आज की शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है कि आप स्वयं को कभी भी नहीं जान पायेंगे


सुबह ध्यान सीखने के लिए आने वाली बच्चियों से से पूछा कि बताओ आप लोग पढ़ाई किसलिए करते हैं ?

सभी सोचने लगीं… फिर एक बोली, “ताकि अच्छी नौकरी मिल जाए” |

मैंने बाकियों कि ओर देखा तो सभी ने पहली लड़की का ही समर्थन किया |

तो आज शिक्षा का अर्थ हो गया है पढ़ाई और वह भी नौकरी के लिए | पहले शिक्षा का अर्थ होता था सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास | एक विद्यार्थी चाहे वह राजकुमार हो या भिक्षुक कुमार, कृषि से लेकर युद्ध कौशल तक सभी विद्याएँ सीखता था | गुरु का उद्देश्य होता था कि शिष्य को जीवन के हर संघर्ष से सामना करने के लिए तैयार कर दे | माता पिता भी गुरु के नियमों में कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे | वे नहीं कहते थे कि मेरे बच्चे के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है यदि गुरु उनको मुर्गा बनाते या किसी और प्रकार का शारीरिक दंड देते थे | और उन कठोर नियमों का पालन करने के बाद जब शिक्षा पूरी करके विद्यार्थी बाहर आते थे, तो जीवन उन्हें स्वर्गमय प्रतीत होता था | जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ उन्हें विचलित नहीं कर पाती थी |

जबकि आज शिक्षा पूरी करने के साथ ही बच्चा अपने आप को बेरोजगारों की भीड़ में खड़ा पाता है | आज सब कुछ विपरीत हो गया | आज बच्चे जरा जरा सी बात में आत्महत्या कर ले रहें हैं | आज नैतिकता का स्तर इतना तेजी से गिर रहा है, कि बलात्कार और हत्या तो जैसे आम दिनचर्या में घटने वाली घटनाएँ हो गयीं है | अब कोई इन घटनाओं पर चौंकता भी नहीं है और न ही कोई दुःख की अनुभूति करता है | बड़ों का मान सम्मान किस्से कहानियाँ हो गयीं हैं और अशिष्टता व अभद्र भाषा सर्वमान्य संस्कार बन गए हैं |

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और यह सब हुआ हमारी मानसिक दरिद्रता के कारण और पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के कारण | हम आत्मगौरव की अनुभूति ही बिसार दिए | हम स्वयं से ही इतने अपरिचित हो गये कि हर अपरिचित पर संदेह करने लगे | हम अपनी संस्कृति और अपनी ही सभ्यता से इतनी घृणा करने लगे कि अब कोई भी भारतीय कहलाना नहीं चाहता, सिवाय राजनैतिक पार्टियों के दुमछल्लों को छोड़कर | वे भी केवल इसलिए क्योंकि उन्हें उनके नेता में अपना आस्तित्व दीखता है | यदि वह नेता नहीं रहेगा या पार्टी नहीं रहेगी तो उनके स्वयं का कोई आस्तित्व नहीं रह जाएगा | इसलिए समर्थन किये चले जा रहें हैं, नेता गलत है या सही, साफ़ छवि का है या दागी, सभ्य है या अपराधी….. कोई अंतर नहीं पड़ता | राष्ट्र का हित हो रहा है या नहीं, जनता के लिए काम हो रहा है या नहीं, कोई मायने नहीं रखता… बस सपनों में जी रहें हैं सभी |

अभी कल ही की बात है कि एक महिला मित्र ने मुझे मैसेज किया कि जिस वकील ने जनकल्याण के लिए निःशुल्क सेवा या बहुत ही कम शुल्क सेवा देने की बात कही थी गरीबों और शोषितों के लिए, वह धोखेबाज निकला | वह तो कलमानी को छुड़ाने के लिए पाँच करोड़ रूपये लेकर केस लड़ा था… और अब आया भी नहीं उस टाइम पर, जो टाइम उसने दिया था लोगों से मिलने के लिए | जबकि तब मीडिया में बड़ा प्रचार करवाया था उसने कि वह जनता की सेवा के लिए योगदान देने आया है….. |

मैंने तब भी कहा था उनसे कि यह वकील धोखा देगा… लेकिन तब मेरी बात किसी ने नहीं मानी थी और अब इतने महीनों के बाद वही हुआ जो मैंने कहा था | तो जब हम स्वयं से अपरिचित रहते हैं तो कोई भी हमें मुर्ख बना सकता है | लेकिन जब हम स्वयं से परिचित हो जाते हैं तो सामने वाले के मनोभावों को समझना आसान हो जाता है |

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आज की शिक्षा व्यवस्था ही ऐसी है कि आप स्वयं को कभी भी नहीं जान पायेंगे | आप मानव से भेड़-बतख बना दिए गए हैं मानसिक रूप से इस बात का आप लोगों को तनिक भ
ी अहसास नहीं है | ये पढ़े लिखे डिग्रीधारी लोग कितने समझदार हैं, इसे आप इस बात से समझ लीजिये कि किसी भी राष्ट्र का कोई भी नेता राष्ट्र को आत्मनिर्भर नहीं बना पा रहा | सभी कर्जों पर राष्ट्र चला रहें हैं | यहाँ तक की अमेरिका भी कर्जों पर ही जीवित है | आप कह सकते हैं कि यह तो सामान्य बात है, लेकिन मैं नहीं मानता कि यह सामान्य बात है | क्योंकि जब आप कर्जों में दबे रहेंगे तो आप वह स्वतंत्रता का अनुभव नहीं कर पायेंगे जो कि एक प्राणी (विशेष कर जब वह सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी हो) को अनुभव करना चाहिए | ये लोग न स्वयं सुखी रहेंगे और न ही किसी और को रहने देंगे | कर्जा लेंगे आने स्वार्थ के लिए और वसूल करेंगे जनता से महँगाई और टैक्स के नाम पर |

तो अपने बच्चों को शिक्षा दीजिये ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके, न कि नौकर | वह सेवक भी बने तो सहयोगी भाव से बने, विवशतावश नहीं | एक ऐसे स्कूल की भारत वर्ष को इस समय सबसे अधिक आवश्यकता है, जो भारतीयों को भारतीय बनाये | लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पाठ्यक्रम और नियम वही लागू होंगे जो इन डिग्रीधारी उधारखोरों ने बनाये हैं | यदि कोई विद्यालय ऐसा बनाया भी जाए तो समस्या है भारतीयता के नाम पर सारे पण्डे पुरोहित चले आयेंगे शास्त्र और नियम समझाने | फिर वह विद्यालय भी वैसा ही हो जाएगा जैसा कि मदरसा या संघ वालों का है | एक समान भाव विकसित हो सके, ऐसे बच्चे भविष्य में आयें जो राष्ट्र के गौरव को महत्व दें ऐसा भाव शायद उस विद्यालय में जागृत न की जा सके | जो उधार और भीख माँगने की प्रवृति से मुक्त करवा सके भारत को, ऐसे नेताओं की आवश्यकता है | लेकिन यह असंभव है जब तक भेड़ों के जीवन की आदि हो चुकी भारतीय जनता जागरूक नहीं होती | जब तक ये बात इनके दिमाग में नहीं आती कि ये नेता हमारा भला नहीं कर रहे, हमें अपना भला स्वयं करना होगा, तब तक कोई आशा नहीं दिख रही | –विशुद्ध चैतन्य

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