एक दिन फ्रेंडलिस्ट खाली करके देखिये, मृत्युपरांत कितने आपको याद रखेंगे पता चल जाएगा !

“दूसरों के दोष देखने से बेहतर है, खुद के दोष देखो…!”

यह एक ऐसा वाक्य है, जिसने पहले परिवार से अलग किया, फिर मित्रों/सम्बन्धियों से, फिर समाज से और फिर ऐसा बना दिया कि अब किसी के साथ एक कमरे में रहना तो दूर, किसी के साथ मिलना जुलना भी रास नहीं आता | अब किसी के घर जाना पसंद नहीं, बिलकुल एकांकी हो गया हूँ | स्वयं के दोष देखते-देखते यह समझ में आया कि मुझ सा बुरा न कोय, इसलिए बेहतर है अच्छे लोगों से हमेशा के लिए दूरी बना ली जाए | ये अच्छे लोग… जो केवल अपने और अपने परिवार के लिए जीते हैं ! ये अच्छे लोग जो जीवन भर छल करते हैं स्वयं से और दूसरों से ! ये अच्छे लोग जिन्होंने सेवा भी की, परोपकार भी किया, किसी की सहायता भी की… तो व्यक्तिगत स्वार्थों को ध्यान में रखकर | मेरे जैसे बुरा व्यक्ति जितना हो सके इन अच्छे लोगों से दूर ही रहे |

पिछले कुछ वर्षों में मैंने अनुभव किया कि जब अधिक लोग आपसे जुड़ जाते हैं तब वे अपेक्षा करते हैं कि आप उनकी तरह ही सोचें और उनकी तरह ही व्यव्हार करें क्योंकि वे आपको चाहते हैं | हालांकि वे जब जुड़ते हैं आपसे तब आपके अपने ही व्यक्तिगत व्यव्हार व विचारों से आकर्षित होकर, लेकिन बाद में वे आपको अपने अनुसार ढालना शुरू कर देते हैं | यदि आप स्वयं को नहीं बदलते उनके अनुसार, तब वे आपको भला बुरा कहने लगते हैं और फिर एक दिन सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है | मैं ऐसे संबंधों को कभी भी महत्व नहीं देता जो आपकी अपनी मौलिकता खोने को बाध्य करे |

कई लोग हैं जो मेरे लेखों और मेरे विचारों से प्रभावित होकर मुझसे मिलने या मेरे साथ कुछ दिन गुजारने आ जाते हैं | वे पाते हैं कि मैं कोई काम नहीं करता, सिवाय पुस्तकें पढ़ने या फेसबुक में लिखने या लोगों के प्रश्नों के उत्तर देने के | ये उनके लिए एक सदमा सा होता है | सारी श्रृद्धा व भक्ति जो मेरे प्रति होती है, वह पल भर में छिन्न-भिन्न हो जाता है | फिर गुरूजी से चैतन्य जी और चैतन्य जी से चैतन्य तक पहुँचा देते हैं | फिर सलाह देना शुरू कर देते हैं कि मुझे क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए | आश्रम को होटल समझ लेते हैं और जिस उद्देश्य से आते हैं…यानि अध्यात्मिक ज्ञान व चर्चा के लिए… वह तिरोहित हो जाता है और कुछ दिन पिकनिक मनाकर निकल जाते हैं |

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कुछ महीने पहले दिल्ली से एक पंडित जी आये थे जो कि वशीकरण विशेषज्ञ थे | उन्हें बहुत आशा थी कि मैं कोई बहुत बड़ी सिद्धि या शक्ति प्राप्त किया हुआ हूँ, और यदि मैं उनको वह सिद्धि या शक्ति सिखा दूँ तो उनके ग्राहकों की संख्या बढ़ जायेगी और कमाई भी | लेकिन एक हफ्ते मेरे पास रहने के बाद उन्हें बड़ी निराशा हुई कि इसके पास कोई भी रिद्धि-सिद्धि नहीं है |

दिल्ली वापस लौटने के बाद हर किसी से कहने लगे कि वह तो ढोंगी है, पाखंडी हैं.. उसे कुछ नहीं आता |

