सांप्रदायिकता कट्टरता और उसी की भयानक उपज धर्मांधता ने लंबे वक्त से इस सुंदर धरती को जकड़ रखा है…

11 सितंबर 1893 को शिकागो में धर्मसंसद शुरू हुई। स्वामी विवेकानंद का नाम पुकारा गया। सकुचाते हुए स्वामी विवेकानंद मंच पर पहुंचे। वो घबराए हुए थे। माथे पर आए पसीने को उन्होंने पोंछा। लोगों को लगा कि भारत से आया ये नौजवान संन्यासी कुछ बोल नहीं पाएगा। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु का ध्यान किया और इसके बाद उनके मुंह से जो बोल निकले, उसे धर्म संसद सुनती रह गई। स्वामी विवेकानंद के पहले शब्द थे अमेरिका के भाइयो और बहनो। ये सुनते ही वहां करीब दो मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही।

इसके बाद स्वामी विवेकानंद ने ज्ञान से भरा ऐसा ओजस्वी भाषण दिया जो इतिहास बन गया। उनकी वहां उपस्थिति का सर्वोत्तम वर्णन उनके अपने पत्र में मिलता है, जो उस आयोजन के दो महीने बाद उन्होंने लिखा था –

 “एक भव्य जुलूस के बाद हमें एक कतार में मंच पर ले जाया गया था. कल्पना कीजिए कि नीचे एक हाल और उसके अंदर एक विशाल गैलरी, जिनमें छह या सात हजार स्त्री व पुरुष खचाखच भरे हुए थे. और मुझे, जिसने उससे पहले कभी सार्वजनिक भाषण नहीं दिया था, उस सम्मानित समूह को संबोधित करना था!””निस्संदेह, मेरा हृदय धड़क रहा था और मेरी जबान लगभग सूख गई थी. मैं इतना अधीर था कि मैंने सुबह बोलने का जोखिम नहीं लिया. वे सभी तैयारी से और पूर्व-रचित भाषणों के साथ आए थे. मैं ही मूर्ख था, जिसके पास कोई तैयार भाषण नहीं था, परंतु मैंने देवी सरस्वती को नमन किया और उठ खड़ा हुआ. मैंने एक छोटा-सा भाषण दिया। मैंने समूह को संबोधित किया, “अमेरिका की बहनों और भाइयों!’ जिसको दो मिनट तक करतल-ध्वनि से स्वागत हुआ और फिर मैं आगे बढ़ा-और जब वह समाप्त हुआ तो मैं भावशून्य होकर बैठ गया.”

जब इस भाषण का समाचार भारत पहुंचा तो विवेकानंद के विचारों और जिस तरह से उन्हें ग्रहण किया गया था, ने खलबली मचा दी. बाद में जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा कि विवेकानंद “दबे हुए और उत्साहीन हिंदू मानस में एक टॉनिक बनकर आए और उसके भूतकाल में से उसे आत्मसम्मान व अपनी जड़ों का बोध कराया.”

अमेरिका की बहनों और भाइयो!

आपने हमारा जैसा हार्दिक और स्नेहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए आभार व्यक्त करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा मन एक अकथनीय आनंद से भरा हुआ है.

मैं विश्व की सबसे प्राचीन संन्यासियों की पंरपरा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं आपको धर्मो की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी वर्गो एवं पंथों के करोड़ों हिंदुओं की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं.

इस मंच पर आए उन कुछ वक्ताओं को भी मेरा धन्यवाद, जिन्होंने पूर्व से आए प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हुए आपको बताया कि दूर देशों से आए हुए ये सज्जन विभिन्न देशों में सहिष्णुता का संदेश पहुंचाने के सम्मान के अधिकारी हो सकते हैं.

मुझे उस धर्म से संबंधित होने का गर्व है, जिसने विश्व को सहिष्णुता औ सार्वभौमिक स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाया. हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मो की सत्यता को स्वीकार करते हैं.

मुझे उसे देश से संबंधित होने में भी गर्व है, जिसने इस प्थ्वी के सभी धर्मो व सभी देशों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है.

मुझे आपको यह बताने में गर्व है कि हमने उन पवित्र इजराइलियों को अपने कलेजे से लगाया है, जिन्होंने ठीक उसी वर्ष दक्षिण भारत में आकर शरण ली, जब रोमन अत्याचारियों ने उनके पवित्र मंदिर को ध्वस्त कर दिया था.

