वे सुनियोजित तरीके से पूरा षड्यंत्र रचते हैं और हिन्दू या मुस्लिम के वेश में भीड़ में शामिल हो जाते हैं |

बहादुर सिख अकेले दंगाइयों का सामना करता हुआ

जब दंगा होता है तब पूरा एक सम्प्रदाय ही कलंकित हो जाता है | जबकि यह काम नेता और उनके पालतू लोगों का होता है | वे सुनियोजित तरीके से पूरा षड्यंत्र रचते हैं और हिन्दू या मुस्लिम के वेश में भीड़ में शामिल हो जाते हैं | इन्हें हम भेड़ की खाल में छुपे भेड़िया ही कहते हैं क्योंकि इनका न तो कोई धर्म होता है और न ही कोई ईमान | चूँकि सम्प्रदाय विशेष की खाल ओढ़ रखा होता है इसलिए पूरा सम्प्रदाय कलंकित हो जाता है, ऊपर से उस सम्प्रदाय का भीरूपन उनके काम को आसान कर देता है | जबकि दोषियों से सम्बंधित सम्प्रदाय को तुरंत आगे आकर उन्हें बेनकाब करना चाहिए | लेकिन डर के कारण वे ऐसा नहीं कर पाते हैं | परिणाम होता है दूसरे पक्ष का प्रतिशोध और भुगतते हैं वे निर्दोष जो भय व दब्बूपन के कारण दोषियों को सामने नहीं लाते |

अभी कुछ दिनों पहले तक यही सुनने में आ रहा था कि नेता दंगों के लिए कभी बीजेपी को दोषी बता रहे थे तो कभी आरएसएस को | लेकिन कितने शर्म की बात है कि वे स्वयं इसे अंजाम दे रहे थे अपने ही गुर्गों के द्वारा | क्या राजनीति के लिए निर्दोष लोगों की बलि चढ़ाना आवश्यक है ? क्या उन लोगों के दशकों के मेहनत से जमाई दुकाने वे पूर्ववत स्थिति में ला सकते हैं ?

पप्पू पकड़ा गया लेकिन न जाने और कितने छुट्टे घूम रहे होंगे जो कभी हिन्दू के रूप में तो कभी मुस्लिम के भेस में दंगा करवाने के उपाय सोचते रहेंगे | आम जनता को यह क्यों नहीं समझ में आता कि वे इन किराए के गुंडों से श्रेष्ठ हैं | इन अधर्मियों के कहने पर आकर आपस में बैर रखने से इनकी तो कोई हानि नहीं होती, आपका अपना ही जीवन दुष्कर हो जाता है | क्या हमारा धर्म क्या है और हमें कैसे जीना है यह सब अब गुंडों मवालियों से समझना पड़ेगा ? वे लोग हमें बताएँगे कि हिन्दू कैसा हो और मुस्लिम कैसा हो ? क्या यही शिक्षा हमारे धर्म ग्रन्थ और हमारे गुरु हमें देते आये थे ? क्या हमारे पास अपना विवेक नहीं है ?

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अरे मूर्खो अब भी चेत जाओ | आपस में ही लड़ते रहोगे तो ये अधर्मी ही हम पर शासन करेंगे और यदि हम इनके बहकावे में न आयें तो ये खुद ही भूखों मर जायेंगे |

यहाँ समाचार के अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें यह पता चलता है कि इसमें शामिल लोग कहीं से भी किसी भी धर्म के आदर्शों पर नहीं थे और न ही मैं उन्हें किसी भी आधार पर धार्मिक मानता हूँ | -विशुद्ध चैतन्य  

पुलिस पूछताछ में मोहर्रम अली पप्पू ने विवादित जमीन के लिए ब्लैकमेलिंग की बात स्वीकार की है। मांग पूरी नहीं होने पर उसने सोची-समझी साजिश के तहत मस्जिद के शहीद होने की बात पर लोगों को जमा कराकर दंगा करवा दिया।

शहर को दंगे की आग में झोंकने वाला कांग्रेसी नेता एवं पूर्व सभासद मोहर्रम अली उर्फ पप्पू वेस्ट यूपी का सबसे बड़ा दंगाई बन चुका है। पुलिस उसके खिलाफ अब तक 87 रिपोर्ट दर्ज कर चुकी हैं। दंगे में शामिल किसी भी आरोपी पर अब तक इतने मामले दर्ज नहीं हुए हैं।

