“सच तो यह है कि हमारा मन सेक्स-सेन्टर की तरफ ही बहता रहता है |” -ओशो

पुराने दिनों में जब भी दीक्षा दी जाती थी, और दीक्षा वही दे सकता है जो आपकी समस्त जन्मों की सार संपदा क्या है, उसे समझ पाता हो, अन्यथा नहीं दे सकता। अन्यथा देने का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि जहां तक आप पहुंच गए हैं उसके आगे यात्रा करनी है। तो तिलक अगर ठीक—ठीक लगाया जाए, तो वह कई अर्थों का सूचक था। वे सारे अर्थ समझने पड़ेंगे।

पहला तो, वह इस बात का सूचक था कि जब एक बार गुरु ने बता दिया कि तिलक यहां लगाना है ठीक जगह, तो आपको भी उस ठीक जगह का अनुभव होने लगे, तिलक लगाने का पहला प्रयोजन यही है। आपने कभी खयाल नहीं किया होगा कि आप आंख बन्द करके बैठ जाएं और कोई व्यक्ति आपकी दोनों आंखों के बीच में सिर के पास उंगली ले जाए तो बन्द आंख में भी आपके भीतर एहसास होना शुरू हो जाएगा कि कोई आंख की तरफ उंगली किए हुए है—वह तीसरी आंख की प्रतीति है।


अगर ठीक तीसरी आंख पर तिलक लगा दिया जाये, उसी मात्रा, उतने ही अनुपात का तिलक लगा दिया जाए, ठीक जितनी बड़ी तीसरी आंख की स्थिति है, तो आपको पूरा शरीर छोड्कर उसी का स्मरण चौबीस घण्टे रहने लगेगा। वह स्मरण पहला तो यह काम करेगा कि आपका शरीर—बोध कम होता जाएगा, और तिलक—बोध बढ़ता जाएगा। एक क्षण ऐसा आ जाता है जब कि पूरे शरीर में सिर्फ तिलक ही स्मरण रह जाता है, बाकी सारा शरीर भूल जाता है। और जिस दिन ऐसा हो जाए, उसी दिन आप तीसरी आंख को खोलने में समर्थ हो सकते है।

तिलक के साथ जुड़ी हुई साधनाएं थीं कि पूरे शरीर को भूल जाओ, सिर्फ तिलक मात्र की जगह याद रह जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि सारी चेतना सिकुड़कर फोकस्‍ड हो जाए तीसरी आंख पर और तीसरी आंख के खोलने की जो कुंजी है वह फोकस्‍ड कांशसनेस है। उस पर चेतना पूरी की पूरी इकट्ठी हो जाए और सारे शरीर से सिकुड़कर उस छोटे से स्थान पर लग जाए। बस, उसकी मौजूदगी से काम हो जाएगा।

जैसे हम सूरज की किरणों को एक छोटे से लेंस के द्वारा एक कागज पर गिरा लें, तो इकट्ठी हो गयी किरणें आग पैदा कर देंगी। वे ही किरणें सिर्फ धूप पैदा कर रही थीं उनसे आग पैदा नहीं होती थी। वे ही किरणें आग पैदा कर सकती हैं, संग्रहीत होने पर। चेतना शरीर पर जब बंटी रहती है तो सिर्फ जीवन का काम चलाऊ उपयोग उससे होता है। चेतना अगर तीसरे नेत्र के पास पूरी इकट्ठी हो जाए, तो जो तीसरे नेत्र की बाधा, जो द्वार, जो बन्दपन है वह टूट जाता है, जल जाता है, राख हो जाता है, और हम उस आकाश को देखने में समर्थ हो जाते हैं जो हमारे ऊपर फैला है।

तिलक का पहला उपयोग यह था कि आपको ठीक—ठीक जगह बता दी जाए शरीर में कि चौबीस घण्टे इस जगह का स्मरण रखना है। सब तरफ से चेतना को सिकोड़कर इस जगह ले आना है। दूसरा यह कि गुरु को रोज—रोज देखने की जरूरत न पड़े, रोज आपके माथे पर हाथ रखने की भी जरूरत न पड़े; क्योंकि जैसे—जैसे बिन्दु नीचे सरकेगा वैसे—वैसे आपको एहसास होगा, और आपका तिलक भी नीचा होता जाएगा। आपको रोज तिलक लगाते वक्त ठीक वहीं तिलक लगाना है जहां उस बिन्दु का आपको एहसास होता हो।

हजार शिष्य हैं एक गुरु के। एक शिष्य आता है, झुकता है, तभी गुरु देख लेता है कि तिलक कहां है? इसकी बात करने की जरूरत नहीं रह जाती। यह देख लेता है कि तिलक नीचे सरक रहा है कि नहीं सरक रहा है! तिलक उसी जगह है कि तिलक में कोई अन्तर पड रहा है! वह कोड है। दिन में दो—चार दफा शिष्य आएगा और गुरु देख लेगा कि तिलक गतिमान है कि नहीं? वह आगे गति कर रहा है, रुका हुआ है या ठहरा हुआ है? किसी दिन स्वयं शिष्य के माथे पर रखकर पुन: देख पाएगा। अगर शिष्य को पता नहीं चल रहा है तिलक के हटने का, तो उसका मतलब है कि चेतना पूरी कि पूरी इकट्ठी नहीं की जा रही है। अगर वह तिलक गलत जगह लगाए हुए है और बिन्दु दूसरी जगह है तो इसका मतलब है कि उसकी कांशसनेस, उसकी रिमेंबरिग, उसकी स्मृति ठीक बिन्दु को नहीं पकड़ पा रही है, वह भी गुरु को पता चल जाएगा।

जैसे—जैसे यह तिलक नीचे आता जाएगा वैसे—वैसे प्रयोग बदलने पड़ेंगे साधना के। यह तिलक करीब—करीब वैसा ही काम करेगा जैसे एक अस्पताल में एक मरीज के पास लटका हुआ चार्ट काम करता है। नर्स चार्ट पर लिख जाती है, कितना है ताप, कितना है ब्लडप्रेशर, क्या है, क्या नहीं? डाक्टर को आकर देखने की जरूरत नहीं होती है, वह चार्ट पर एक क्षण नजर डाल लेता है, बात पूरी हो जाती है। पर इससे भी अदभुत था यह प्रयोग कि माथे पर पूरा का पूरा इंगित लगा था, जो सब तरह की खबर देता। अगर ठीक—ठीक इसका प्रयोग किया जाता तो गुरु को पूछने की कभी जरूरत न पड़ती कि क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है। वह जानता है, क्या हो रहा है। क्या सहायता पहुंचानी है, वह यह भी जानता है। क्या प्रयोग बदलना है, कौन—सी विधि रूपांतरित करनी है, वह भी जानता है, तो साधना की दृष्टि से तिलक का ऐसा मूल्य था।

