अब इन नेताभक्तों, अंधभक्तों, मूढ़-भक्तों से तब तक के लिए दूरी रखनी आवश्यक है

भारत आज एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर अग्रसर है | आज मूढ़भक्तों की अहमियत कम होती जा रही है और जागरूक व राष्ट्रभक्त लोगों के विचारों में अधिक खुलापन आने लगा है | आज धर्म और जाति की दीवारें कमजोर पड़ने लगीं हैं, क्योंकि अब लोगों में मानवता जागृत होने लगा है | अब लोग यह समझने लगे हैं कि वे हिन्दू-मुस्लिम, ब्राह्मण-शुद्र, मारवाड़ी-बिहारी….बनने के लिए इस दुनिया में नहीं आये थे | वे आये हैं मानव बनने के लिए और मानवोचित कार्यों अर्थात मानवता व सृष्टि के लिए सहयोगी होने के लिए |

इसलिए अब इन नेताभक्तों, अंधभक्तों, मूढ़-भक्तों से तब तक के लिए दूरी रखनी आवश्यक है, जब तक नेताओं, बाबाओं में मानवता न आ जाए या कोई ऐसा नेता न दिख जाए जो मानवों का नेता हो और उनके साथ दुमछल्ले नहीं, समर्थक हों  | जिन्हें अपने नेता की गलतियाँ भी देखने और उसके विरोध में बोलने का साहस हो |

“याद रखिये ! सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और अन्यायियों के साथ समझौता करना है |” ~नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

दुमछल्लों, अंध-भक्त और मूढ़-भक्तों का अपना महत्व है क्योंकि उनके पास अपना कोई दिमाग तो होता नहीं और न ही निजी कोई आस्तित्व होता है | वे तो जहाँ जयकारा लगते देखते हैं, जिधर भीड़ अधिक दिखती है, वहीं का रुख कर लेते हैं | उन्हीं के कारण भ्रम बनता है कि सामने वाला कोई समझदार या ताकतवर व्यक्ति होगा जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है | क्योंकि समझदार और ताकतवर नेता तो अधिकाँश अकेले ही जीते है | उदाहरण के लिए सुभाषचंद्र बोस | क्योंकि भेड़ें शेरों के साथ कम ही खड़ी हो पाती हैं | हाँ यह और बात है कि मानवों को समझ में आ जाये कि वे भेड़ें नहीं मानव है, तब वे जिसके समर्थन में खड़े होंगे उस नेता का वास्तव में महत्व होगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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