इसी प्रकार समाज से जब भी कोई मुझसे मिलने आता है, वह इसी प्रकार के अनुभव लेकर जाता है | बहुत ही कम ऐसा होता है, कि उन्हें मैं सही नजर आता हूँ या उसे मुझसे मिलकर प्रसन्नता होती है | यहाँ फेसबुक में भी साढ़े-सात हज़ार के लगभग फ्रेंड्स और फ़ॉलोवर थे | लेकिन अधिकाँश मुझे वैसे ही नहीं देखना पढ़ना चाहते थे, जैसा मैं हूँ, बल्कि वैसा चाहते थे जैसे वे स्वयं हैं | कोई मोदी भक्त है तो वह चाहता है मैं भी मोदी वंदना करूँ उनकी तरह, कोई सोनिया भक्त है कोई राहुल या केजरी भक्त है… कोई संघी हैं कोई बजरंगी है, कोई हिन्दू हैं कोई मुस्लिम है….. यानि सभी तरह के लोग हैं और सभी अपनी अपनी नजरिये से मुझे देखते समझते हैं | लेकिन सभी के लिए मैं एक पहेली बनकर रह जाता हूँ | जब मुझे लगा कि मैंने अनावश्यक से रूप से उन लोगों को भी अपनी लिस्ट में शामिल कर लिया है जो विद्वान् हैं, पढ़े-लिखे हैं अंग्रेजी बोलते हैं, संस्कृत पढ़ते हैं… तो मैंने तय किया कि मैं फ्रेंड लिस्ट ही खाली कर दूँगा | क्योंकि अपने अब तक के जीवन में मैंने पाया कि मैं इनकी समझ में नहीं आऊंगा कभी भी | फिर मुझे आवश्यकता भी नहीं है, इनको समझाने की क्योंकि ये लोग तो पहले से ही समझे समझाए होते हैं | और मैंने अपनी पूरी फ्रेंडलिस्ट ही खाली कर दी.. और देखिये पांच दिन बाद भी दस पन्द्रह लोगों को ही पता चला कि उनको मेरे पोस्ट नहीं मिल रहे हैं या वे मित्र सूची से बाहर हो चुके हैं ! इसलिए यह भ्रम आप भी मत पालिए कि इतनी बड़ी भीड़ आपको फ़ॉलो कर रही है तो आप महान हो गये… एक दिन फ्रेंड लिस्ट खाली करके देखिये… पता चल जाएगा मरने के बाद आपको कितने लोग याद रखेंगे

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आप जैसे हैं यदि वैसे ही रहना चाहते हैं, अपनी मौलिकता खोना नहीं चाहते तो नेता बन जाइए, अपराधी बन जाइए, चित्रकार/संगीतकार बन जाइए, संन्यासी/साधू बन जाइए… यानि या तो बिलकुल ऊपर पहुँच जाइए और इतने ताकतवर बन जाइए कि न कोर्ट कचहरी आपका कुछ बिगाड़ सकें या फिर समाज से बिलकुल कट जाइए…. क्योंकि समाज भेड़ों को पसंद करता है और डर की गुलामी करता है | समाज या तो पुण्य आत्माओं के सामने झुकता है, या फिर दुष्ट आत्माओं के आगे | इसलिए यह समाज आपके पीछे पड़ा रहता है कि अपने दोष देखिये….. लेकिन यही समाज दुष्टों की जी हुजूरी करता है क्योंकि उनसे खतरा रहता है अपनी जान का, अपने परिवार पर दुष्टों की कुद्रष्टि पड़ने का…. इसलिए समाज हमेशा दुष्टों का साथ देगा, हर हाल में देगा, फिर चाहे उसके लिए किसी शुभ आत्मा की बलि ही क्यों न लेनी पड़ी, फिर सुकरात को ज़हर ही क्यों न देना पड़े, जीसस को सूली ही क्यों न चढ़ाना पड़े, दाभोलकर को मौत ही क्यों न देना पड़े, मासूम, निर्दोष इशरत को किसी नेता को खुश करने के लिए जान से ही क्यों न मारना पड़े…. क्योंकि अच्छे लोगों का समाज वास्तव में अच्छे लोगों को बलि के बकरे से अधिक नहीं समझता | अच्छे लोगों के समाज की ठेकेदारी हमेशा बुरे लोगों के पास ही रहती है | बुरे लोगों का समूह सर्टिफिकेट देता है कि कौन अच्छा है और कौन बुरा है और सारा समाज उसे स्वीकारता है | लेकिन किसी व्यक्ति को उसके मौलिक रूप में स्वीकार नहीं कर सकता, फिर चाहे वह कितना ही शांतिप्रिय हो, कितना ही एकांकी हो… ये अच्छे लोग न तो गौतम बुद्ध को सहन कर सकते हैं, न महावीर को न ओशो को…. तो हम मेरे जैसे किसी संन्यासी को एकांत में बैठे देखकर कैसे सहन कर सकते हैं ? यहाँ भी आकर लोग मुझे कहते हैं कि आज आप दुनिया में इतने अकेले केवल इसलिए हैं क्योंकि आपको अपना दोष नहीं दिखता, केवल दूसरों का ही दोष दीखता है |

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ऋषि मुनि हों, या बुद्ध या महावीर… सभी समाज से एक दूरी बनाकर रखते थे समाज में रहते हुए भी | वे जैसे हैं, वैसे ही होते हैं, दुनिया को दिखाने के लिए स्वयं में कोई परिवर्तन नहीं करते थे | उनको आवश्यकता ही नहीं थी कि वे दूसरों को खुश करने के लिए बनावटी मुस्कान, या नकली अपनापन दिखाएँ….. क्योंकि वे अपने केंद्र में स्थिर थे | वे जानते थे कि दुनिया जिसे अपनी उपलब्धि मान रही है, व सब केवल वे कबाड़ हैं, जिनको छोड़ कर जाना पड़ेगा… और वे यह भी जानते थे कि कोई इक्का दुक्का ही इस योग्य होगा जो असल की खोज में आएगा…. और जब कोई ऐसा आता है, तब वे केवल मार्ग दिखा देते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

नोट: पढ़े-लिखे डिग्रीधारियों से आग्रह है कि वे अपना दिमाग न लगाएं इस पोस्ट को समझने में | हो सकता है उनको इस पोस्ट से यह समझ में आये कि मैं स्वयं को कोई संत मान रहा हूँ या गौतम बुद्ध समझ रहा हूँ |

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