दूसरा, जो हमारी तीसरी आंख का बिन्दु है, वह हमारे संकल्प का भी बिन्दु है। उसको योग में आज्ञाचक्र कहते हैं। आज्ञाचक्र इसीलिए कहते हैं कि हमारे जीवन में जो कुछ भी अनुशासन है वह उसी चक्र से पैदा होता है। हमारे जीवन में जो भी व्यवस्था है, जो भी आर्डर है, जो भी संगति है, वह उसी बिन्दु से पैदा होती है। इसे ऐसा समझें।
लेकिन यह जो आज्ञाचक्र है, इसके गाते ही शरीर आशा देना बन्द कर देता है और आज्ञा लेना शुरू कर देता है। पूरा का पूरा आयोजन बदल जाता है और उल्टा हो जाता है। वैसा आदमी अगर बहते हुए खून को कह दे, रुक जाओ, तो वह बहता हुआ खून रुक जाएगा। वैसा आदमी अगर कह दे हृदय की धड़कन को कि ठहर जा, तो हृदय की धड़कन ठहर जाएगी। वैसा आदमी कहे अपनी नब्ज से कि मत चल, तो नब्ज चल न सकेगी। वैसा आदमी अपने शरीर, अपने मन, अपनी इन्द्रियों का मालिक हो जाता है। पर इस चक्र के बिना शुरू हुए मालिक नहीं होता। इस चक्र का स्मरण जितना ज्यादा रहे, उतना ही ज्यादा आपके भीतर, स्वयं की मालिकी पैदा होनी शुरू होती है। आप गुलाम की जगह मालिक बनना शुरू होते हैं।

‘योग ने उस चक्र को जगाने के बहुत—बहुत प्रयोग किए हैं। उसमें तिलक भी एक प्रयोग है। स्मरणपूर्वक, अगर कोई चौबीस घण्टे उस चक्र पर बार—बार ध्यान को ले जाता रहे तो बड़े परिणाम आते है। अगर तिलक लगा हुआ है तो बार—बार ध्यान जाएगा। तिलक के लगते ही वह स्थान पृथक हो जाता है, वह बहुत सेंसिटिव स्थान है। अगर तिलक ठीक जगह लगा है तो आप हैरान होंगे, आपको उसकी याद करनी ही पड़ेगी, बहुत संवेदनशील जगह है। सम्भवतः शरीर में वह सर्वाधिक संवेदनशील जगह है। उसकी संवेदनशीलता का स्पर्श करना, और वह भी खास चीजों से स्पर्श करने की विधि है—जैसे चंदन का तिलक लगाना।

सैंकड़ों और हजारों प्रयोगों के बाद तय किया था कि चन्दन का क्यों प्रयोग करना है? एक तरह की रैजोनेंस है चन्दन में, और उस स्थान की संवेदनशीलता में। चन्दन का तिलक उस बिन्दु की संवेदनशीलता को और गहन करता है, और घना कर जाता है। हर कोई तिलक नहीं करेगा! कुछ चीजों के तिलक तो उसकी संवेदनशीलता को मार देंगे, बुरी तरह मार देंगे जैसे आज स्त्रियां टीका लगा रही है। बहुत से बाजारू टीके हैं वे उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है, उनका योग से कोई लेना—देना नहीं है। वे बाजारू टीके नुकसान कर रहे हैं, वह नुकसान करेंगे।

सवाल यह है कि संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं या घटाते हैं? अगर घटाते हैं संवेदनशीलता को तो नुकसान करेंगे, अगर बढ़ाते है तो फायदा करेंगे। और प्रत्येक चीज के अलग—अलग परिणाम हैं, इस जगत में छोटे से फर्क से सारा फर्क पड़ता है। इसको ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष चीजें खोजी गयी थीं, जिनका ही उपयोग किया जाए। यदि आज्ञा का चक्र संवेदनशील हो सके, सक्रिय हो सके तो आपके व्यक्तित्व में एक गरिमा और इन्टीग्रिटी आनी शुरू होगा, एक समग्रता पैदा होगी। आप एक जुट होने लगते हैं, कोई चीज आपके भीतर इकट्ठी हो जाती है, खण्ड—खण्ड नहीं अखण्ड हो जाती है।

इस संबंध में टीके के लिए भी पूछा है तो वह भी खयाल में ले लेना चाहिए। तिलक से थोड़ा हटकर टीके का प्रयोग शुरू हुआ। विशेषकर स्त्रियों के लिए शुरू हुआ। उसका कारण वही था, योग का अनुभव काम कर रहा था। असल में स्त्रियों का आज्ञाचक्र बहुत कमजोर चक्र है—होगा ही। क्योंकि सी का सारा व्यक्तित्व निर्मित किया गया समर्पण के लिए, उसके सारे व्यक्तित्व की खूबी समर्पण की है। आज्ञाचक्र अगर उसका बहुत मजबूत हो तो समर्पण करना मुश्किल हो जाएगा। सी के पास आशा का चक्र बहुत कमजोर है, असाधारण रूप से कमजोर है। इसलिए सी सदा ही किसी न किसी का सहारा मांगती रहेगी, चाहे वह किसी रूप में हो।

अपने पर खड़े होने का पूरा साहस नहीं जुटा पाएगी। कोई सहारा, किसी के कन्धे पर हाथ, कोई आगे हो जाए, कोई आज्ञा दे और वह मान ले, इसमें उसे सुख मालूम पडेगा।

स्त्री के आज्ञाचक्र को सक्रिय बनाने के लिए अकेली कोशिश इस मुल्क में हुई है, और कहीं भी नहीं हुई। और वह कोशिश इसलिए थी कि अगर सी का आज्ञाचक्र सक्रिय नहीं होता तो परलोक में उसकी कोई गति नहीं होती। साधना में उसकी कोई गति नहीं होती। उसके आज्ञाचक्र को तो स्थिर रूप से मजबूत करने की जरूरत है। लेकिन अगर यह आज्ञाचक्र साधारण रूप से मजबूत किया जाए तो उसके स्‍त्रैण होने में कमी पड़ेगी और उसमें पुरुषत्व के गुण आने शुरू हो जाएंगे। इसलिए इस टीके को अनिवार्य रूप से उसके पति से जोड्ने की चेष्टा की गयी। उसके जोड्ने का कारण है।

