क्या कभी आपने सोचा है….???

एक सुनियोजित षड्यंत्र का वह मकड़जाल जो पिछले सौ वर्षों से बुना जा रहा था वह आज भारत में फैलाया जा रहा है | यह बहुत ही आसानी से हम देख सकते है और यह भी देख सकते हैं कि कैसे अंधभक्त इसमें फंसते जा रहे हैं और कैसे उनको देश को फिर से बंधुआ मजदूर बनाने की पूरी तैयारी की जा रही है | और यह काम कितना आसान है यह देखकर आश्चर्यचकित तो होता हूँ, लेकिन उससे अधिक आश्चर्य होता है कि हर कोई यह जानता है समझता है फिर भी यह मानकर खुश हो रहा है कि हमारा नंबर तो बाद में आएगा… कम से कम हम दूसरे को बर्बाद होते तो देख ही लेंगे | यह बिलकुल वैसा ही है जैसे पड़ोसी के घर में आग लगी देख कर कोई सबसे पहले यह देखे कि आगे उसके घर तक कितनी देर में पहुँचेगी |

खिलाड़ी खुद को तीसमारखां समझ रहे हैं और उनके दुमछल्ले खुद को वजीरेआजम | ये खुश हो रहे हैं कि इस खेल को खेलने के बाद जब हर नागरिक बंधुआ बना लिया जाएगा तब विदेशी आका इनको ढेर सारा इनाम देंगे… जैसे कि आजादी से पहले मिला होगा उन लोगों को, जिन्होंने ईस्टइण्डिया कम्पनी का साथ दिया |

खेल कितना सीधा सा है…. एक संगठन बनता है और वह सारे देश में यह प्रचार करता है कि वह बहुसंख्यकों का हितैषी है | उनके नेता और दुमछल्ले अल्पसंख्यकों के विरुद्ध आये दिन कोई न कोई बयान देते रहते हैं… फिर एक दिन पता चलता है कि उस संस्था ने एक ब्रांच और बना ली जो अल्पसंख्यकों की हितैषी है | अब ये दोनों ब्रांच के सदस्य मूल संस्था के प्रति वफादारी दिखाते हैं और यह प्रचार करते हैं कि हम राष्ट्र के हित के लिए एकजुट हुए हैं | फिर कुछ और ब्रांच बनती हैं जिन्हें उग्रदल कहा जाता है | ये लोग देश में आये दिन कोई न कोई उपद्रव मचाते रहते हैं और यह मूल संस्था यह जताती है कि इन छिछोरों से उनका कोई लेना देना नहीं है |

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जनता इसमें उलझकर रह जाती है और यही नहीं समझ पाती कि खेल का असली खिलाड़ी है कौन | फिर जनता कहती है, “अरे छोड़ो हमें क्या, हमारी दाल रोटी तो चल रही है |” और यह खेल धीरे धीरे पूरे देश को निगल जाता है बिलकुल वैसे ही जैसे चौपड़ में पाण्डवों का राज्य निगल लिया था शकुनी ने |

  • क्या कभी आपने सोचा है, यदि आज मिडिया पूंजीपतियों की रखैल न होती, राजनैतिक पार्टियाँ, नेताओं की रखैल न होती और न ही पूंजीपतियों के कर्जदार, या गुलाम होते…. तो देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ चल पातीं ?
  • कभी आपने सोचा है कि मिडिया आपको उलझाए रखने के लिए मूल मुद्दों से ध्यान बँटाये रखती है क्योंकि इनके आका तय करते है कि इनको क्या दिखाना है और क्या नहीं ?
  • कभी आपने सोचा है कि साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ना राष्ट्रद्रोह है, लेकिन ऐसा करने वाले नेता चुने जाते हैं तो क्यों ?
  • क्या कभी आपने सोचा है कि किसानों को असहाय और विवश क्यों किया जा रहा है मरने या जमीन छोड़ने के लिए ?
  • क्या आपने कभी सोचा है कि आदिवासियों को क्यों मारा जा रहा है या डरा-धमका कर भगाया जा रहा है ?

नहीं सोचा न ??

सोचेंगे कैसे, सोचने के लिए दिमाग चाहिए होता है और वह तो आप लोगों ने गिरवी रख दी व्यक्तिगत स्वार्थ के एवज में धर्मों के ठेकेदारों और राजनैतिक पार्टियों की तिजोरी में |

खैर ईश्वर ने चाहा तो किसी दिन मिलावटी खून में भी जो दो बूँद राष्ट्र का खून बचा हुआ है, वह उबाल मारेगा ही और उस दिन इन खिलाड़ियों को उखाड़ फेकेंगे सब मिलकर | और हाँ यह ध्यान रखें, ऐसा करने वालों में एक भी हिन्दू नहीं होगा, एक भी मुस्लिम नहीं होगा, एक भी ईसाई नहीं होगा, एक भी दलित नहीं होगा, एक भी सवर्ण नहीं होगा, एक भी ब्राहमण नहीं होगा, एक भी…… केवल भारतीय होंगे और एक ही स्वर गूंजेगा, “हम सब भारतीय हैं !” ~विशुद्ध चैतन्य

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