अब भीड़ होगी, भक्त होंगे, भजन होंगे, संकीर्तन होंगे…. लेकिन…

बीस वर्ष पुरानी एक घटना याद आ गयी | मैं तब कई तरह के साधना व प्रयोगों में रत था जिनमें रेकी, हिप्नोसिस, व अन्य ध्यान आदि | मैं सभी तरह के ध्यान शिविरों में जाना पसंद करता था चाहे ओशो हो या आर्ट ऑफ़ लिविंग या ब्रम्हकुमारी…आदि |

मैंने आर्ट ऑफ़ लिविंग का तीन दिवसीय शिविर अटैंड किया | मुझे बहुत ही अच्छा लगा विशेषकर सुदर्शन क्रिया | फिर उसके बाद भी कई किये और शिविर के संयोजक भी मुझसे बहुत घुल मिल गए और वे चाहते थे कि मैं रविशंकर जी से एक बार मिल लूं और शिविर का सञ्चालन करने की ट्रेनिंग लेकर ग्रुप में शामिल हो जाऊं | मैंने भी काफी हद तक मन बना लिया था क्योंकि मैं आध्यात्मिक क्षेत्र में आना चाहता था |

लेकिन एक शिविर में ऐसा हुआ कि पूरे दिन भर ध्यान और सुदर्शन क्रिया में वह आनंद नहीं आया जो कि हमेशा आता था | शाम को एक नया कार्यक्रम जोड़ा गया संकीर्तन का और उसमें रविशंकर जी की तस्वीर के सामने सभी बैठ कर संकीर्तन करने लगे | जबकि पहले ऐसा नहीं होता था | मुझे बैचैनी शुरू हो गयी और मुझे लगा मैं गलत जगह आ गया |

मैंने संचालक से बात की कि यह सब क्या हो रहा है | तो उन्होंने मुझे संकीर्तन के फायदे गिनवाने शुरू कर दिए | मैंने कहा कि रविशंकर जी का मैं सम्मान करता हूँ लेकिन गुरु के रूप में ईश्वर के रूप में नहीं और यहाँ तो उन्हें ईश्वर बनाकर पूजा अर्चना होने लगी ?

मैं उसी समय वहाँ से उठा और चला आया और फिर कभी नहीं गया आर्ट ऑफ़ लिविंग | जाने आज कैसा होता होगा आर्ट ऑफ लिविंग का शिविर | तब तो त्रिदिवसीय शिविर के लिए पाँच सौ रूपये लिए जाते थे आज कल सुना है कि शायद हज़ार रूपये लिए जाते हैं |

READ  सहआस्तित्व में सहयोगी होना ही सृष्टि का मूल धर्म है |

लेकिन मैं मानता हूँ कि अब वह आध्यात्मिक उर्जा और वातावरण नहीं होगा वहाँ जो मैंने देखा था कभी | अब भीड़ होगी, भक्त होंगे, भजन होंगे, संकीर्तन होंगे…. लेकिन वह विशिष्ट वातावरण नहीं होगा जो मैंने अनुभव किया था कभी | -विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of