‘स्वयं ही स्वयं का प्रकाश बनो’

कृष्णानंद

कई बड़ी बड़ी संस्थाएं हैं, कई बड़ी बड़ी कम्पनियाँ हैं, कई बड़े बड़े नेता हैं, डंडे-तलवारें लेकर मार्च करने वाली धार्मिक सेनाएं हैं, लाखों करोड़ों के घोटाले करने वाले महान घोटालेबाज हैं, लाखों रूपये की गाड़ियों में घुमने वाले धनकुबेर हैं….लेकिन उनका दिल इतना संकीर्ण कि किसी को पानी भी न पूछें कभी | नफरत के कारोबार में लिप्त धर्मों के ठेकेदारों को होश ही नहीं कि वे कब धर्म से विमुख हो गये और शैतान के अनुयाई बन गये |

और ये सारे लोग मिलकर भी वह नहीं कर पाए जो एक गरीब किसान ने कर दिखाया | ये सारे लोग तो मिलकर भी वह काम नहीं कर पाए जो दशरथ माँझी ने कर दिखाया… क्योंकि धर्म क्या है वह केवल गरीब ही जानता है, बाकी तो केवल धार्मिक होने का ढोंग करते हैं क्योंकि ईश्वर को वे मोटा कमिशन चढ़ाकर इस भ्रम में जीते हैं कि उन्होंने ईश्वर को सेट कर लिया | इन लोगों के पास धन की कोई कमी नहीं, लेकिन इनका परिवार बहुत ही सीमित होता है | जबकि किसी गरीब का परिवार पूरा गाँव होता है | एक अमीर केवल अपने और अपने सगे सम्बन्धियों की चिंता करता है, जबकि एक गरीब पूरे गाँव की चिंता करता है | जो लोग हिन्दू मुस्लिम के हितैषी बने फिरते हैं, वे केवल चुनाव के समय ही नजर आते हैं और वह भी नफरत फैलाने के लिए, न कि समस्याएं सुलझाने के लिए | वैसे भी ये लोग समस्याएँ सुलझाते नहीं, बल्कि समस्याएं बढ़ाते ही हैं | लेकिन गाँव के इस गरीब ने अकेले ही गाँव की समस्या सुलझाने का बीड़ा उठाया….क्योंकि यह अब तक सनातन धर्म के अथाह सागर से निकलकर हिन्दू नाम के दड़बे में नहीं आ पाया था | अभी तक इसमें संकीर्णता नहीं आ पायी थी, अभी तक इसमें आधुनिक धार्मिक सिद्धांत ‘पहले मेरा भला, उसके बाद फिर मेरा ही भला’ को अपना नहीं पाया था और सनातन सिद्धांत ‘मेरा भला हो या न हो, दूसरों का भला होना चाहिए’ तक ही सीमित रह गया था |

वास्तव में सनातन धर्म की समझ तो कई दशकों पहले ही समाप्त हो चुकी थी | हालांकि सनातन के नाम से कई कई संस्थाएं चल रहीं हैं लेकिन उन्हें भी सनातन धर्म का पता नहीं | कुछ लोग हिन्दुइज्म को सनातन कहते हैं, लेकिन हम ध्यान दें तो हिन्दुइज्म भी धर्म नहीं, एक पंथ या सम्प्रदाय है और जैसे अन्य पंथों या सम्प्रदायों के संस्थापक व अराध्य हैं, वैसे ही हिन्दुइज्म के भी हैं | मेरा मानना है कि हिन्दुइज्म की स्थापना या तो राम ने की है या फिर आदिशंकराचार्य ने | क्योंकि हिन्दुओं के अराध्य राम हैं और इनका आधार ग्रन्थ गीता, रामायण और हनुमान चालीसा | जिस प्रकार इस्लाम या अन्य पंथों में केवल एक ही ईश्वर एक ही धार्मिक ग्रन्थ को महत्व दिया जाता है, ठीक वैसे ही हिन्दुइज्म में है | जिस प्रकार इस्लामिक मान्यताओं वाले दुसरे मत-मान्यताओं को मिटा देना चाहते हैं और अपना कुनबा बड़ा करना चाहते हैं, वही हिन्दू धर्म के लोग भी चाहते हैं | ध्यान दें तो इस्लाम और हिन्दुइज्म एक दूसरे के विरोध में एक दूसरे की नकल मात्र है | दोनों ही अपने ही धर्म के अनुयाइयों के सहयोगी नहीं है, लेकिन दूसरे धर्म की निंदा करने में दिन रात एक किये रहते हैं |

