जो लोग सेक्स का विरोध करेंगे वे काम वासना में फँसे रहेंगे

आज सुबह फेसबुक खोलते ही पहला मैसेज जो मिला वह था,

“सर में ओशो रजनीश के विचारो का समर्थक हु पर नजाने क्यों में खुल कर समर्थन नहीं कर पाता ? मुझे इसकी सिर्फ एक वजह लगती हे की वो फ्री सेक्स के समर्थन मे थे। आप अपना जवाब पोस्ट के जरिये दीजिये | अगर आप चाहे तो इन बॉक्स मे देदे पर मैं चाहता हूँ सबको पता चले की हम जैसे लोग भी ओशो के समर्थक है ।” -एक सुन्नी मुस्लिम

यदि धार्मिक कूपमंडूकता से मुक्त कोई संत हुए या मेरी आत्मा ने जिनको स्वीकार, या मैं जिनके विचारों से सहमत हुआ, वह गौतम बुद्ध हैं या फिर ओशो | दोनों ही अहिंसक थे और दोनों के अनुयाई सभ्य व शालीन | दोनों ही ध्यान को महत्व देते हैं, दोनों ही स्वयं को जानने पर महत्व देते हैं और दोनों ही दूसरों की जय से पहले, खुद की जय करने योग्य होने की प्रेरणा देते हैं | दोनों ही आपको बंधन-मुक्त करते हैं और दोनों भेदभाव से मुक्त होकर आध्यात्मिक उत्थान के लिए प्रेरित करते हैं |

अब ओशो से लोगों को भय इसलिए है क्योंकि धर्मों और नैतिकता के ठेकेदारों ने उनके विरुद्ध संगठित होकर अभियान चलाया | उनके शिष्याओं से वे बातें कहलवायीं जो समाज की नजरों में गलत था…. यह भी अच्छा ही हुआ | समाज ने सिद्ध किया कि वह सेक्स से स्वयं इतने विकृत रूप से ग्रसित हैं कि सिवाय सेक्स के और कुछ सोच ही नहीं सकते | और आप देखते ही होंगे अखबारों में, आये दिन धर्मों के ठेकेदार बलात्कार, सेक्स रेकेट आदि के केस में धरे जा रहे हैं |

तो आपके ये ठेकेदार खुद ऐय्याशी करें तो गलत नहीं, लेकिन कोई सेक्स के विषय में सही जानकारी दे तो वह गलत ?

वैसे में ओशो का अनुयाई नहीं हूँ, बस उनके विचारों से सहमत हूँ |  मैं यह मानता हूँ कि भय उसी से होता है, जो अपरिचित हो इसलिए सेक्स को जानना समझना आवश्यक है | किसी ऐसे व्यक्ति को एक४७ पकड़ा दो जो उससे भयभीत हो या अनजान हो, तो वह उपद्रव करेगा, वह क़त्ल-ए-आम करेगा | शराब भी यदि संतुलित मात्रा में ली जाये तो अमृत हो जाता है और दवा भी यदि अनियंत्रित मात्रा में ली जाये तो ज़हर हो जाता है | तो स्त्री अरु पुरुष एक दूसरे के मार्ग के बाधक नहीं, बल्कि सह्मार्गी हैं | यदि हम स्त्री और पुरुष के आपसी महत्व को नहीं समझेंगे, तो बलात्कार होंगे ही, क्रूर व नृशंस हत्याएं होंगी ही…क्योंकि मूलाधार कि वह शक्ति जो सृजनात्मक है, दमन की स्थिति में विध्वंसक हो जाएगी और यही हो रहा है | अब तो वहशी एक दो बर्ष कि अबोध बच्ची तक को नहीं छोड़ रहे…. कभी किसी ने प्रश्न किया कि इतनी सारी बंदिशें, पहरेदारी… के बाद भी ये अध्यात्मिकों का समाज गर्त पर क्यों गिरा चला जा रहा है ? धर्म और नैतिकता के ठेकेदार ही बलात्कार और सेक्स-रेकेट काण्ड में क्यों धरे जा रहे हैं ? क्योंकि हमने विश्व की सर्वोच्च शक्ति ‘काम’ यानि सेक्स को दिशा देने के स्थान पर दमन करना चाहा… सदियों से सिवाय दमन के और कुछ नहीं किया | ऋषि-मुनियों के काल में तो कम-कम-कम सेक्स जीवन की अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की तरह ही सामान्य था…यही कारण है कि भारत में कामसूत्र जैसी पुस्तक और अजंता, एलोरा की कामुक मूर्तियों की रचना भारतीय मनीषियों ने की थी | ओशो ने उसी सनातन धर्म के ज्ञान को ही अधिक स्पष्ट व तर्क के साथ सामने रखा | सेक्स का ज्ञान न होना कितना विनाशक होता है यह आये दिन बलात्कार व क्रूर हत्याओं से कोई भी समझ सकता है | धार्मिक समाज इस पर कोई शोध नहीं करता, बल्कि नए नए कानून लाकर केवल दमन ही करता है और दमन से विस्फोट होता है | दमन से निर्भयाकाण्ड होता है, सामूहिक बलात्कर होते हैं… | लीजिये आप स्वयं पढ़ लीजिये ओशो के विचार सेक्स के विषय में, फिर भी कोई प्रश्न उठे तो कमेन्ट बॉक्स पर रखिये | ~विशुद्ध चैतन्य

