हम पशुओं से भी बदतर होते चले जा रहे हैं क्योंकि हम पराश्रित हैं


एक खबर आप सबने भी पढ़ी होगी जिसमें गुजरात की एक खिलाडी महिला अपने चौवालिस मेडल्स नीलाम करने के लिए विवश हो गयी आर्थिक तंगी के कारण… सामान्य खबर है.. कोई महत्पूर्ण नहीं है… पढ़ी होगी और भूल भी गये होंगे अब तक | लेकिन मैं ऐसी ख़बरों को महत्वपूर्ण मानता हूँ क्योंकि ये ख़बरें हमारी आँखें खोलती हैं और हमें बताती हैं कि हम पशुओं से भी बदतर होते चले जा रहे हैं क्योंकि हम पराश्रित हैं | जबकि पशु कम से कम आत्मनिर्भर तो हैं ! 
मानव पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हो चुका है | अब वह नौकरी न मिले तो आत्महत्या करने लगा है, अब परीक्षा में नम्बर कम आये तो आत्महत्या करने लगा है…यानी खुद का कोई मान सम्मान ही नहीं बचा | जो लड़की अपने मेडल बेच रही थी वह भी इसी क्रम में है और लोग सरकार को कोस रहे हैं कि वह इस लड़की एक लिए कुछ नहीं कर रही | लेकिन वह समाज कहाँ मर गया जो नैतिकता और धर्म के नाम पर डंडा लेकर पीछे पड़ा रहता है ? यही लड़की कल किसी लड़के के साथ घूमते मिले, तो नैतिकता खतरे में पड़ जाएगा समाज का, कल यह किसी गैर धर्म के लड़के से विवाह करने जायेगी तो धर्मों के ठेकेदारों का धर्म, संकट में पड़ जायेगा… लेकिन अभी इस हालत में सरकार दोषी है और समाज गया हुआ है घास चरने |

किसी को कोई मैडल या उपाधि किसी खेल या शौर्य के लिए, दिया जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि उसकी सारी जिम्मेदारी सरकार की हो गयी और समाज की जिम्मेदारी खत्म हो गयी | मैडल मिलने का यह अर्थ भी नहीं कि विजेता अब आत्मनिर्भर होने के अपने प्रयास ही बंद कर दे, और सरकार के भरोसे बैठ जाये | खेलों की गरिमा बनाये खेलने को खेल के रूप में लेने में है, न कि उसे व्यवसाय बनाने में |

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कोई भी खेल खेलें उसे शौक समझ कर खेलें | साथ ही ऐसे उपाय खोजें जिससे आपके पास आय का स्त्रोत बना रहे | खेल पर ही निर्भर न रहें.. न ही मेडल को अपमानित करें बेचकर…और यदि किसी खिलाड़ी को मेडल बेचने की नौबत आ गयी तो उसका दोषी समाज है, सरकार नहीं | उसका दोषी हैं उसके पड़ोसी जिन्होंने उसकी सहायता नहीं की | उसके मेडल को बिकने से बचाना पूरे गाँव या मोहल्ले की जिम्मेदारी है क्योंकि वे मैडल केवल उस खिलाड़ी का नाम कीर्तिमान नहीं करते, बल्कि उस गाँव या मोहल्ले का नाम भी विश्वपटल पर चमकाते हैं |

मेरे पास कुछ लड़के आये गाँव से और अपनी बेरोजगारी से लेकर भूमाफियाओं द्वारा अवैध भूमि अधिग्रहण तक की कई शिकायतें लेकर आये | वे युवाओं की एक कमेटी बनाना चाहते थे और चाहते थे कि मैं उनका नेतृत्व करूँ और मार्गदर्शन दूं कि युवावर्ग बेरोजगार गाँव में घुमने की बजाय क्या महत्वपूर्ण कर सकते हैं कि वे गाँव की जमीन भी बचा पायें और रोजगार की व्यवस्था भी हो जाए |

यह बात मुझे अच्छी लगी कि गाँव के युवा कम से कम अपने ही गाँव में रहकर भूमि की रक्षा करते हुए अपने लिए कोई रोजगार भी चाहते हैं | मैंने उनसे कहा कि आप सभी के पास इतनी जमीन है कि यदि सभी मिलकर फूल या तुलसी की खेती करो तो अपने ही घर बैठे अच्छी कमाई हो जाएगी | आप लोगों को न तो नौकरी करने की आवश्यकता पड़ेगी और न ही किसी के सामने हाथ फ़ैलाने की | आपस में संगठित रहोगे तो भूमाफिया गाँव की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेंगे |

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इसी प्रकार यदि हर युवा आत्मनिर्भर होने के लिए अपने आसपास ही उपाय खोजना शुरू कर दे, तो उसे कोई न कोई उपाय मिल ही जाएगा | लेकिन नेताओं के वायदों के भरोसे बैठे रहे, यदि सरकार की नौकरी के भरोसे बैठे रहे, तो कोई समृद्ध नहीं हो पायेगा और गाँव पर बाहरी लोगों का आधिपत्य हो जायेगा | फिर गाँव गाँव नहीं रह जाएगा, कारखाने और गोदामों के कारण गाँव रहने लायक भी नहीं रह जायेगा | न स्वच्छ पीने का पानी मिलेगा और न ही स्वच्छ हवा मिलेगा जीने के लिए | ~विशुद्ध चैतन्य

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