मुझे उस धर्म से संबंधित ह
ोने का गर्व है, जिसने महान जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को शरण दी है और अब भी उनके विकास में सहयोग दे रहे हैं.

भाइयों, मैं आपके सामने उस भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत करूंगा, जिसको मैं अपने बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे करोड़ों लोग प्रतिदिन दोहराते हैं –

‘जैसे विभिन्न स्रोतों से उद्भूत विभिन्न धाराएं

अपना जल सागर में विलीन कर देती हैं,

वैसे ही हे ईश्वर! विभिन्न प्रवृत्तियों के चलते

जो भिन्न मार्ग मनुष्य अपनाते हैं, वे

भिन्न प्रतीत होने पर भी

सीधे या अन्यथा, तुझ तक ही जाते हैं.’

वर्तमान सम्मेलन, जो अब तक हुई सबसे महान सभाओं में से एक है, स्वयं ‘गीत’ में बताए उस अद्भुत सिद्धांत का पुष्टीकरण और विश्व के लिए एक घोषणा है –

‘जो कोई, किसी भी स्वरूप में

मेरे पास आता है, मुझे पाता है;

सभी मनुष्य उन मार्गो पर

संघर्षरत हैं, जो अंत में उन्हें मुझे तक ही ले आते हैं.’

सांप्रदायिकता कट्टरता और उन्हीं की भयानक उपज धर्माधता ने बहुत समय से इस सुंदर पृथ्वी को ग्रस रखा है. उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार उसे मानव रक्त से सराबोर कर दिया है, सभ्यता को नष्ट किया है और समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल दिया है. यदि ये राक्षसी कृत्य नहीं किए जाते तो मानव समाज उससे बहुत अधिकविकसित होता, जितना वह आज है. परंतु उनका अंतकाल आ गया है; और मुझे पूरी आशा है कि इस सम्मेलन के सम्मान में सुबह जो घंटानाद हुआ था, वह सभी प्रकार के कट्टरपन, सभी प्रकार के अत्याचारों, चाहे वे तलवार के जरिए हों या कल के- और व्यक्तियों, जो एक ही उद्देश्य के लिए अग्रसर हैं, के बीच सभी प्रकार की दुर्भावनाओं के लिए मृत्यु का घंटानाद बन जाएगा.

इसके बाद जितने दिन भी धर्म संसद चली स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म, और भारत के बारे में दुनिया को वो ज्ञान दिया जिसने भारत की नई छवि बना दी। इस धर्म संसद के बाद स्वामी विवेकानंद विश्व प्रसिद्ध हस्ती बन गए। हाथ बांधे हुआ उनका पोज शिकागो पोज के नाम से जाना जाने लगा। स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण के बाद इसे थॉमस हैरीसन नाम के फोटोग्राफर ने खींचा था। हैरीसन ने स्वामी जी की आठ तस्वीरें ली थीं जिनमें से पांच पर स्वामी जी ने अपने हस्ताक्षर भी किए थे। अगले तीन साल तक स्वामी विवेकानंद अमेरिका में और लंदन में वेदांत की शिक्षाओं का प्रसार करते रहे।

15 जनवरी 1897 को विवेकानंद अमेरिका से श्रीलंका पहुंचे। उनका जोरदार स्वागत हुआ। इसके बाद वो रामेश्वरम से रेल के रास्ते आगे बढ़े। रास्ते में लोग रेल रोककर उनका भाषण सुनने की जिद करते थे। विवेकानंद विदेशों में भारत के आध्यात्मिक ज्ञान की बात करते थे लेकिन भारत में वो विकास की बात करते थे। गरीबी, जाति व्यवस्था और साम्राज्यवाद को खत्म करने की बात करते थे। रामेश्वरम से मद्रास होते हुए विवेकानंद कोलकाता पहुंचे, वो कोलकाता जो उनकी जन्मभूमि थी और लंबे वक्त तक उनकी कर्मभूमि रही।

शिकागो की धर्म संसद से भारत लौटने पर 1 मई 1897 को स्वामी विवेकानंद ने राम कृष्ण मिशन की नींव रखी। राम कृष्ण मिशन नए भारत के निर्माण के लिए अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और साफ-सफाई के काम से जुड़ गया। स्वामी विवेकानंद नौजवानों के आदर्श बन गए। 1898 में उन्होंने बेलूर मठ की स्थापना की। 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में ही स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया लेकिन उनके कहे शब्द आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं, जिसका मूल मंत्र है….उठो जागो और लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुको मत।

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