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इस टीके को सीधा नहीं रख दिया गया उसके माथे पर, नहीं तो उसमें सील कम होगा। वह जितनी स्वनिर्भर होने लगेगी, उतनी ही उसकी कमनीयता, उसका कौमार्य नष्ट हो जाएगा। वह दूसरे का सहारा खोजती है इसमें एक तरह की कोमलता है। पर जब वह अपने सहारे खड़ी होगी तो एक तरह की कठोरता अनिवार्य हो जाएगी। तब बडी बारीकी से खयाल किया गया कि उसको सीधा टीका लगा दिया जाए, नुकसान पहुंचेगा उसके व्यक्तित्व में, उसके मां होने में बाधा पड़ेगी, उसके समर्पण में बाधा पड़ेगी। इसलिए उसकी आशा को उसके पति ही जोड्ने का समग्र प्रयास किया गया। इस तरह दोहरे फायदे होंगे। उसके स्‍त्रैण होने में अन्तर नहीं पड़ेगा

अपने पति के प्रति ज्यादा अनुगत हो पाएगी, और फिर भी उसकी आशा का चक्र सक्रिय हो सकेगा।

इसे ऐसा समझिए, आशा का चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए, उसके विपरीत कभी नहीं जाता। चाहे गुरु से संबंधित कर दिया जाए तो गुरु के विपरीत कभी नहीं जाता, चाहे पति से संबंधित कर दिया जाए तो पति से विपरीत कभी नहीं जाता। आशा चक्र जिससे भी संबंधित कर दिया जाए उसके विपरीत व्यक्तित्व नहीं जाता। अगर उस सी के माथे पर ठीक जगह पर टीका है तो वह सिर्फ पति के प्रति तो अनुगत हो सकेगी, शेष सारे जगत के प्रति वह सबल हो जाएगी। यह करीब—करीब स्थिति वैसी है, अगर आप सम्मोहन के संबंध में कुछ समझते हैं तो इसे जल्दी समझ जाएंगे।

अगर आपने किसी सम्मोहक को लोगों को सम्मोहित करते, हिप्रोटाइज करते देखा तो आप एक चीज देखकर जरूर ही चौंके होंगे। वह चीज यह कि अगर सम्मोहन करनेवाला व्यक्ति किसी को सम्मोहित कर दे, या आप खुद किसी को सम्मोहित कर दें तो आपके सम्मोहित कर देने के बाद वह व्यक्ति किसी दूसरे की आवाज नहीं सुनेगा, सिर्फ आपकी सुन सकेगा। बहुत मजे की घटना घटती है। सम्मोहित कर देने के बाद सारे हाल में हजारों लोग चिल्लाते रहें, बात करते रहें, बेहोश पड़ा हुआ आदमी कुछ सुनेगा नहीं। लेकिन जिसने सम्मोहित किया है वह धीमे से भी बोले, तो भी सुनेगा।

यह करीब—करीब, जो मैं आपको टीके के बारे में समझा रहा हूं उससे जुड़ी हुई घटना है। व्यक्ति जैसे ही सम्मोहित किया गया वैसे ही सम्मोहित करनेवाले के प्रति ही सिर्फ उसकी ओपनिंग और खुलापन रह गया है, बाकी सबके लिए क्लोज हो गया। आप उसको कुछ नहीं कह सकते। आप उसके कान के पास कितना ही चिल्लाएं वह बिलकुल नहीं सुनेगा, नगाडे बजाए तो भी नहीं सुनेगा। और जिसने सम्मोहित किया है वह धीमे से भी आवाज दे, कि खड़े हो जाओ, वह तत्काल खड़ा हो जाएगा। उसकी चेतना में सिर्फ एक द्वार रह गया है, बाकी सब तरफ से बन्द हो गयी है। जिसने सम्मोहित किया है, आज्ञाचक्र उससे बंध गया है। बाकी सब तरफ से बंद हो गया है।

ठीक इसी सजेस्टिबिलिटी का, इसी मंत्र का उपयोग सी के टीके में किया गया है। उसको उसके पति के साथ जोड़ देना है, एक ही तरफ उसका अनुगत भाव रह जाएगा, एक ही तरफ वह समर्पित हो पाएगी। शेष सारे जगत के प्रति वह मुक्त और स्वतंत्र हो जाएगी। अब उसके सी तत्व पर कोई बाधा नहीं पड़ेगी। इसीलिए जैसे ही पति मर जाए टीका हटा देना है, वह इसलिए हटा देना है कि अब उसका किसी के प्रति भी अनुगत होने का कोई सवाल नहीं रहा।

लोगों को इस बात का कतई खयाल नहीं है, उनको तो खयाल है कि टीका पोंछ दिया, क्योंकि विधवा हो गयी। पोंछने का प्रयोजन है। अब उसके अनुगत होने का कोई सवाल नहीं रहा, सच तो यह है कि अब उसको पुरुष की भांति ही जीना पड़ेगा। अब उसमें जितनी स्वतंत्रता आ जाए, उतनी उसके जीवन के लिए हितकर होगी। जरा—सा भी छिद्र वल्‍नरेबिलिटी का, जरा सा भी छेद जहां से वह अनुगत हो सके, वह हट जाए। टीके का प्रयोग एक बहुत ही गहरा प्रयोग है। लेकिन ठीक जगह पर हो, ठीक वस्तु का हो, ठीक नियोजित ढंग से लगाया गया हो तो ही कारगर है अन्यथा बेमानी है। सजावट हो, श्रृंगार हो, उसका कोई मूल्य नहीं है, उसका कोई अर्थ नहीं है। तब वह सिर्फ एक औपचारिक घटना है। इसलिए पहली बार जब टीका लगाया जाए तो उसका पूरा अनुष्ठान है। और पहली दफा गुरु तिलक दे तब उसका पूरा अनुष्ठान से ही लगाया जाए तो ही परिणामकारी होगा, अन्यथा परिणामकारी नहीं होगा।

आज सारी चीजें हमें व्यर्थ मालूम पड़ने लगी है, उसका कारण है। आज तो व्यर्थ है। क्योंकि उनके पीछे का कोई भी वैज्ञानिक रूप नहीं है। सिर्फ उसकी खोल रह गयी है, जिसको हम घसीट रहे हैं। जिसको हम खींच रहे है बेमन, जिसके पीछे मन का कोई लगाव नहीं रह गया है, आत्मा का कोई भाव नहीं रह गया है, और उसके पीछे की पूरी वैज्ञानिकता का कोई सूत्र भी मौजूद नहीं है। यह आज्ञाचक्र है, इस संबंध में दो—तीन बातें और समझ लेनी चाहिए, क्योंकि यह काम आ सकती है, इसका उपयोग किया जा सकता है।

