हमारी सभ्यता तीन विकल्प देती है पशु का विकल्प, पागल का विकल्प, पाखंड का विकल्प

◆◆◆◆ साधना की दो दिशायें: नीति और धर्म ◆◆◆◆◆

मैं नीति और धर्म की दिशाओं को भिन्न मानता हूँ; भिन्न ही नहीं, विपरीत मानता हूँ – क्यों मानता हूँ उसे समझाना चाहता हूँ।

नीति — साधना का अर्थ है आचरण — शुद्धि, व्यवहार — शुद्धि। वह व्यक्तित्व की परिधि — को बदलने का प्रयास है। व्यक्तित्व की परिधि मेरा दूसरों से जो संबंध है, उससे निर्मित होती है, वह दूसरों से जो मेरा व्यवहार है।

मैं अकेला नहीं हूं। मैं समाज में हूं और इसलिए प्रतिक्षण किसी न किसी से संबंधित हूं। यह अतर्संबंध ही जीवन मालूम होता है। सदाचरण की हमें शिक्षा दी जाती है। वह समाज के लिए आवश्यक है। वह एक सामाजिक आवश्यकता है।

समाज को आपसे, आपकी निपट निजता में कोई प्रयोजन नहीं है। समाज के लिए आप उसी क्षण महत्वपूर्ण हैं, जब आप किसी से संबंधित होते हैं। समाज के लिए मनुष्य आचरण से ज्यादा नहीं है।

मनुष्य के आचरण की जड़ें अंतस में हैं। आचरण अंतस का अनुगामी है, उसका अग्रगामी नहीं। इसलिए आचरण को बदलने का प्रयत्न दमन, सप्रेशन के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? और दमन क्या कोई परिवर्तन ला सकता है ?

मैंने कहा कि इस तथाकथित नैतिक जीवन में जो अंतस से सहज उठता है उसे हम उठने नहीं देते हैं और जो नहीं उठता उसे प्रकट करते हैं। इसमें पहली प्रक्रिया से दमन आता है और दूसरी प्रक्रिया से पाखंड आता है। पहली प्रक्रिया का अंतिम परिणाम पागल है और दूसरी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम पाखंडी है।

एक तीसरा विकल्प भी है। वह है पशु जैसे होने का। अपराधी का जन्म उस विकल्प से होता है। उससे हम बचना चाहते हैं। पशु होने से हम बचना चाहते हैं तो हमारी सभ्यता उपरोक्त दो विकल्प देती है।

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हमारी सभ्यता तीन विकल्प देती है पशु का विकल्प, पागल का विकल्प, पाखंड का विकल्प। क्या कोई चौथा विकल्प भी है ?

मैं उस चौथे विकल्प को ही धर्म कहता हूं। वह पशु का, पागल का, पाखंड का नहीं, प्रज्ञा का मार्ग है। वह भोग का, दमन का, मिथ्याभिनय का नहीं, वास्तविक जीवन और ज्ञान का मार्ग है।

उसके परिणाम में सदाचरण के फूल लगते हैं। उसके परिणाम में व्यक्ति का पशु विसर्जित होता है। अचेतन वासनाओं का दमन नहीं, उनसे मुक्ति होती है। और सदाचरण का अभिनय नहीं, वास्तविक जीवन पैदा होता है। वह किसी आवरण को, आचरण को ओढ़ना नहीं है — वह अंतस की क्रांति है। वह समाज का नहीं, स्वयं का समाधान है।

नीति सामाजिक है; धर्म नितांत वैयक्तिक है।

नीति आचरण है, धर्म अंतस है।

नीति परिधि है; धर्म केंद्र है।

नीति व्यक्तित्व, पर्सनैलिटी है, धर्म आत्मा है।

नीति के आने से तो धर्म नहीं आता है, पर धर्म के आने से नीति अवश्य आ जाती है।

नीति दमन से, आरोपण से प्रारंभ होती है। धर्म ज्ञान से प्रारंभ होता है।

~ ओशो ~

(साधना पथ, प्रवचन #5)

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