आज हर माँ बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा अमेरिका में सेटल हो जाए |

भारत आज एक ऐसे द्वन्द में घिरा हुआ है जहाँ भारतीय स्वयं को दीन-हीन समझने लगे हैं | ब्राह्मणों ने घोषणा कर दी कि हिन्दू धर्म अर्थात उनके कर्मकांड और विधि-विधान को मानने वालों का समूह | आर्यसमाजी कह रहें हैं कि उनके कर्मकांड को मानने वाला ही हिन्दू है |

उपरोक्त दोनों ही उन हिन्दुओं को हिन्दू नहीं मानते जो माँसाहार करते हैं और उन्हें ये शाकाहारी हिन्दू हीन दृष्टि देखते हैं | आर्यसमाजी मूर्तिपूजकों की निंदा में अध्यात्मिक उत्थान का अनुभव करते हैं |

परिणाम यह हुआ कि हिन्दुओं में आपस में ही दूरियां बढ़ने लगीं और घृणा इतनी बढ़ गयी कि लोगों ने या तो विदेशी धर्मों को अपनाना शुरू कर दिया या फिर विदेशों की ओर प्रस्थान करना शुरू कर दिया | आज हर माँ बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा अमेरिका में सेटल हो जाए | हर बच्चा कान्वेंट में दाखिला लेना पसंद करता है न कि किसी भारतीय शिक्षण संस्थान में | और यदि कोई भारतीय शिक्षण संस्थान आज सफल भी हो रहा है तो कारण यही है कि वहाँ से बच्चों को विदेशों में जाने का अवसर मिल रहा है |

तो इतना पलायन हो क्यों रहा है ? इस विषय में हमारे धर्म के ठेकेदार कभी चिंतन नहीं करते | उनका तो सारा ध्यान धर्म की दुकानों तक ही सीमित है | किस मंदिर में चढ़ावा अधिक आ रहा है और कहाँ से अधिक आ सकता है… बस इससे आगे की कोई सोच नहीं है उनकी |

लेकिन मैं मानता हूँ कि भारत कभी भी इतना संकीर्ण मानसिकता का नहीं रहा होगा, जितना ब्राहमणों और आर्यसमाजियों ने आज बना दिया | अमेरिका किसी को मांसाहार और शाकाहार के तराजू में नहीं तोलता वह योग्यता को प्रमुखता देता है | न ही जापान इतनी संकीर्णता से सोचता है | और यह दोनों ही देश हम शाकाहारियों के देश से कहीं अधिक सक्षम और प्रगतिशील हैं |

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लेकिन हम अपनी पीपणी बजाये फिर रहे हैं धर्म के नाम पर और पूछें यदि कि इन धर्म गुरुओं ने ऐसा कौन सा तीर मार लिया इतने वर्षों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए या आर्थिक या सामाजिक विकास के लिए तो शायद कुछ मंदिर मस्जिद खुलवाने और दंगा-फसाद करवाने के कुछ और बताने लायक नहीं हैं |

आज वे मूर्ति पूजा का विरोध कर रहें हैं जो स्वयं को बहुत पढ़े लिखे समझते हैं, लेकिन शायद उन्हें नहीं मालुम कि मूर्तियों की रचना व्यर्थ नहीं है और न ही पाखंडियों ने इसकी कल्पना की थी | मूर्तियों से कुछ कहने की कोशिश की गयी थी, कुछ समझाने का प्रयास किया गया था | जो पण्डे पुरोहितों के सर के ऊपर से निकल गया और मूर्तियों को जोड़ दिया स्वार्थ पूर्ति से | अब किसी को धन चाहिए, या वर चाहिए या सुख समृद्धि चाहिए तो मूर्तियों को घर में रख कर आरती करने, भजन करने या पंडितों को भोग लगाने से प्राप्ति हो जायेगी ऐसा लोग मानने लगे | जबकि वास्तविकता यह है कि मूर्तियों से जो समझाया जा रहा है, उसे समझने से ही उन्नति का मार्ग खुलेगा यह बात किसी ने नहीं समझाया |

गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। इसलिए हर साल भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश उत्सव मनाया जाता है। गणेश को वेदों में ब्रह्मा, विष्णु, एवं शिव के समान आदि देव के रूप में वर्णित किया गया है। इनकी पूजा त्रिदेव भी करते हैं। भगवान श्री गणेश सभी देवों में प्रथम पूज्य हैं। शिव के गणों के अध्यक्ष होने के कारण इन्हें गणेश और गणाध्यक्ष भी कहा जाता है। भगवान श्री गणेश मंगलमूर्ति भी कहे जाते हैं क्योंकि इनके सभी अंग जीवन को सही दिशा देने की सिख देते हैं।

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बड़ा मस्तक: गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेत
ृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्घि कुशाग्र होती है। गणेश जी का बड़ा सिर यह भी ज्ञान देता है कि अपनी सोच को बड़ा बनाए रखना चाहिए।

छोटी आंखें: गणपति की आंखें छोटी हैं। अंग विज्ञान के अनुसार छोटी आंखों वाले व्यक्ति चिंतनशील और गंभीर प्रकृति के होते हैं। गणेश जी की छोटी आंखें यह ज्ञान देती है कि हर चीज को सूक्ष्मता से देख-परख कर ही कोई निर्णय लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी धोखा नहीं खाता।

सूप जैसे लंबे कान: गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं इसलिए इन्हें गजकर्ण एवं सूपकर्ण भी कहा जाता है। अंग विज्ञान के अनुसार लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं। गणेश जी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं फिर अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेते हैं। बड़े कान हमेशा चौकन्ना रहने के भी संकेत देते हैं। गणेश जी के सूप जैसे कान से यह शिक्षा मिलती है कि जैसे सूप बुरी चीजों को छांटकर अलग कर देता है उसी तरह जो भी बुरी बातें आपके कान तक पहुंचती हैं उसे बाहर ही छोड़ दें। बुरी बातों को अपने अंदर न आने दें।

गणपति की सूंड: गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती डुलती रहती है जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें ज्ञान देती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे कभी दुखः और गरीबी का सामना नहीं करना पड़ता है। शास्त्रों में गणेश जी की सूंड की दिशा का भी अलग-अलग महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सुख-समृद्वि चाहते हो उन्हें दायीं ओर सूंड वाले गणेश की पूजा करनी चाहिए। शत्रु को परास्त करने एवं ऐश्वर्य पाने के लिए बायीं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश की पूजा लाभप्रद होती है।

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बड़ा उदर: गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है। इसी कारण इन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर होने का कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं और किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली का प्रतीक होता है। गणेश जी का बड़ा पेट हमें यह ज्ञान देता है कि भोजन के साथ ही साथ बातों को भी पचना सीखें। जो व्यक्ति ऐसा कर लेता है वह हमेशा ही खुशहाल रहता है।

एकदंत: बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्घ हुआ था। इस युद्घ में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। इस समय से ही गणेश जी एकदंत कहलाने लगे। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। यह गणेश जी की बुद्घिमत्ता का परिचय है। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार से किया जाना चाहिए। ~विशुद्ध चैतन्य 

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