आज्ञाचक्र की जो रेखा है, उस रेखा से ही जुडा हुआ हमारे मस्तिष्क का भाग है। इससे ही हमारा मस्तिष्क शुरू होता है। लेकिन अभी भी हमारे मस्तिष्क का आधा हिस्सा बेकार पड़ा हुआ है साधारणत:। हमारा जो प्रतिभाशाली से प्रतिभाशाली व्यक्ति होता है, जिसको हम जीनियस कहें, उसका भी केवल आधा ही मस्तिष्क काम करता है, आधा काम नहीं करता। वैज्ञानिक बहुत परेशान हैं, फिजियोलोजिस्ट बहुत परेशान हैं कि यह आधी खोपड़ी का जो हिस्सा है, यह किसी भी काम में नहीं आता। अगर आपके इस आधे हिस्से को काटकर निकाल दिया जाए तो आपको पता भी नहीं चलेगा। आपको पता ही नहीं चलेगा कि कहीं कोई चीज कम हो गइए है। क्योंकि उसका तो कभी उपयोग ही नहीं हुआ है, वह न होने के बराबर है।

लेकिन वैज्ञानिक जानते हैं कि प्रकृति कोई भी चीज व्यर्थ निर्मित नहीं करती। भूल होती है, एकाध आदमी के साथ हो सकती है, यह तो हर आदमी के साथ आधा मस्तिष्क खाली पड़ा हुआ है। बिलकुल निष्क्रिय पड़ा हुआ है, उसमें कहीं कोई चहल पहल भी नहीं हुई है। योग का कहना है, कि वह जो आधा मस्तिष्क है वह आज्ञाचक्र के चलने के बाद शुरू होता है। आधा मस्तिष्क आज्ञाचक्र के नीचे के चक्रों से जुडा है, और आधा मस्तिष्क आज्ञाचक्र के ऊपर के चक्रों से जुड़ा हुआ है। नीचे के चक्र शुरू होते हैं तो आधा मस्तिष्क काम करता है, और जब आज्ञा के ऊपर काम शुरू होता है तब शेष आधा मस्तिष्क काम शुरू करता है।

इस संबंध में, हमें खयाल भी नहीं होता, जब तक कोई चीज सक्रिय न हो जाए हम सोच भी नहीं सकते। सोचने का भी कोई उपाय नहीं है। जब कोई चीज सक्रिय होती है तभी हमें पता चलता है।

एक आदमी का बुढ़ापा समझना हो तो पच्चीस को पर नजर डालनी जरूरी है, नहीं तो सब अधूरा—अधूरा होगा। एक—एक व्यक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं बता पाता है। एक—एक घटना अलग कुछ नहीं कहती। इसलिए मैंने कहा कि बीस हजार साल का इतिहास साफ है।

‘बीस हजार साल में योग निरंत्तर एक बात कहता रहा है कि आज्ञाचक्र के साथ जुड़ा हुआ आधा मस्तिष्क है जो बन्द पड़ा है, अगर तुम्हें संसार के पार कुछ जानना है तो उस आधे मस्तिष्क को सक्रिय करना जरूरी है। अगर परमात्मा के संबंध में कोई यात्रा करनी है तो वह आधा मस्तिष्क सक्रिय होना जरूरी है। अगर पदार्थ के पार देखना है तो वह आधा मस्तिष्क सक्रिय होना जरूरी है। उसका द्वार है आज्ञा, जहां आप तिलक लगाते हैं, वह तो करस्पोंडिंग हिस्सा है, आपकी चमड़ी के ऊपर। बस अन्दाजन डेढ़ इंच भीतर— अन्दाजन कहता हूं क्योंकि किसी का थोड़ा ज्यादा, किसी का थोड़ा कम होता है। अन्दाजन डेढ़ इंच भीतर वह बिन्दु है जो द्वार का काम करता है, पदार्थ अतीत, या भावातीत जगत के लिए।

तिब्बत ने तो, जैसा हमने तिलक आविष्कृत किया, वैसे ही ठीक आपरेशन्स भी आविष्कृत किए। ऐसा तिब्बत ही कर सकता था। क्योंकि तिब्बत ने जितनी मेहनत की है मनुष्य के तीसरे नेत्र पर, ‘ थर्ड आई’ पर, उतनी किसी और सभ्यता ने नहीं की है। सच तो यह है कि तिब्बत का पूरा का पूरा विज्ञान और पूरी समझ जीवन के अनेक आयामों की समझ है जो उस तीसरे नेत्र की ही समझ पर आधारित है।

जैसा मैंने कायसी का आपके लिए उदाहरण दिया, कायसी तो एक व्यक्ति है। तिब्बत में तो सैक्कों साल से व्यक्ति जब तक समाधि में न जाए तब तक दवा का कोई पता नहीं लगता था। यह पूरी सभ्यता ही वह काम करती रही है, वे समाधिस्थ व्यक्ति से ही दवा पूछेंगे, उसकी दवा का ही उपयोग करेंगे। बाकी तो सब अंधेरे में टटोलना है। उन्होंने तो आपरेशन्स भी विकसित किए।

ठीक इस डेढ़ इंच के भीतर जो जगह है, उस पर आपरेशन्स करने के भी प्रयोग किए। उस जगह को बाहर से भी तोड्ने की कोशिश की, वह टूट जाती है, बाहर से भी टूट जाती है। लेकिन बाहर से टूटने में और भीतर से टूटने में एक फर्क है, इसलिए भारत ने कभी उसको बाहर से तोड्ने की कोशिश नहीं की। यह मैं आपको खयाल में दे दूं।

उसे भीतर से तोड्ने पर ही आधा मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है। बहुत सम्भावना यह है कि बाहर का आपरेशन नये आधे मस्तिष्क की सक्रियता का दुरुपयोग करेगा। क्योंकि आदमी वही का वही है, उसकी चेतना में कोई साधनागत अन्तर तो हुए नहीं हैं, और उसके मस्तिष्क में नये काम शुरू हो गए। अगर वह आदमी आज दीवार के पार देख सकता है, तो इस बात की बहुत कम सम्भावना है कि वह कुएं में किसी गिरे आदमी हो देखकर निकालेगा। इस बात की ज्यादा सम्भावना है कि किसी के गड़े हुए खजाने को खोदने जाएगा। अगर वह आदमी यह देख सकता है कि उसके भीतरी इशारे से आपको आता दी जा सकती है, तो इस बात की बहुत कम सम्भावना है कि आपसे वह कोई अच्छा काम करवाएगा, इस बात की ज्यादा सम्भावना है कि आपसे अवश्य वह कोई बुरा काम करवाएगा। आपरेशन यहां भी हो सकता था।

