संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से


बिगुल बाज रहा है आज़ादी का गगन गूँजता नारो से,
मिला रही है आज हिंद की मीठी नज़र सितारो से,
एक बात कहनी है लेकिन आज देश के प्यारो से,
जान से नेताओ से फ़ौजो की खड़ी कतारो से,


कहनी है इक बात हमें इस देश के पहरेदारो से,
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से,
झाँक रहे हैं अपने दुश्मन अपनी ही दीवारो से,
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से,


लूट रहे हैं देश की दौलत लोभी रिश्वत खोर यहाँ,
काट रहे जनता की जेबें वतन के दुश्मन चोर यहाँ,
सच के ऊपर झूठ का दिन-दिन बढ़ता जाता ज़ोर यहाँ,
जागते रहना ऐ नेताओ खतरा चारो ओर यहाँ,


नही चलेगा काम दोस्तो केवल जय जयकारों से,
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से,
आज उठाओ सब दुकान यहाँ से काले धंधे की,
दाल न हरगिज़ गलने देना अब स्वार्थ के अंधो की,


सबसे कह दो ये जमी है आज़ादी के बन्दों की,
भगतसिंह के इस भारत में जगह नही जयचंदो की,
आज यही है माँग हमारी कोम के सब सरदारो से,
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से,


ऐ भारत माता के बेटो, सुनो समय की बोली को
फैलाती जो फुट यहाँ पर, दूर करो उस टोली को,
कभी न जलने देना फिर से भेदभाव की होली को,
जो गाँधी को चीर गयी थी याद करो उस गोली को,
सारी बस्ती जल जाती है मुठ्ठी भर अंगारो से,


जागो तुमको बापू की जागीर की रक्षा करनी है,
जागो लाखों लोगों की तकदीर की रक्षा करनी है
होशियार, तुमको अपने कश्मीर की रक्षा करनी है,
आती है आवाज़ यही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारो से,
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से,
दूर हटा दो उस सबको जो प्यारी जंजीर काट रहे,
दूर हटा दो उन सबको जो खून वतन का चाट रहे,
वो सब है इस देश के दुश्मन जनता को जो डाट रहे,


आज़ादी की नयी लता को छुरियो से चाट रहे,
जागो लोगो जगा रहा है तुमको काल इशारो से,
संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से,       

यह गाना कम से कम चालीस वर्ष पुराना तो होगा ही लेकिन आज भी सार्थक है | ऐसा लगता है जैसे आज ही सुबह किसी ने यह गीत लिखा हो क्योंकि एक-एक शब्द वर्तमान समाज व राजनीती पर प्रहार कर रहा है |
        जिस समय यह गीत लिखा गया होगा उस समय की स्थिति भी बिलकुल वही रही होगी | गद्दार हर युग में रहे है, हर शासनकाल में रहे और आज भी हैं | गद्दार अर्थात किसी व्यक्ति/संस्था/राष्ट्र से विश्वासघात करने वाला | राष्ट्र से विश्वासघात करने वाले को हम राष्ट्रद्रोही कहते हैं और सत्ता या शासक से विश्वासघात करने वाले को हम राजद्रोही कहते हैं | दुर्भाग्य है हमारा कि आजतक हम राष्ट्रद्रोह और राजद्रोह का ही अंतर नहीं समझ पाए ढोए चले जा रहे हैं उसे जो लोकतान्त्रिक देश में मान्य नहीं है….

