…फिर कहते हैं कि सरस्वती की पूजा हमारे देश में होती है और विद्वान अविष्कारक विदेशों में पैदा होते हैं

हे शारदे माँ हे शारदे माँ,
अज्ञानता से हमें तार दे मां
तू स्वर की देवी है संगीत तुझसे,
हर शब्द तेरा है हर गीत तुझसे,
हम हैं अकेले, हम हैं अधूरे,
तेरी शरण हम, हमें प्यार दे मां हे शारदे मां,
हे शारदे मां अज्ञानता से हमें तार दे मां.

यह प्रार्थना माँ सरस्वती को अर्पित है जो कि मुझे आज तक बहुत ही प्रिय है | लेकिन मैं देखता हूँ कि विद्वान लोग यह कहते पाए जाते हैं कि सरस्वती की पूजा भारत में होती है, लेकिन विद्वान व अविष्कारक विदेशों में पैदा होते हैं |

उनके तर्क में दम है क्योंकि हमारे देश में अंधभक्त, नेताभक्त, पार्टी-भक्त पैदा होते हैं, हमारे देश में नौकर पैदा होते हैं विदेशी कंपनियों के लिए या फिर सरकारी कंपनियों के लिए | हमारे देश में दुमछल्ले पैदा होते हैं, संघी-बजरंगी पैदा होते हैं, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई पैदा होते हैं, ब्राहमण, राजपूत, बनिया…..दलित और आदिवासी पैदा होते हैं….. लेकिन आविष्कारक और समझदार पैदा नही होते |

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है ?

शायद नहीं ! क्योंकि माँ सरस्वती की प्रतिमा की कल्पना हम भारतीयों ने ही की थी | हमने जो जाना वह विदेशियों ने नहीं जाना | हमने जो समझा वह विदेशियों ने नहीं समझा क्योंकि भौतिक जगत से उपर नहीं उठ पाए थे | उन्होंने जो अविष्कार किये वे भौतिक थे और उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने वाले थे, जबकि हमने आध्यात्मिक अविष्कार किये भौतिकता से ऊपर उठकर | भौतिक आविष्कार और अध्यात्मिक अविष्कार में अंतर होता है | हमने मानव मन, हृदय व आत्मा को जाना जिसकी विदेशियों ने कल्पना भी नहीं की थी | हमने मानव के उस सूक्ष्म तत्व को जाना जो विदेशियों की कभी समझ में ही नहीं आया | हमने वह जाना जो देखा व समझा नहीं जा सकता था भौतिक आँखों और लेफ्ट ब्रेन से | और उसे केवल प्रतिमाओं, तस्वीरों के माध्यम से ही समझा या समझाया जा सकता है और कोई उपाय ही नहीं है |

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लेकिन ये सब भी आधुनिक पढ़े-लिखों के समझ से परे हो गये | क्योंकि पढ़े-लिखे गुलाम मानसिकता के हो गये और इन प्रतिमाओं को व्यापारियों ने कमाई का जरिया बना लिया | अब पढ़े-लिखों के लिए प्रतिमाएं अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाली बन गयीं वहीँ पहले यही प्रतिमाएं लोगों को ज्ञान व प्रकाश देने का उत्तम माध्यम रही थीं | प्रतिमाएं तो वहीँ हैं, केवल लोग बदल गये |

किसी ने मुझ से पूछा कि आप जो नए आश्रम की कल्पना कर रहे हैं, जो आप भविष्य में करना चाहते हैं, क्या उसमें मूतियों को स्थान देंगे | मेरा उत्तर था कि बिलकुल दूँगा | किसी की मूर्ती न बैठाऊं अपने आश्रम में, लेकिन सरस्वती की एक विशाल प्रतिमा अवश्य बैठाऊंगा | मैं स्वयं किसी मूर्ती की अराधना बेशक न करता होऊं, मैं स्वयं कोई पूजा-पाठ बेशक न करता होऊं लेकिन बाकी लोगों को नहीं रोकना चाहता और न ही उनकी भावनाओं का अपमान करना चाहता हूँ | मेरे आश्रम में किसी की मान्यताओं का तब तक कोई विरोध नहीं होगा, जब तक उन मान्यताओं को मानने वाले मुझपर कुछ थोपने का प्रयास नहीं करेंगे या मुझे नियम कानून नहीं सिखायेंगे |

अब आते हैं प्रतिमाओं के विरोधियों पर | वे प्रतिमाओं का विरोध करते हैं यह कहकर कि यह अन्धविश्वास है, लेकिन यही लोग अपनी किताबों को ईश्वर द्वारा लिखा कहकर अन्धविश्वास फैलाते हैं | यही लोग अपनी, पूजा पद्धति, कर्मकांडों को श्रेष्ठ बताकर कर न केवल अन्धविश्वास फैलाते हैं, बल्कि हथियारों, गुंडों, मवालियों के बल पर दूसरों पर थोपते भी हैं | ये अपने अपने नेताओं और पार्टियों की काली-करतूतों पर आँखें बंद कर लेते हैं और दूसरों को अन्धविसवासी बताते हैं…… तो इन जैसे ढोंगियों से मूर्ती पूजक अधिक इमानदार हैं मेरी नजर में |

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हमने ढोंग करना ही सीखा बचपन से | समझना व चिन्तन मनन करना नहीं सीखा | हमने बच्चों से बच्चों का बचपन छीन लिया और उन्हें रोबोट बनाकर छोड़ दिया | हमने उन्हें इंसान होने की प्रेरणा नहीं दी, बल्कि उन्हें पैसे कमाने की मशीन और नौकर बनने की प्रेरणा दी…. और फिर कहते हैं कि सरस्वती की पूजा हमारे देश में होती है और विद्वान अविष्कारक विदेशों में पैदा होते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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