लेकिन सनातन धर्म संकीर्णताओं से पुर्णतः मुक्त है | गौतम बुद्ध ने सनातन धर्म को समझने के बाद ही उससे एक सूक्त बनाया जिसका अर्थ है, ‘स्वयं ही स्वयं का प्रकाश बनो’ | तो सनातन स्वयं के भीतर से समझा व जाना जाता है न कि बाहर से | सनातन स्वयं को जागृत करने को महत्व देता है न कि किताबी ज्ञान का रट्टा मारने को | सनातन धर्म कहता है कि स्वयं को जानने समझने के लिए, ईश्वर जानने समझने के लिए स्वविवेकानुसार ही मार्ग चुनो | सनातन धर्म किसी पर कुछ भी नहीं थोपता यहाँ तक कि कोई नियम या सिद्धांत भी नहीं | वह स्वतंत्र कर देता है | और यही कारण था कि भारत वर्ष में कई मान्यताएं व संस्कृतियाँ साथ साथ पली-बढीं | सनातन धर्म में ही यह सुविधा है कि एक ही परिवार के सदस्य भिन्न भिन्न पंथ या मतों के अनुयाई हो सकते हैं | एक ही परिवार में कोई मांसाहारी तो कोई शाकाहारी हो सकता है.. यही सनातन धर्म की विशेषता है | और उससे भी बड़ी बात यह कि सनातन धर्म किताबों पर आधारित नहीं, बल्कि स्वविवेक पर आधारित धर्म है | जो जितना जागृत होता जाता है वह उतना ही धर्म को समझता जाता है और यह समझ उसे भीतर से ही प्राप्त होती है जैसे की कृष्णानंद को प्राप्त हुई | सनातन का अहम सिद्धांत ‘ईश्वर ने जो शरीर व मस्तिष्क दिया, उससे अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुँचाने के उपाय खोजना, लेकिन बदले में कोई अपेक्षा न रखना’| और कृष्णानंद को जैसे ही सनातन धर्म का यह ज्ञान जागृत हुआ उसने वह काम कर दिखाया जो किसीने कभी कल्पना भी नहीं की थी | दशरथ माँझी ने भी सनातन धर्म को ही आत्मसात किया और वह कर दिखाया जो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था | लेकिन जो सनातनी नहीं होते, वे पहले अपना भला देखते हैं और फिर फुर्सत मिला तो दूसरों का भला करने का सोचते हैं | और कई बार तो भला करने का सोचते सोचते दुनिया से ही विदा हो जाते हैं क्योंकि अपना भला करने से फुर्सत ही नहीं निकाल पाए थे | चलिए सनातन धर्म को समझते हैं कृष्णानन्द के प्रेरणादाई सत्यकथा से |

बिहार के दशरथ मांझी की तरह एक कहानी बुन्देलखण्ड में भी सामने आयी है। इस कहानी को दोहराया है कृष्णानन्द ने। बुन्देलखण्ड के हमीरपुर इलाके के बड़ा पचखुरा गांव कृष्णानन्द का बसेरा है। बुन्देलखण्ड के हर इलाके की तरह हीं हमीरपुर जिले में भी मौसम कि मार पड़ी। हालात इस कदर नाजुक हो गए की कई कई गांवो में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई है। सूखे खेत, नहरें और नदियां लोगो के चेहरों को मुरझा रही है। बावजूद इसके किसी ने भी पाने बचाने के लिए कोई ठोस इंतजाम नही किया।

अपनी गांव की प्यास देख कर कृष्णानन्द ने खुद ही एक आठ बीघा का तालाब खोद कर मिसाल पैदा कर दी। करीब एक साल से दिन रात जी तोड़ कर अपनी मेहनत और लगन से कृष्णानन्द ने 8 फुट गहरा तालाब महज इस लिए खोद डाला कि आने वाली बारिश से यह पानी से लबालब हो जायेगा और उसके गांव के लोगो और जानवरों को पानी के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा।

कृष्णानन्द ने अकेले जब इस तालाब कि खुदाई शुरू कि तो गांव वालो ने उसे पागल कहते हुए उसका मजाक उड़ाया लेकिन कृष्णानन्द ने हार नहीं मानी और अपने अटूट इरादों से तालाब को खोदने में जुटा रहा और आज वो गांव वालो के लिए एक सबब बन गया है !

सरकार इस समय बुन्देलखण्ड में खेत तालाब योजना पर बल दे रही है। मनरेगा से भी तालाबों कि खुदाई हो रही है लेकिन तालाब की खुदाई में महज 2 फुट की गहराई के लिए मजदूरों को 200 से 250 रुपये का भुगतान किया जाता है। कृष्णानन्द ने अकेले दम ही 8 फुट गहरा तालाब खोद डाला है। 8 फुट की गहराई से मिट्टी ऊपर लाकर पुरे तालाब की मेडबंदी भी कर दी है। जिस काम को सैकड़ों मजदूर करते, उस काम को कृष्णानन्द ने अकेले ही दम भूखे पेट रह कर अंजाम दे डाला है।

कृष्णानन्द की इस पहल ने बुन्देलखण्ड में बारिश के पानी के प्रबन्धन की एक नई पहल शुरू की है। एक तरफ मौसम की मार दूसरी तरफ सिस्टम कि बेरुखी लेकीन कृष्णानन्द ने हार नही मानी और तालाब खोदने का काम जारी रखा। बचपन से ही सन्त जीवन जीने वाले कृष्णानन्द ने पुरे गांव को ही अपना परिवार मान लिया और गांव में मची पानी के लिए त्राहि-त्राहि के लिए उन्हें तालाब खोद कर बारिश के पानी को जमा करने का ठोस प्रबन्ध कर लोगो को वर्षा जल संचित करने की एक अनूठी मिसाल दे डाली। साथ ही साथ सरकारी मशीनरी को भी एक सीख दी।

~विशुद्ध चैतन्य

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