         देशद्रोह की परिभाषा स्वतंत्रता के बाद भी नहीं बदली आज भी राजद्रोह को राष्ट्रद्रोह मानता है हमारा संविधान | सैडीशन लॉ यानि देशद्रोह कानून एक उपनिवेशीय कानून है जो ब्रितानी राज ने बनाया था। लेकिन भारतीय संविधान में उसे अपना लिया गया था। भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124 में राष्ट्रद्रोह की परिभाषा दी गई है जिसमें लिखा है कि अगर कोई भी व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है। हालांकि ब्रिटेन ने ये कानून अपने संविधान से हटा दिया है, लेकिन भारत के संविधान में ये विवादित कानून आज भी मौजूद है। एक ओर भारतीय संविधान में सरकार की आलोचना देशद्रोह का अपराध है। दूसरी ओर संविधान में भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी भी दी गई है। देशद्रोह के आरोप में हुई गिरफ्तारियों की मानवाधिकार कार्यकर्ता व संस्थाएं आलोचना करती रही हैं। और भारत में उसी कानून के तहत गिरफ्तारियाँ होती हैं |
        लेकिन सभी को यह भी समझना चाहिए कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और यहाँ सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाने का सभी को अधिकार है और भाजपा ने इसी अधिकार का उपयोग किया था कांग्रेस सरकार में… | लेकिन हमें राष्ट्रद्रोह और राजद्रोह के अंतर को समझना होगा और संविधान में राष्ट्रद्रोह को पुनः परिभाषित करना होगा और संविधान में भी संशोधन करवाना होगा |
       मेरे अनुसार राष्ट्र के साथ किये गये विश्वासघात को हम देशद्रोह कहते हैं | अंग्रेजी का Sedition और राष्ट्रद्रोह दोनों का अर्थ एक ही नहीं है बिलकुल वैसे ही जैसे रिलिजन और धर्म का अर्थ एक ही नहीं है | हमारी भाषा अंग्रेजी से कई गुना अधिक परिष्कृत है इसलिए हमारी भाषा में जो शब्द होते हैं उनके समानार्थी शब्द अंग्रेजी में नहीं मिल सकते | 
      Sedition = conduct or speech inciting people to rebel against the authority of a state or monarch अर्थात किसी राज्य के राजा, रानी या शासकीय व्यवस्था व प्रशासन के विरुद्ध कुछ कहना या विद्रोह करना | यह बिलकुल शरिया की तरह ही है इस्लामिक देशों में भी शायद यही है राष्ट्रद्रोह की परिभाषा | जबकि हमारे देश में राष्ट्र को अधिक महत्व दिया जाता है, किसी भी राजा या प्रशासनिक अधिकारी से | इसलिए राष्ट्रद्रोह और राजद्रोह दो अलग अलग शब्द हैं हमारे पास | चूँकि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है इसलिए राजद्रोह अपराध नहीं है और राष्ट्रीय चुनाव में हम सत्तापरिवर्तन का अधिकार रखते हैं अपने वोट देकर | हमें यह भी अधिकार प्राप्त है कि हम सरकार के राष्ट्रविरोधी किसी भी कदम की कड़ी आलोचना ही नहीं, खुलकर विरोध प्रदर्शन भी कर सकते हैं |
         तो राष्ट्रद्रोह की परिभाषा होगी; राष्ट्रीय संपत्ति, जैसे भूमि, जल, वायु, वन, खनिज, धन, किसान व बच्चों, संरक्षित जीवों, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गुप्त सूचनाएं…. आदि को जानबूझ कर क्षति पहुँचाना, क्षमता होते हुए भी राष्ट्रीय बैंको से लिए करोड़ों रूपये के कर्जों को न लौटना, जानबूझ कर टैक्स न चुकाना या नेताओं के मिलीभगत से माफ़ी प्राप्त कर लेना, राष्ट्रीय संथाओं में घोटाले करना, अपने पद का दुरूपयोग करना और किसी विशेष वर्ग या संस्था को लाभ पहुँचाने के लिए नियमों के विरुद्ध जाकर कोई छूट देना, राष्ट्रविरोधी किसी भी गतिविधि में भाग लेना, साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए जानबूझकर कोई बयान देना, दंगा करवाना, नफरत फैलाना, जातिवाद और साम्प्रदायिक आधार पर राजनीती करना… आदि | ऐसे व्यक्ति, संस्था या संगठन का समर्थन करना भी राष्ट्रद्रोह है जो साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़कर देश में अराजकता उपन्न करता हो |
         लेकिन दुर्भाग्य से भारत की स्थिति बिलकुल उलटी है | यहाँ उपरोक्त में से किसी को राष्ट्रद्रोह नहीं माना जाता उलटे जातिवाद व समप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वालों को फूल मालायें पहनाई जाती है | घोटालों के विशेषज्ञों को विशेष सम्मान व सत्ता-सुख दिया जाता है, सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाने वालों को बड़ी श्रृद्धा की दृष्टि से देखा जाता है…. बड़ा ही अजीब है मेरा देश भी | जो हमारे देश को लूटते हैं, जो किसानों और आदिवासियों की जमीनों को छीनते हैं, जो जंगलों और कृषि योग्य भूमि को नष्ट कर रहे हैं, उनको सर आँखों पर बैठाये रहते हैं उनकी जयकारा लगाते हैं | शायद शिक्षा के निजीकरण का ही परिणाम है यह कि आज तक राष्ट्रद्रोह की सही परिभाषा नहीं समझ में आई किसी को | शायद विलायती शिक्षा का ही यह परिणाम है कि आज तक कोई भी इस योग्य नहीं हो पाया कि संविधान में संशोधन करवाकर राष्ट्रद्रोह को सही रूप से परिभाषित करवाया जाए |
            मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि मैं विद्वान हूँ और आपको मेरी बात माननी ही है… आप लोग मुझसे लाख गुना अधिक विद्वान हैं, अंग्रेजी बोलते हैं, पढ़े-लिखे हैं और आपकी नजर मुझसे कई गुना अधिक तेज हैं और आपकी नजर में हो सकता है कि घोटालेबाज, देश को चूना लगाने वाले उद्योगपति, बैंको का लाखों करोड़ों का धन कर्ज के रूप में डकार जाने वाले पूंजीपति राष्ट्रभक्त हों | तभी आपको कभी इनपर उतना क्रोध नहीं आता जितना कि जेएनयू के राष्ट्रविरोधी छात्रों पर आता है | यह और बात है कि मैं राष्ट्रीय संपत्ति को क्षति पहुँचाने वालों और उनका समर्थन करने वालों को उतना ही बड़ा राष्ट्रद्रोही मानता हूँ जो राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त है | ~विशुद्ध चैतन्य

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