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भारत को भी उसके सूत्र पता थे, पर भारत ने उसका कभी प्रयोग नहीं किया। नहीं प्रयोग किया इसलिए कि जब तक व्यक्ति की चेतना भीतर से भी इतनी विकसित न हो कि नयी शक्तियों का उपयोग करने में समर्थ हो जाए, तब तक उसे नयी शक्तियां देना खतरनाक है। वह ऐसा है जैसे बच्चे के हाथ में हम तलवार दे दें। बहुत डर तो यह है कि वह दो—चार को काटेगा, लेकिन डर यह भी है कि वह अपने को भी काटेगा। और बच्चे के हाथ में दी गई तलवार से किसी का भी मंगल हो सकेगा, इसकी आशा करना दुराशा मात्र है। चेतना के तल पर, अगर व्यक्ति के भीतर की चेतना विकसित न हो तो उसके हाथ में नयी शक्तियां देना खतरनाक है।

तिब्बत में, जहां हम तिलक लगाते रहे हैं, वहां ठीक भीतर तक भी छेद करने की कोशिश की है, भौतिक उपकरणों से। इसलिए तिब्बत बहुत—सी बातें जान पाया, बहुत से अनुभव कर पाया, लेकिन फिर भी तिब्बत कोई नैतिक अर्थों में महान देश नहीं बन पाया। यह बड़ी आश्रर्यजनक घटना है। तिब्बत बहुत काम कर पाया है, लेकिन फिर भी नैतिक अर्थों में वह एक बुद्ध भी पैदा नहीं कर पाया। उसकी जानकारी बढ़ी, उसकी शक्ति बढ़ी, अनूठी बातों का उसे पता चला; लेकिन उन सबका उपयोग बहुत छोटी बातों में हुआ। उनका बहुत बड़ी बातों में उपयोग नहीं हो सका।

भारत ने कोई सीधा भौतिक प्रयोग करने की कभी चेष्टा नहीं की। चेष्टा यह की कि भीतर की चेतना को इकट्ठा करके इतना कन्सट्रेट, इतना एकाग्र किया जाए कि चेतना की शक्ति से ही वह तीसरा नेत्र खुल जाए, उसके ही प्रवाह में खुल जाए। क्योंकि चेतना के प्रवाह को तीसरे नेत्र तक लाना एक बर्खेबू नैतिक उपक्रम है। उसे इतना ऊपर चढ़ाना है! क्योंकि साधारणत: हमारा मन नीचे की तरफ बहता है।

सच तो यह है कि हमारा मन सेक्स—सेन्टर की तरफ ही बहता रहता है। हम कुछ भी करते हों, हम चाहे धन कमाते हों, चाहे पद की चेष्टा करते हों, चाहे कुछ भी करते हों, यह सब करने के पीछे कहीं गहरे में काम—वासना में खींचती रहती है। धन भी हम कमाते हैं तो इसी आशा में कि उससे काम खरीदा जा सके; और पद की भी हम इच्छा करते हैं इसी आशा में कि पद पर बैठकर हम ज्यादा शक्तिशाली हो जाएंगे, काम को खरीद लेंगे।

सूफियों में एक कहानी है, जीसस के बाबत। ईसाईयों में उसका कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए मैं सूफियों से कहता हूं। जीसस की बहुत—सी कहानियां सूफियों के पास हैं, ईसाइयों के पास नहीं हैं। कई बार तो बहुत महत्वपूर्ण घटनाएं मुसलमानों के पास हैं, ईसाईयों के पास नहीं, जीसस के जीवन की। यह घटना भी उनमें से एक है। जीसस के तीन शिष्य जीसस के पीछे पड़े। वे उनसे कहते हैं कि हमने सुना है और देखा भी, कि आप मुर्दे को कहते हैं उठ जाओ, और वह उठ जाता है। हमें तुम्हारा मोक्ष नहीं चाहिए, हमें तुम्हारा स्वर्ग नहीं चाहिए, हमें तो सिर्फ यह तरकीब सिखा दो। यह मरा हुआ आदमी कैसे जिन्दा होता है? जीसस उनसे कहते हैं कि इस मंत्र का उपयोग तुम स्वयं पर कभी न कर पाओगे। क्योंकि तुम मर चुके होगे तो मंत्र का उपयोग कैसे करोगे? और दूसरे के जिलाने से तुम्हें क्या फायदा होगा? मैं तुम्हें वह तरकीब बताता हूं जिससे कि तुम मरो हीन! वह कहते हैं, हमे इससे कोई मतलब नही। आप हमें बहलाएं मत, हमे तो यह मुर्दे की बात बताइए, यह चीज जानने जैसी है। वे इतने पीछे पड़े कि जीसस ने कहा कि ठीक है।

सोचेंगे आप, तिलक के संबंध में मैं क्यों कह रहा हूं। हर बच्चे के माथे पर तिलक लगा दिया, जब कि उसे कुछ पता नहीं है। कभी उसे पता होगा, कभी उसे पता चलेगा तब वह इस तिलक के राज को समझ पाएगा। इशारा कर दिया गया है, ठीक जगह पर निशान बना दिया गया है। कभी जब उसकी चेतना इतनी समर्थ होगी, तब वह इस निशान का उपयोग कर पाएगा। कोई चिंता नहीं कि सौ आदमियों पर लगाया गया निशान, और निन्यान्नबे के काम नहीं पड़ा। कोई फिक्र नहीं, एक की भी काम पड़ जाए तो कम नहीं है। इस आशा में सौ पर लगा दिया गया कि कभी किसी क्षण में उसका स्मरण आ जाएगा तो पता चल जाएगा।

तिलक के लिए इतना मूल्य, इतना सम्मान, कि जब भी कुछ विशेष घटना हो, शादी हो रही हो तो तिलक हो, कोई जीतकर लौट आए तो तिलक हो! कभी आपने सोचा, कि हर सम्मान की घटना के साथ तिलक, यह सिर्फ ‘लॉ ऑफ एसोसिएशन’ का उपयोग है। क्योंकि हमारे चित्त में एक बड़े मजे का मामला है।

