाए बैठे रहती है |

~विशुद्ध चैतन्य

यहाँ नीचे नितिन खुराफाती का एक विडियो दे रहा हूँ, उसे अवश्य देखें |

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