आशा करता हूँ कि इस नए वर्ष में सभी आत्मचिंतन करेंगे और निंदा-निंदा खेलने के स्थान पर कुछ सकारात्मक व सौहार्दपूर्ण उपलब्धि प्राप्त करेंगे |

मुझे बहुत ही आश्चर्य होता है जब संस्कृति के नाम पर हर वर्ष अंगेजी वर्ष का विरोध दिखाते है और फिर साल भर तनखा उसी कैलेण्डर के अनुसार लेते हैं, ट्रेन की टिकट से लेकर हवाईजहाज की यात्रा तक उसी कैलेण्डर के अनुसार करते हैं | निशाचर काल यानि अर्धरात्रि (night shift) में कार्य करते हैं | जबकि वैदिक काल में तो रात्री का प्रहर प्रेत और निशाचरों के विचरण का प्रहर होता था |

फिर आश्चर्य की बात यह कि अपना सन्देश भी वे वैदिक नियमों के विरुद्ध ही करते हैं क्योंकि वैदिक काल में सन्देश देने के लिए फेसबुक, ट्विटर आदि का प्रयोग नहीं होता था | और न ही हमारे किसी शास्त्र में कहीं ऐसा वर्णन है कि इस प्रकार के संदेशों को फेसबुक या ट्विटर से दिया गया |

अपनी संस्कृति का सम्मान करना ही है तो सबसे पहले अपने बच्चों को मर्यादित भाषा व व्यवहार सिखाइये और अपनी संस्कृति व व्यवहार को श्रेष्ठ बनाइये ताकि लोग स्वयं ही आकर्षित होने लगें | लेकिन विरोध का यह तरीका इसलिए ठीक नहीं मानता मैं, क्योंकि इसमें हीनता का बोध होता है और हम यह जताना चाहते हैं कि हम स्वयं तो योग्य हो नहीं पाए, इसलिए विरोध करके अपनी भड़ास निकाल रहे हैं | ठीक वैसे ही जैसे आइसिस और अलकायदा या मुस्लिम देश करते हैं | क्योंकि वे स्वयं उठ नहीं पाए तो दूसरों को पीछे धकेलने में लगे हुए हैं |

आशा करता हूँ कि इस नए वर्ष में सभी आत्मचिंतन करेंगे और निंदा-निंदा खेलने के स्थान पर कुछ सकारात्मक व सौहार्दपूर्ण उपलब्धि प्राप्त करेंगे | -विशुद्ध चैतन्य

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