हमारा चित्त दुख को भूलना चाहता है और सुख को याद रखना चाहता है। हमारा चित्त लम्बे अर्सें में दुःख को भूल जाता है और सुख को याद रखता है। इसीलिए तो हमें पीछे के दिन अच्छे मालूम पड़ते हैं। बूढ़ा कहता है, बचपन बहुत सुखद था। कोई और बात नहीं है, दुख को ड्राप कर देता है मन हमारा और सुख की शृंखला को कायम रखता है। जब लौटकर पीछे देखता है तो सुख ही सुख दिखायी पड़ता, बीच—बीच के जो दुख थे, उनको गिरा आए हम रास्ते में। कोई बच्चा नहीं कहता, कि बचपन सुखद है। बच्चे जल्दी से जल्दी बड़े होना चाहते हैं। और सब के कहते हैं, बचपन बहुत सुखद है।

एक बहुत हैरानी का सूत्र पियॉगेट नाम के मनोवैज्ञानिक ने बताया है, चालीस साल तक बच्चों पर मेहनत करके। उसका कहना है कि पांच साल से पहले की किसी .बच्चे को स्मृति नहीं रहती। उसका कुल कारण यह है कि पांच साल की जिन्दगी इतनी दुखद है कि उसे याद नहीं रखा जा सकता। यह हम सोच न सकेंगे! और पियगिट ठीक कहता है, अनुभव से कहता है, भारी अनुभव से कहता है।

आपको अगर कहा जाए कि आपको कब तक की याद है तो आप ज्यादा से ज्यादा पांच साल, चार साल लौट पाते हैं। फिर क्यों नहीं लौटते पीछे की ओर? क्या उस वक्त मेमोरी नहीं बनती थी? बनती थी। क्या उस वक्त घटना नहीं घटती थी? घटती थी। क्या उस वक्त किसी ने गाली नहीं दी, और किसी ने प्रेम नहीं किया? सब हुआ है। पर मामला क्या है? चार साल पहले की स्मृति का कोई रिकार्ड, कोई हिसाब क्यों नहीं है आपके पास?

पियॉगेट कहता है कि वह दिन इतने दुख में बीतते हैं, क्योंकि बच्चा अपने को इतना दीन, इतना कमजोर, इतना हीन, सबसे दबा हुआ, इतना असहाय अनुभव करता है कि उसका कुछ भी याद रखना उसको पसन्द नहीं। वह उसको ड्राप कर देता है, भूल ही जाता है। वह कहता है, चार साल से पहले का मुझे कुछ याद नहीं। क्योंकि बाप ने कहा बैठ, तो उसको बैठना पड़ा। मां ने कहा उठो, तो उसको उठना पड़ा। सब बड़े से बड़े शक्तिशाली थे, उसकी अपनी कोई सामर्थ्य न थी, वह बिलकुल हवा में उड़ता हुआ पता जैसा था, जो कोई कुछ कह दे उसे मानना पड़ता था, सब पर निर्भर था। जरा—सी आंख का इशारा और उसको डर जाना पड़ेगा, उसके हाथ में कुछ भी सामर्थ्य न थी। उसने इसको बन्द कर दिया, वह खयाल ही छोड़ दिया कि मैं कभी था, बात खत्म हो गयी। वह चार साल के पहले की याद नहीं करता।

मजे की बात है—हिप्रोटाइज करके आपको याद करवायी जा सकती है! चार साल के पहले की ही नहीं, मां के पेट में भी जब आप थे, तब की भी स्मृति बनती है। अगर मां गिर पड़ी हो आपकी, तो बच्चे को उसके पेट में स्मृति बनती है कि चोट पहुंची, वह भी याद करवायी जा सकती है। लेकिन साधारणत: होश में वह स्मृति नहीं रहती।

तो इस तिलक को सुख के साथ जोड्ने का उपाय कारण पूर्वक है। जब भी सुख की कोई घटना घटे, तिलक कर दो। सुख याद रहेगा, साथ में तिलक भी याद रहेगा। और धीरे— धीरे सुख अगर तीसरी आंख से संयुक्त हो जाए—यहां लॉ ऑफ एसोसिएशन को थोड़ा समझ लें, पावलफ ने बहुत से प्रयोग किए।

इस सदी में रूसी वैज्ञानिक पावलफ ने एसोसिएशन के उपर सर्वाधिक काम किया है। उसका कहना यह है, कोई भी चीज जोड़ी जा सकती है, सब जोड़ सहयोग के हैं। जैसे कि एक प्रयोग सबको पता है, कि पावलफ एक कुत्ते को खाना देगा, रोटी सामने रखेगा तो लार टपकेगी। तब वह घण्टी बजाता रहेगा, घण्टी से लार टपकने का कोई भी संबंध नहीं है। कितनी ही घण्टी बजाइए, लार कैसे टपकेगी? लेकिन सटी रखी, लार टपकी, तब घण्टी बजायी।

पन्द्रह दिन वह रोटी के साथ घण्टी बजाएगा, सोलहवें दिन रोटी हटा ली, सिर्फ घपटी बजायी—लार टपकने लगी। हुआ क्या कुत्ते को? घण्टी से लार का कोई भी नैसर्गिक संबंध नहीं है, लेकिन अब संबंध जुड़ गया। रोटी के साथ घण्टी एक हो गयी, घण्टी का बजना रोटी की याद बन गयी। रोटी की गाद, चक्र शुरू हो गया उसके मन में रोटी का, लार टपकनी शुरू हो गयी। घण्टी प्रतीक की तरह आ गयी, वाह रोटी का सिम्बल हो गयी। इसी कानून का उपयोग इस तिलक में किया गया है।

आपके सुख के साथ तिलक को सदा जोडा है। जब भी सुख की कोई घटना घटी .कि तिलक और सुख को एक किया। धीरे— धीरे तिलक और सुख इतने एक हो जाएं कि तिलक को कभी भूला न जा सके, वह आपके स्मरण में टिक जाए, बैठ जाए और जब भी सुख की याद आए, तब आज्ञाचक्र की याद अ। जब भी सुख की याद आए, वह आज्ञाचक्र की याद आए। और सुख की हमें बहुत याद आती है। सुख. चाहे हुआ हो या न हुआ हो, उसकी याद में तो हम जीते हैं। जितना होता है उससे ज्यादा बड़ा करके याद करते रहते हैं पीछे। धीरे— धीरे उसको इतना बड़ा कर लेते हैं कि जिसका कोई हिसाब नहीं। सुख को हम बड़ा करते रहते हैं, मैग्रीफाई करते रहते हैं। दुख को छोटा करते रहते है, एक ही नियम के अनुसार। आपकी प्रेयसी मिली थी, कितना सुख आया था! आज सोचेंगे तो बहुत बड़ा मालूम पड़ेगा। अभी मिल जाए तो पता चले! एकदम छोटा हो जाए, सिकुड़ जाए। और हो सकता है फिर चौबीस घण्टे बाद आप मैग्रीफाई करें, अहा कितना आनन्द है! वह पीछे हमारा मन सुख को बड़ा करता जाता है।