‘हमने सेक्स को सिवाय गाली के आज तक दूसरा कोई सम्मान नहीं दिया। हम तो बात करने में भयभीत होते हैं। हमने तो सेक्स को इस भांति छिपा कर रख दिया है जैसे वह है ही नहीं, जैसे उसका जीवन में कोई स्थान नहीं है। जब कि सच्चाई यह है कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मनुष्य के जीवन में और कुछ भी नहीं है। लेकिन उसको छिपाया है, उसको दबाया है। दबाने और छिपाने से मनुष्य सेक्स से मुक्त नहीं हो गया, बल्कि मनुष्य और भी बुरी तरह से सेक्स से ग्रसित हो गया। दमन उलटे परिणाम लाया है…।’

सेक्स को समझों : युवकों से मैं कहना चाहता हूँ कि तुम्हारे माँ-बाप तुम्हारे पुरखे, तुम्हारी हजारों साल की पीढ़ियाँ सेक्स से भयभीत रही हैं। तुम भयभीत मत रहना। तुम समझने की कोशिश करना उसे। तुम पहचानने की कोशिश करना। तुम बात करना। तुम सेक्स के संबंध में आधुनिक जो नई खोजें हुई हैं उसको पढ़ना, चर्चा करना और समझने की कोशिश करना कि क्या है सेक्स?

सेक्स का विरोध ना करें : सेक्स थकान लाता है। इसीलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि इसकी अवहेलना मत करो, जब तक तुम इसके पागलपन को नहीं जान लेते, तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते। जब तक तुम इसकी व्यर्थता को नहीं पहचान लेते तब तक बदलाव असंभव है।

मैं बिलकुल भी सेक्स विरोधी नहीं हूँ। क्योंकि जो लोग सेक्स का विरोध करेंगे वे काम वासना में फँसे रहेंगे। मैं सेक्स के पक्ष में हूँ क्योंकि यदि तुम सेक्स में गहरे चले गए तो तुम शीघ्र ही इससे मुक्त हो सकते हो। जितनी सजगता से तुम सेक्स में उतरोगे उतनी ही शीघ्रता से तुम इससे मुक्ति भी पा जाओगे। और वह दिन भाग्यशाली होगा जिस दिन तुम सेक्स से पूरी तरह मुक्त हो जाओगे।

धन और सेक्स : धन में शक्ति है, इसलिए धन का प्रयोग कई तरह से किया जा सकता है। धन से सेक्स खरीदा जा सकता है और सदियों से यह होता आ रहा है। राजाओं के पास हजारों पत्नियाँ हुआ करती थीं। बीसवीं सदी में ही केवल तीस-चालीस साल पहले हैदराबाद के निजाम की पाँच सौ पत्नियाँ थीं।

मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसके पास तीन सौ पैंसठ कारें थीं और एक कार तो सोने की थी। धन में शक्ति है क्योंकि धन से कुछ भी खरीदा जा सकता है। धन और सेक्स में अवश्य संबंध है।

