बीएसएनएल ब्रॉडबैंड का एंटीना

यह है हमारे आश्रम की शान बीएसएनएल ब्रॉडबैंड का एंटीना | पिछले सौ साल के इतिहास में पहली बार पिछले साल इसकी स्थापना बहुत ही धूम धाम और विरोधपूर्ण वातावरण में हुआ | लोगों ने मुझे अधर्मी, ढोंगी, पाखंडी, आश्रम की मर्यादा-भंग करने वाला…. जैसी बहुत सारी उपाधियों से सम्मानित किया था इस साहसिक व ऐतिहासिक कार्य के लिए ….चलिए छोड़िये मैं भी क्या पुरानी बातों को लेकर बैठा रहता हूँ | जब देखो अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बना रहता हूँ….

जब भी कभी बाहर दूसरों को देखता हूँ तो खुद के निकम्मेपन पर शर्म आती है शायद यही कारण है कि मैं हमेशा अपनी बड़ाई करता रहता हूँ | यह एक मनोवैज्ञानिक बीमारी भी है अपनी कुंठा के कारण व्यक्ति अपनी बड़ाई खुद ही करने लगता है | जबकि महान लोग कभी अपनी बड़ाई खुद नहीं करते बल्कि ऐसे टुच्चे कामों के लिए चमचे और चापलूस पालकर रखते हैं | आज कल तो पढ़े-लिखे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वालों का ज़माना है तो प्रोफेशनल्स रखे जाते हैं, मीडिया खरीदे व किराए पर लिए जाते हैं…. अरबों खरबों का व्यापार होता है….

अब मैं कोई चायवाला आम आदमी तो हूँ नहीं कि मीडिया को करोड़ों रूपये देकर बुला सकूं | वह भी इतनी सी बात बताने के लिए कि सौ साल के इतिहास में पहली बार हमारे आश्रम ने ठाकुर दयानंद के स्वप्न को पूरा करते हुए पहला कदम उठाया | उनका स्वप्न था की आश्रम तकनीकी रूप से समृद्ध हो, लेकिन उनके शिष्यों ने समझा कि तनिक भी समृद्ध न हो | इसलिए उन्होंने इसे खंडहर बनाने के लिए दिन रात साधना और कीर्तन-भजन किया और तब जाकर यह खंडहर बन पाया…..यह बड़ी बुरी बिमारी है मेरी कि कहना कुछ था और कहने कुछ और लगा |

READ  बड़े ही आश्चर्य की बात है कि प्रकृति स्वयं अनपढ़ है, उसने कोई शास्त्र नहीं पढ़े, कोई डिग्री नहीं ली और....

हाँ तो मैं कह रहा था कि छः महीने पहले तक तो सब कुछ ठीक था कोई परेशानी नहीं थी | इन्टरनेट आराम से चल रहा था | अभी कुछ महीनों से बीएसएनएल ने तकनीक में सुधार किया और सिग्नल अब मोबाइल हो गया | कभी पूरब से सिग्नल मिलता है तो कभी पश्चिम से और कभी उत्तर दिशा से | तो मुझे हर दो तीन दिन में दिशा बदलना पड़ता है एंटीना का | जब मैं एंटीना घुमा कर सिग्नल बढ़ा रहा होता हूँ तो मुझे बचपन की याद आ जाती है | बचपन में भी इसी प्रकार मेरी ड्यूटी लगी होती थी एंटीना घुमाने की जब दूरदर्शन में कोई अच्छी फिल्म आने वाली होती थी | और जिनके घर हम टीवी देखने जाते थे उनके और भी न जाने कितने पड़ोसी अपने अपने चाय नाश्ते का सामान लेकर बैठे होते थे | तो ऐसे में पिक्चर साफ़ न आये तो मेजबान की बेईज्ज़ती खराब हो जाती थी | -विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of