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असल में इतना दुख है जीवन में कि अगर हम सुख को बड़ा न कर पाएं तो जीना बहुत मुश्किल है। इसको बड़ा करके, रस ले—लेकर चलाते हैं। इधर पीछे बड़ा कर लेते हैं, उधर आगे आशा में बड़ा कर लेते हैं, और चलते हैं। तिलक के साथ सुख को जोड्ने का प्रयोजन है कि जब सुख बड़ा हो तो तिलक भी बड़ा हो जाए।

इधर सुख की याद आए तो तिलक की भी याद आए। याद की इस चोट से धीरे— धीरे सुख आज्ञाचक्र से जुड़ जाए, जब भी जीवन में सुख आए तो आज्ञाचक्र का स्मरण आए। और यह हो जाता है। जब यह हो जाता है तो समझिए कि आपने सुख का उपयोग किया, तीसरी आंख को जगाने के लिए। सब सुख की स्मृतियां आशा के चक्र से जुड़ गयीं। हम सुख की धारा का उपयोग कर रहे हैं, उसको चोट करने के लिए। यह चोट जितने मार्गों से पड़ सके, उतनी उपयोगी है।

जिन मुल्कों में तिलक का उपयोग नहीं हुआ वे ऐसे मुल्क हैं जिनको ‘ थर्ड आई’ का कोई पता नहीं है, यह आपको खयाल होना चाहिए। जिन—जिन मुल्कों को तीसरी आंख का थोड़ा भी अनुमान हुआ उन्होंने तिलक का उपयोग किया। जिन मुल्कों को कोई पता नहीं है, वे तिलक नहीं खोज पाए। तिलक खोजने का कोई आधार नहीं था, इसे समझ लें थोड़ा। यह आकस्मिक नहीं है कि कोई समाज उठे और एकदम से टीका लगाकर बैठ जाए, वह पागल नहीं है। अकारण, माथे के इस बीच के बिन्दु पर ही तिलक लगाने की सूझ का कोई कारण भी तो नहीं है, यह कहीं और भी तो लगाया जा सकता है। इसलिए आकस्मिक नहीं है, इसके पीछे कारण हो तो टिक सकता है।

और भी दो—तीन बातें इस संबंध में कहूं। आपने कभी खयाल न किया होगा, जब भी आप चिन्ता में होते हैं तब आपकी तीसरी आंख पर जोर पड़ता है, इसलिए माथा पूरा का पूरा सिकुड़ता है। उसी जगह जोर पड़ता है, जहां तिलक है। बहुत चिन्ता करनेवाले, बहुत विचार करनेवाले लोग, बहुत मननशील लोग, अनिवार्य रूप से माथे पर बल डालकर उस जगह की खबर देते हैं।

और जिन लोगों ने, जैसा पीछे मैंने कहा, पिछले जन्मों में कुछ भी तीसरी आंख पर जोर किया है, उनके जन्म के साथ ही उनके माथे पर अगर आप हाथ फेरे तो आपको तिलक की प्रतीति होगी। उतना हिस्सा थोड़ा—सा धंसा हुआ होगा—थोड़ा सा, किंचित, ठीक तिलक जैसा धंसा हुआ होगा। दोनों तरफ के हिस्से थोड़े उभरे हुए होंगे, ठीक उस जगह पर जहां पिछले जन्मों में मेहनत की गयी है। और वह आप, अंगूठा लगाकर, आंख बन्द करके भी पहचान सकते हैं। वह जगह आपको अलग मालूम पड़ जाएगी। तिलक हो या टीका—टीका तिलक का ही विशेष उपयोग है। लेकिन दोनों के पीछे तीसरी आंख छिपी हुई है।

हिप्रोटिस्ट एक— छोटा—सा प्रयोग करते हैं। चारकाट फ्रांस में एक बहुत बड़ा मनस्विद हुआ है जिसने इस बात पर बहुत काम किए। आप भी छोटा—सा प्रयोग करेंगे तो आपको भी चारकाट की बात ठीक से समझ में आ जाएगी। अगर आप किसी के सामने, उसके माथे पर दोनों आंखें गड़ाकर देखें, तो वह आदमी आपको गड़ाने न देगा। अगर आप किसी के माथे पर दोनों आंखें गड़ाकर देखें तो वह आदमी जितना क्रुद्ध होगा उतना और किसी चीज से नहीं होगा। पर वह अशिष्ट व्यवहार है, वह आप कर नहीं पाएंगे। सामने से तो वह स्थान बहुत निकट है, वह सिर्फ डेढ़ इंच के फासले पर है।

अगर आप किसी के माथे पर, पीछे से भी दृष्टि रखें तो भी आप हैरान हो जाएंगे। रास्ते पर आप चल रहे हैं, कोई आदमी आपके आगे चल रहा है, आप ठीक जहां माथे पर यह बिन्दु है तिलक का, ठीक उसके आर—पार अगर हम एक छेद करें तो पीछे जहां से छेद निकलता हुआ मालूम पड़े, अनुमान करके, उस जगह दोनों आंखें गड़ा लें। और आप कुछ ही सेकेंड आंख गड़ा पाएंगे कि वह आदमी लौटकर आपको देखेगा।

सिर्फ होटल के बरे भर नहीं देखेंगे। उन पर भर आप प्रयोग मत करना किसी होटल में बैठकर। उसका कारण है। सिर्फ वे लोग नहीं देखेंगे—जैसे होटल के बेरे का मैंने आपको कहा, वह जानकर कहा ताकि आपको खयाल में आ जाए। होटल का बेरा भर आपकी तरफ नहीं देखेगा, चाहे आप उसके पीछे माथे की तरफ आंखें गड़ाए—नहीं देखेगा, क्योंकि पूरे वक्त वह गाहकों से बचने की कोशिश में है। जैसे ही उसे पता चल जाए, कोई उसमें उत्सुक है, वह और ज्यादा दूसरी टेबलों के आसपास चक्कर लगाने लगेगा। बस वह भर आपको नहीं देखेगा और कोई भी देखेगा।