एक बात और समझने जैसी है, जो सेक्स का दमन करता है वह अपनी ऊर्जा धन कमाने में खर्च करने लग जाता है क्योंकि धन सेक्स की जगह ले लेता है। धन ही उसका प्रेम बन जाता है, धन के लोभी को गौर से देखना- सौ रुपए के नोट को ऐसे छूता है जैसे उसकी प्रेमिका हो और जब सोने की तरफ देखता है तो उसकी आँखें कितनी रोमांटिक हो जाती हैं… बड़े-बड़े कवि भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। धन ही उसकी प्रेमिका होती है। वह धन की पूजा करता है, धन यानी देवी। भारत में धन की पूजा होती है, दीवाली के दिन थाली में रुपए रखकर पूजते हैं। बुद्धिमान लोग भी यह मूर्खता करते देखे गए हैं।

दुख और सेक्स : जहाँ से हमारे सुख दु:खों में रूपांतरित होते हैं, वह सीमा रेखा है जहाँ नीचे दु:ख है, ऊपर सुख है इसलिए दु:खी आदमी सेक्सुअली हो जाता है। बहुत सुखी आदमी नॉन-सेक्सुअल हो जाता है क्योंकि उसके लिए एक ही सुख है। जैसे दरिद्र समाज है, दीन समाज है, दु:खी समाज है, तो वह एकदम बच्चे पैदा करेगा। गरीब आदमी जितने बच्चे पैदा करता है, अमीर आदमी नहीं करता। अमीर आदमी को अकसर बच्चे गोद लेने पड़ते हैं!

उसका कारण है। गरीब आदमी एकदम बच्चे पैदा करता है। उसके पास एक ही सुख है, बाकी सब दु:ख ही ‍दु:ख हैं। इस दु:ख से बचने के लिए एक ही मौका है उसके पास कि वह सेक्स में चला जाए। वह ही उसके लिए एकमात्र सुख का अनुभव है, जो उसे हो सकता है। वह वही है।

सेक्स से बचने का सूत्र : जब भी तुम्हारे मन में कामवासना उठे तो उसमें उतरो। धीरे- धीरे तुम्हारी राह साफ हो जाएगी। जब भी तुम्हें लगे कि कामवासना तुम्हें पकड़ रही है, तब डरो मत शांत होकर बैठ जाओ। जोर से श्वास को बाहर फेंको- उच्छवास। भीतर मत लो श्वास को क्योंकि जैसे ही तुम भीतर गहरी श्वास को लोगे, भीतर जाती श्वास काम-ऊर्जा को नीचे की तरफ धकाती है।

जब तुम्हें कामवासना पकड़े, तब बाहर फेंको श्वास को। नाभि को भीतर खींचो, पेट को भीतर लो और श्वास को फेंको…जितनी फेंक सको फेंको। धीरे-धीरे अभ्यास होने पर तुम संपूर्ण रूप से श्वास को बाहर फेंकने में सफल हो जाओगे।

सेक्स और प्रेम : वास्तविक प्रेमी अंत तक प्रेम करते हैं। अंतिम दिन वे इतनी गहराई से प्रेम करते हैं जितना उन्होंने प्रथम दिन किया होता है; उनका प्रेम कोई उत्तेजना नहीं होता। उत्तेजना तो वासना होती है। तुम सदैव ज्वरग्रस्त नहीं रह सकते। तुम्हें स्थिर और सामान्य होना होता है। वास्तविक प्रेम किसी बुखार की तरह नहीं होता यह तो श्वास जैसा है जो निरंतर चलता रहता है।

प्रेम ही हो जाओ। जब आलिंगन में हो तो आलिंगन हो जाओ, चुंबन हो जाओ। अपने को इस पूरी तरह भूल जाओ कि तुम कह सको कि मैं अब नहीं हूँ, केवल प्रेम है। तब हृदय नहीं धड़कता है, प्रेम ही धड़कता है। तब खून नहीं दौड़ता है, प्रेम ही दौड़ता है। तब आँखें नहीं देखती हैं, प्रेम ही देखता है। तब हाथ छूने को नहीं बढ़ते, प्रेम ही छूने को बढ़ता है। प्रेम बन जाओ और शाश्वत जीवन में प्रवेश करो।

साभार : पथ के प्रदीप, धम्मपद : दि वे ऑफ दि बुद्धा, ओशो उपनिषद, तंत्र सूत्र, रिटर्निंग टु दि सोर्स, एब्सोल्यूट ताओ से संकलित अंश।

सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

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