गिरफ्तार किए गए उसके बेटे और भतीजे को भी पुलिस दंगे से जुड़े शहर के हर थाने में दर्ज होने वाले मामलों में आरोपी बना रही है। पुलिस का मानना है कि मुख्य आरोपी पूर्व सभासद मोहर्रम अली और उसके गुर्गों ने ही सहारनपुर में दंगा भड़काया और लूटपाट करवा कर शहर को नफरत की आग
में झोंका।

ऐसे में शहर के सभी थानों में दर्ज होने वाली रिपोर्ट में इन तीनों को पुलिस मास्टरमाइंड के रूप में आरोपी बनाएगी। वह पहले सपा और बसपा से भी जुड़ा रहा है।

दंगे का मास्टरमाइंड मोहर्रम अली उर्फ पप्पू राजनीतिक संरक्षण के लिए सियासी आकाओं की तलाश में रहता है। उसकी गिरफ्तारी के बाद सियासी गलियारे में भी हलचल मची है। पप्पू के राजनीतिक रिश्तों से सियासी दल बेचैन होने लगे हैं। कांग्रेस से पहले वह बसपा और सपा में रह चुका है। 1992 के दंगों के बाद मोहर्रम अली सपा का नगराध्यक्ष भी बना था। वह जिले के कई नेताओं के बेहद करीबी भी रहा।

दंगे के सूत्रधार मोहर्रम अली की पहचान 26 जुलाई से पहले तक केवल राजनीतिक नेताओं के गुर्गे के रूप में रही है। राजनीतिक सरंक्षण के लिए उसने कई बार आका भी बदले। लोकसभा चुनाव से पहले तक बसपा में रहे इस दंगारोपी ने कांग्रेस का दामन थामा था। हर पार्टी के नेताओं से इसके अच्छे संबंध रहे हैं और कई बार पप्पू ने अपने आकाओं के लिए काम भी किया है। यही कारण है कि अब गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक दलों में हलचल मची हुई है।

गिरफ्तारी के बाद मेडिकल कराने पहुंचे इस आरोपी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसने अपने आकाओं का नाम भी लिया था। इसके बाद अब राजनीतिक गलियारे में इस बात की चिंता है कि सलाखों के पीछे पहुंचा पप्पू कहीं उनके नाम से पर्दा न हटा दे। बता दें कि भीड़ जब थाने पहुंची थी तो पप्पू के बुलावे पर कई नेता वहां पहुंचे थे, मगर दंगा भड़कने के बाद वे दिखाई नहीं दिए थे। एसएसपी राजेश पांडेय का कहना है कि पप्पू से पूछताछ की जा रही है। उससे अन्य आरोपियों की शिनाख्त कराई जा रही है।

विवादित जमीन को लेकर हुए दंगे के बाद प्रशासन इस झगड़े को निपटाने में जुटा है। हालांकि प्रशासन इस बात को नहीं समझ पा रहा है कि आखिर इसे समाप्त कैसे किया जाए। इस विवाद को जिंदा रखकर ही मोहर्रम अली पप्पू ब्लैक मेलिंग करता था। अधिकारियों को यह सारी बातें पता लग चुकी हैं। जमीन पर पहली बार हुए विवाद में ही 1964 में मंशा देवी के पक्ष में फैसला आया था।

दरअसल, 1947 में यह जमीन हसन असकारी से मंशा देवी ने खरीदी। इसके बाद ही खलील अहमद ने मस्जिद का मुकदमा किया था, मगर 1964 में न्यायालय ने मंशा देवी के पक्ष में फैसला दे दिया था। इसके बाद कोई विवाद सामने नहीं आया और 2001 में गुरु सिंह सभा ने जमीन खरीदी। 10 साल तक काबिज रहने के बाद विकास प्राधिकरण में नक्शा आवेदन के बाद विवाद हुआ। इसमें पप्पू के भतीजे ने शिकायत की। इस बीच कई बार ब्लैकमेलिंग कर पैसा वसूला गया। साभार: अमर उजाला


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