फर्रे बाज विद्वान

अकसर ऐसे महान विद्वानों से मेरी भेंट हो जाती है, जो बात-बात पर श्रीकृष्ण ने कहा था…श्री राम ने कहा था….. कहकर ही अपनी बात कहते हैं | मेरी समझ में यह नहीं आता कि राम और कृष्ण जो कुछ कहा अपने अनुभव व ज्ञान से कहा, लेकिन अब उनको दोहराने का क्या अर्थ ?

इसका अर्थ तो यही हुआ कि उनके बाद किसी ने भी आध्यत्मिक उन्नति नहीं की | सभी की स्थिति उन बच्चों सी हो गयी जो किसी होनहार मेहनती पढ़ाकू बच्चे से दोस्ती कर लेते थे और हर परीक्षा में उसी के दिए फर्रे से पास होते रहे | कभी खुद कोई पढ़ाई नहीं करते थे | अब जब उस पढ़ाकू छात्र को स्कूल छोड़े कई पीढ़ियाँ बीत गयी….. स्कूलों के मास्टर और विषय बदले भी कई सदियाँ बीत गईं…. लेकिन फर्रे वही चला रहें आज तक क्योंकि उस समय उसी फर्रे से पास हुए थे | उसी की फोटो कापियाँ बांटी जा रहीं हैं, बिना यह जाने की विषय कौन सा है और माध्यम अंग्रेजी है, हिंदी हैं या संस्कृत है |

अब कोई कभी पकड़ा जाता या फेल हो जाता है, तो लड़ने मरने पर आ जाते हैं कि हमारे इतने होनहार विद्वान् छात्र की निंदा की | या फिर सुविचार सुना देते हैं, “जिस इंसान को बुराई ढूँढने की आदत हो, उसे हर किसी में बुराई ही नजर आती है…..बस नजरिये का फर्क है |” चोर भी यही कहता फिर रहा है, घोटाले बाज भी यही कहते फिर रहें हैं, लुटेरे और ठग भी यही कहते फिर रहें हैं….. और बेचारे ईमानदार और सभ्य लोग शर्म से गड़कर उन्हें यह कहते हुए खुले आम उपद्रव की छूट दे रहें है, “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय….!” जबकि दोनों ही यह नहीं कहते कि हम उस लायक छात्र के पैरों की धुल के बराबर भी नहीं पहुँचे | लेकिन फर्रे चलाने की खानदानी दक्षता के चलते धर्म, न्याय और नैतिकता के ठेकेदार बने हुए हैं |

READ  'मानव जीवन का उद्देश्य'

श्री कृष्ण ने कहा था, जो हुआ अच्छा हुआ….. लेकिन राम और कृष्ण की दुहाई देने वाले ही इतिहास खोद खोद कर जख्मों को कुरेदने में लगे हुए हैं | कारण केवल इतना कि जो वे गीता के उपदेश बाँचते फिरते हैं, अर्थ ही उनके कभी समझ में नहीं आया |

यहाँ यदि मैं अपनी समझ की बात करूँ तो गीता में जो कहा गया की जो हुआ अच्छा हुआ…. उसका बहुत स्पष्ट अर्थ यह है कि भूतकाल में जो भी गलतियाँ हुईं उनसे आपने कुछ सीखा, यदि आपने दुःख पाया तब तो दुःख को समझा और अब स्वयं ऐसा कोई कार्य नहीं करोगे जिससे किसी और को दुःख पहुँचे | लेकिन यहाँ तो लोग दुःख पहुँचाना तो किसी गिनती में गिनते ही नहीं हैं, बल्कि लाशें कैसे बिछाई जाएँ उसके उपाय करने में लगे हुए हैं | कैसे गीता और रामायण के नाम पर राष्ट्र को फिर खंडित किया जाए, इसके उपाय में लगे हुए हैं | कैसे फिर से नरसंहार हो इस देश में इसी उधेड़बुन में लगे हुए रात-दिन |

ये तथाकथित धार्मिक मुर्ख यह नहीं जानते कि श्रीकृष्ण से अधिक ज्ञानी वे कभी नहीं हो सकते क्योंकि वे फर्रे चलाकर विद्वान् नहीं बने थे | और यदि उनकी विद्वता का सम्मान करते हो तो ये धर्म के नाम पर द्वेष व अराजकता का प्रचार बंद कर दो | क्योंकि यदि हम आपस में लड़ते रहेंगे तो कभी भी विकसित नहीं हो पाएंगे | ना आध्यात्मिक उन्नति होगी कभी और न ही भौतिक | -विशुद्ध चैतन्य

गीता – सार

क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।

जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया, जो तुम
रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।

खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।

परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।

न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है – फिर तुम क्या हो?

तुम अपने आपको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।

जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आन्दन अनुभव करेगा।

लेख से सम्बंधित अपने विचार अवश्य रखें

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of