जब मैं सनातन धर्म कहता हूँ तो वह सभी पर लागु है… फिर वह मानव हो या पशु-पक्षी….

धर्म और मानव निर्मित नियम व कानून बिलकुल अलग अलग हैं | धर्म सनातन है, अपरिवर्तनीय है लेकिन समय, स्थान, परिस्थिति पर आधारित है | धर्म स्वाभाविक हैं, प्राकृतिक है, स्वस्फूर्त हैं… जबकि मानव निर्मित नियम व कानून भी धर्म के अंतर्गत ही जा जाते हैं | यानि धर्म सनातन है उसमे सभी नियम, कानुन, कर्तव्य समाहित हो जाते हैं | इसलिए धर्म संकीर्ण न तो कभी था और न ही कभी रहेगा | लेकिन जब धर्म के नाम पर सोच और विचार से लेकर व्यवहार तक में संकीर्णता आ जाती है तो फिर वह धर्म नहीं, तानशाही हो जाती है कुछ मुट्ठीभर लोगों की |


अंसारी साहब धर्म और मानव निर्मित नियम व कानून बिलकुल अलग अलग हैं | धर्म सनातन है, अपरिवर्तनीय है लेकिन समय, स्थान, परिस्थिति पर आधारित है | धर्म स्वाभाविक हैं, प्राकृतिक है, स्वस्फूर्त हैं… जबकि मानव निर्मित नियम व कानून भी धर्म के अंतर्गत ही जा जाते हैं | यानि धर्म सनातन है उसमे सभी नियम, कानुन, कर्तव्य समाहित हो जाते हैं | इसलिए धर्म संकीर्ण न तो कभी था और न ही कभी रहेगा | लेकिन जब धर्म के नाम पर सोच और विचार से लेकर व्यवहार तक में संकीर्णता आ जाती है तो फिर वह धर्म नहीं, तानशाही हो जाती है कुछ मुट्ठीभर लोगों की |

चूँकि हम भारतीयों को धर्म का ज्ञान बहुत पहले से रहा, इसलिए हमारी सोच व व्यवहार उदारवादी रहा | हम यह जानते हैं कि परिस्थिति स्थान, जलवायु के आधार पर समाज अपने अपने नियम या कानून बनाते हैं वे उन कानूनों के प्रति सहज होते हैं जैसे ईसाईयों का अपना नियम-कानून है, मुस्लिमों का अपना नियम कानून है, फिर इनमें अरब के मुस्लिम और भारत के मुस्लिम, शिया और सुन्नी….. सबके अपने अपने नियम कानून हैं | हिन्दुओं के अपना ही इतना विराट मिश्रित विभिन्न मान्यताओं का समाज है कि उसमें कट्टरता या किसी एक की विचारधारा पर सभी को नहीं हाँका जा सकता | हिन्दुओं में कहीं मांसाहार वर्जित है तो कहीं माँसाहार मान्य है, कहीं निराकार की उपासना है तो कहीं साकार की, कहीं प्रकृति व वनस्त्पति उपासक हैं तो कहीं मूर्ति उपासक हैं….. यानी इतनी विराटता पुरे विश्व के किसी भी देश में नहीं मिल सकती | और यही कारण है कि हिन्दू उदारवादी होते हैं क्योंकि बचपन से ही वे सभी कुछ देखते आते हैं तो उनके लिए किसी का विरोध रह ही नहीं जाता | जबकि इस्लामिक देशों के लिए इतनी उदारता स्वीकार कर पाना असहज हो जाता है |

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इसलिए धर्म के नाम पर जब कबीलाई मानसिकता अपना ली जाए तो दोष धर्म का नहीं, मानसिकता है | धर्म को जब किताबों में कैद कर लिया जाए और यह कहा जाए कि हमारी किताबें ईश्वर ने लिखी है और वही सत्य है… तो यह संकीर्णता और कूपमंडूकता हो जाती है | क्योंकि वे दूसरे समाज की ईश्वरीय किताबों को अस्वीकार कर रहे हैं | और जैसे ही कोई दूसरे समाज की ईश्वरीय किताबों को अस्वीकार करता है, ठीक उसी समय वह स्वयं की ईश्वरीय किताबों को अप्रत्यक्ष रूप से अस्वीकार कर रहा होता है | और जैसे यह होता है, धर्म मिट जाता है और संघी-बजरंगी, आईसीस-अलकायदा, साक्षी-प्राची-योगी पैदा हो जाते हैं | और चूँकि ईश्वरीय किताबें ही अस्वीकार हो गयी, तो ईश्वर भी अस्वीकार हो गया.. अब ऐसे लोग दूसरों को अपना गुलाम समझने लगते हैं और खुद को भगवान् | ये लोग नियम कानून बनांते हैं और उसे ईश्वरीय आदेश कहने लगते हैं…..