अगर आप ठीक थोड़े दिन अभ्यास करें और उस आदमी को सुझाव दें तो सुझाव भी वह आदमी मानेगा। समझ लें, आप उस आदमी के माथे पर आंख गड़ाकर कुछ सेकेंड बिना पलक झंपे देखें, वह आदमी पीछे लौटकर देखेगा। अगर वह आदमी लौटकर देखता है तब आप उसको आशा भी दे सकते हैं। फिर दोबारा उस आदमी को आप कहें कि बाएं घूम जाओ और वह आदमी बाएं घूमेगा, और बड़ी बेचैनी अनुभव करेगा—हो सकता है उसको दाएं जाना हो।

यह आप थोड़ा प्रयोग कर के देखेंगे तो हैरान हो जाएंगे। यह तो पीछे से है जहां से कि फासला बहुत ज्यादा है, सामने से तो बहुत हैरानी के परिणाम होते हैं। जितने लोग भी हल्के किस्म का शक्तिपात करते रहते हैं वह आपके इसी चक्र के कारण करते हैं और कुछ कारण नहीं है। कोई साधु कोई संन्यासी अगर शक्तिपात के प्रयोग करते रहते हैं लोगों पर, तो वह यही कि आपको आंख बन्द करके सामने बिठा लिया है।

आप समझ रहे हैं, वह कुछ कर रहे हैं। वह कुछ नहीं कर रहे हैं। वह सिर्फ आपके ही माथे के इस बिन्दु पर दोनों आंखें गड़ाकर बैठे हैं, लेकिन आप तो आंख बन्द किए बैठे हैं। और इस बिन्दु पर जो भी आपको सुझाव दिया जाएगा, आपको फौरन भ्रांति की प्रतीति हो जाएगी। अगर कहा जाए, भीतर प्रकाश ही प्रकाश है तो आपके भीतर प्रकाश ही प्रकाश हो जाएगा। इधर से आप गए कि वह विदा हो जाएगा। दो चार दिन उसकी हल्की झलक रह सकती है, फिर समाप्त हो जाती है। वह कोई शक्तिपात वगैरह नहीं है, वह सिर्फ आपके आज्ञाचक्र का थोड़ा—सा उपयोग है।

तृतीय नेत्र की अनूठी सम्पदा है, और इसके अपरिसीम उपयोग हैं। उसका सिर्फ सिम्बोलिक रूप तिलक है। जब यहां दक्षिण में पहली दफा ईसाई फकीर आए तो कुछ ईसाई फकीरों ने तो आकर तिलक लगाना शुरू कर दिया। आज से एक हजार साल पहले वेटिकन की अदालत में मुकदमे की हालत आ गयी। क्योंकि यहां जिन ईसाई फकीरों को भेजा था उन्होंने यहां आकर जनेऊ पहन लिया, तिलक भी लगाया और खड़ाऊं भी डाल ली, वह हिन्दू संन्यासी की तरह रहने लगे। वेटिकन की अदालत तक मामला गया कि यह तो बात गलत है। जिन फकीरों ने यह किया था, उन्होंने उत्तर दिए। उन्होंने कहा, यह गलत नहीं है।

तिलक लगाने से हम हिन्दू नहीं हो रहे हैं। तिलक लगाने से तो सिर्फ हमें एक रहस्य का पता चला है, जिसका आपको पता नहीं है। खड़ाऊं को पहनकर हम हिन्दू नहीं हो गए। यह तो हुये पहली दफा हिन्दूओं की समझ का पता चला है कि ध्यान करते वक्त अगर लकड़ी पैर के नीचे हो तो, बिना लकड़ी के जो काम महीनों में होगा, वह लकड़ी के साथ दिनों में हो सकता है। हम हिन्दू नहीं हो गए हैं, लेकिन अगर हिन्दू कुछ जानते हैं तो हम नासमझ होगे कि उसका उपयोग न करें। और निशित ही हिन्दू कुछ जानते हैं।
है। लेकिन पिछले दो सौ साल में एक घटना घटी, जिससे हमको परेशानी हुई।

पिछले दो सौ साल में एक घटना घटी। वह घटना हमारे खयाल में न आए तो वह परेशानी जारी रहेगी। इस देश के ऊपर सैकड़ों बार हमले हुए हैं लेकिन कोई हमलावर ठीक जगह पर हमला नहीं कर पाया। किसी ने धन लूट लिया, किसी ने जमीन पर कब्जा कर लिया, किसी ने मकान और महल ले लिए। लेकिन ठीक जो हमारा अन्तःस्थल था, उस पर कोई हमला नहीं कर पाया। उसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं गया।

पहली बार पश्रिमी सभ्यता ने इस मुल्क के अन्तःस्थल पर चोट करनी शुरू की। और वह चोट करने का जो सुगमतम उपाय था वह यह था कि आपके पूरे इतिहास को आपसे विच्छिन्न कर दिया जाए। आपके इतिहास में और आपके बीच में एक खाई पैदा हो जाए। बस फिर आप बिना जड़ के हो जाएंगे, अपरूटेड हो जाएंगे। फिर आपकी कोई ताकत न .रह जाएगी। अगर आज पश्‍चिम की सभ्यता को नष्ट करना हो तो सारे पश्‍चिम के मकान गिराने की जरूरत नहीं है, और न सिनेमाघर गिराने की जरूरत है, और न पश्‍चिम की होटलें गिराने की जरूरत है।

सिर्फ पश्‍चिम की पांच युनिवर्सिटीज को नष्ट कर दिया जाए, पश्‍चिम का कल्चर नष्ट हो जाएगा। पश्चिम की जो संस्कृति है, वह सिनेमा ‘बर में, होटल में और कोई नाइट क्लब में नहीं है। वे चलते रहें, इनसे कुछ लेना—देना नहीं है। सिर्फ पश्विम की पांच केन्द्रीय बड़ी यूनिवर्सिटियां नष्ट कर दी जाएं पश्‍चिम एकदम खो जाएगा। दुनिया में असली जो आधार होता है संस्कृति का, वह उसके ज्ञान के सूत्र होते हैं। उसकी जड़ें होती हैं उन ज्ञान के सूत्रों की शृंखला में। ज्यादा देर की जरूरत नहीं है, सिर्फ दो पीढ़ी को इतिहास से वंचित कर दिया जाए तो आगे का मामला टूट जाएगा।  -ओशो

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