सारांश यह कि धर्म बहुत व्यापक है जबकि मानव निर्मित नियम व कानून संकीर्ण बहुत सिमित दायरे में है | जैसे साउदी का कानून अलग होगा तो चीन का अलग तो भारत का अलग | जो काम भारत के कानून में अपराध नहीं, वही साउदी में अपराध हो सकता है | जो काम हिन्दुओं में गलत माना जाता है, वह मुस्लिमों में सहज स्वीकार होगा | जैसे कि हिन्दू पश्चिम की और मुख करके पूजा नहीं करते, जबकि मुस्लिम पश्चिम की ओर मुख करके ही पूजा करते हैं भारत में | हिन्दू अपने सगे सम्बन्धियों से विवाह नहीं करते लेकिन मुस्लिमों में यह विवाह स्वीकार है, यहाँ तक कि बेटी के रूप में गोद ली बची से भी विवाह मान्य है और हिन्दुओं में यह अनर्थ है अपराध है |

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इसलिए जब सनातन धर्म स्वतंत्रता की बात कहता है तो वह स्वतंत्रता उच्ख्रंलता नहीं केवल स्वतंत्रता होती है | क्योंकि सनातन सम्पूर्ण सृष्टि का धर्म है, केवल मानवों का नहीं | इसमें पशु-पक्षियों, कीड़े मकोड़ों से लेकर सम्पूर्ण ब्रहमांड के समस्त तारे, ग्रह, नक्षत्र, आकाशगंगाएं हर वह चीज आ जाती है जिसके विषय में हम अभी जानते भी नहीं | आप जिसे धर्म कह रहे हैं वह केवल मानव निर्मित वे नियम है जो कुछ समाज पर लागू हैं और कुछ पर नहीं | जबकि जब मैं सनातन धर्म कहता हूँ तो वह सभी पर लागु है… फिर वह मानव हो या पशु-पक्षी…. और जब इनमें से कोई धर्म विरुद्ध आचरण करे तो उसे दंड भी मिलता है और कठोर दंड मिलता है लेकिन वह दंड ईश्ववर स्वयं देता है | इसलिए किताबी धर्म केवल किताबी होते हैं, किताब पढ़कर कोई धार्मिक नहीं बन सकता है… जबकि सनातन धर्म बिना किताब पढ़े भी धार्मिक बना देती है 🙂

यहाँ के घटना का लिंक दे रहा हूँ जो आपको सनातनं धर्म और मानव निर्मित धर्म का अंतर स्पष्ट समझा देगा | इस घटना में एक तरफ वह कानून जिसके अंतर्गत जंगली हाथियों का वध करने का आदेश है क्योंकि उन्होंने आतंक मचा रखा था… यानी बिलकुल वैसा ही आदेश पारित हुआ जैसे वर्तमान भारतीय सरकारों ने बंदरों, नीलगायों को मारने का आदेश दे रखा है | लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसके अंतर्मन से इस आदेश को अमानवीय माना और उसने उन आतंकी हाथियों को सुरक्षा प्रदान की | कुछ वर्ष बाद जब उस व्यक्ति की मृत्यु हुई तो उन्हीं जंगली आतंकी हाथियों का दो समूह उसे श्रृद्धांजलि देने बारह घंटे की यात्रा करके पहुँचे उसके घर और दो दिन तक वहीँ बैठे रह कर उस महान आत्मा को श्रृद्धांजलि दी… जरा सोचिये उनको कैसे पता चला कि उसकी मृत्यु हो गयी ? सारा समूह कैसे उस जगह पहुँचे जहाँ वह रहता था… उनको पता किसने दिया उसका ? और उससे भी बड़ी बात कि उनको कैसे पता चला कि उनको मारने का आदेश पारित हुआ हैऔर इस व्यक्ति ने उनकी जान बचाई है ? ~विशुद्ध चैतन्य

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For 12 hours, two herds of wild South African elephants slowly made their way through the Zululand bush until they reached the house of late author Lawrence Anthony, the conservationist who saved their lives.

The formerly violent, rogue elephants, destined to be shot a few years ago as pests, were rescued and rehabilitated by Anthony, who had grown up in the bush and was known as the “Elephant Whisperer.”

For two days the herds loitered at Anthony’s rural compound on the vast Thula Thula game reserve in the South African KwaZulu – to say good-bye to the man they loved. But how did they know he had died March 7?


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