सन्यासी या साधू वही है जो ईश्वर को समर्पित है

नागा बाबा का छायाचित्र हिमांशु द्वारा खींचा गया 

गुरु जी प्रणाम।
कल एक चाय की दुकान पर एक नागा बाबा  मिले।
उन्होंने एक चाय का कहा ।
मेने पिलवा दी।
उसके बाद उन्होंने जो भी कहना था कह दिया और मुजसे कहा वचन दे। जो में कहुगा वो करेगा।
मेने कहा ठीक ह।
उन्होंने कहा क मुजहे 250ग्राम घी
1 भगवा
लाके दे।।।
मेने कहा ठीक हे।
लाता हु।
तो उन्होंने कहा में इतनी देर रुक नहीं सकता मुजहे पेसे दे दे 300।
में खरीद लुगा।
अब इस कहानी में उन्होंने मुजहे सिन्दूर ‘भबुति’ और कोयला का बुरा ।
उनकी उगलियों में से निकाल क दिया।
और वो कह रहे थे के में बाल नागा बाबा हु।
तो गुरु जी मुजहे नहीं पता क नागे बाबा का उद्देश्य क्या था।
अब गुरु जी आगे से अगर एसा कोई साधू या महत्म्मा मिले तो मुझे क्या करना चहिये ?
हिमांशु शर्मा 

सन्यासी या साधू वही है जो ईश्वर को समर्पित है | जो जानता है कि ईश्वर  हर प्राणी के लिए सहयोगी भाव रखता है | वह न केवल स्वयं का सम्मान करता है अपितु दूसरों का सम्मान भी करता है | वह किसी को बाध्य नहीं करता कि कोई उसके लिए कुछ करे | यदि वह ऐसा करता है तब उसने सन्यास धर्म को जाना ही नहीं, वह भटक गया है | किसी को यदि वह भय दिखा कर आर्थिक या किसी और तरह का सहयोग या सेवा लेता है, तो वह सन्यासी या साधू नहीं, बल्कि एक ठग है | और जैसा कि आपसे मिले नागा बाबा ने वस्त्र के स्थान पर रूपये लिए वह भी साधू का काम नहीं है | इसलिए ऐसे साधुओं से न तो डरने की आवश्यकता है न ही किसी प्रकार के दबाव में आने की आवश्यकता है | यदि आप स्वेच्छा से कुछ दे रहें हैं और वह ले लेता है तो ठीक है अन्यथा प्रणाम कर विदा कर दीजिये | क्योंकि यह कलियुग है और अब ईश्वर के पास इतना समयं नहीं है कि भेस बदल कर परीक्षा लेने लोगों के घर पहुँचे | अब ईश्वर केवल बोर्डएग्जाम ही लेते हैं और यह देखते हैं कि आपकी सहायता से किसी को आत्मनिर्भर होने में सहयोग मिला या नहीं |

मैं ऐसे सन्यासियों को सन्यासी तो क्या सामान्य सांसारिक भी नहीं मानता | मैं इन्हें ठग ही मानूँगा और ऐसे लोग सन्यासी और साधुओं के नाम पर कलंक हैं फिर चाहे कोई अखाड़े से जुड़ा कितना भी बड़ा संत-महंत क्यों न हो | बाहुबल, तंत्र-मन्त्र व श्राप के बल पर निर्बलों और निर्दोषों को डराने वाले साधू संत भी ठग ही हैं |

यहाँ मैं अपने आश्रम में घटी घटना का उल्लेख करना चाहूँगा |

कल जुना अखाड़े के कुछ साधू आश्रम में पधारे | आश्रम में दोनों ही महाराज नहीं हैं इसलिए सेवक उन्हें मेरे पास ले आये कि इन्हें रूम चाहिए | उनमे से एक ने कहा कि हमारे महाराज के नीचे दस हज़ार नागा साधू हैं, ये उनके प्रमुख हैं…. अब मुझे क्या फर्क पड़ता है कि कौन प्रमुख है और क्यों है | यदि सन्यासी हो तो सन्यासी की तरह मिलो ? यहाँ भी घमंड इस बात का कि दस हज़ार नागा साधुओं के प्रमुख हैं ? अर्थात सन्यास का उद्देश्य ही समाप्त हो गया ! खैर यह सब उनकी निजी समस्या थी मुझे इससे कोई लेना देना नहीं है |

चूँकि सावन का महीना चल रहा है और बाबाधाम में आने वाले भक्तों की बहुत भीड़ हो जाती है अतः रूम मिलना मुश्किल हो जाता है | फिर भी एक रूम बचा हुआ था लेकिन उसमें पंखा ख़राब हो गया था | खैर उसी में उन्हें ठहराया गया |

यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन खाने को लेकर समस्या हुई क्योंकि यहाँ खाना बिना प्याज और लहसुन के बनता है इसलिए वे खाना स्
वयं बनाने की कह रहे थे | उनके लिए सारी व्यवस्था की गयी और उनके कमरे में ही गैसे स्टोव आदि उपलब्ध करवा दिया गया |

आज सुबह जब वे गए तो सेवक ने आकर बताया कि कमरे में इतनी गन्दगी करके गए हैं कि सफाई करने में एक घंटा लग गया | प्याज के छिलके और इधर उधर बिखरे आटा और चावल….कमरे को नरक बना गये | और सुबह सुबह ही आकर मुझसे कहा कि हम इतनी दूर से आये हैं इसलिए हमें कुछ पैसे दीजिये | मैंने कहा कि देखिये अभी बड़े महाराज हैं नहीं और मैं ऐसे किसी को पैसे वगैरह नहीं देता | आप आये आपके ठहरने की व्यवस्था की वही मेरा धर्म था | फिर आप भी सन्यासी हैं और मैं भी | यहाँ पैसों की बात कहाँ से आ गयी ? और पैसा ही देना है तो आपको देना चाहिए था हमें कि आपको आश्रम में ठहरने की व्यवस्था की तो कम से कम रख-रखाव के खर्च के रूप में ही सहयोग राशि दे देते | आपने तो कुछ दिया नहीं, उलटे मुझ से ही मांग रहें हैं ?

जाते जाते वे कह गये कि आज के बाद हम इस आश्रम में नहीं आयेंगे…. इस बात से भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं जानता हूँ कि संयासी कैसे होते हैं और उनका व्यवहार कैसा होता है | ये लोग मेरी नजर में सन्यासी थे ही नहीं | ये एक सम्प्रदाय से जुड़े हुए सदस्य मात्र हैं और वे उस सम्प्रदाय विशेष के नियमों के अधीन कार्य करते हैं इसलिए मैं उनका सम्मान करता हूँ न कि इसलिए कि वे साधू हैं या सन्यासी हैं |

अब महत्वपूर्ण बात यह कि यह समान्य नैतिक शिक्षा है कि जिसके भी घर में जाएँ उनके घर व उनके नियमों का आदर करें | जब उन्हें पता था कि हमारे आश्रम में प्याज और लहसुन का प्रयोग वर्जित है, तब उन्होंने आश्रम में ही उसका प्रयोग क्यों किया ? क्या यह संन्यास धर्म के विरुद्ध कार्य नहीं हुआ ? वे चाहते तो बाहर ढाबा है वहीं खा लेते ? दूसरी बात जब हम किसी के घर जाते हैं तब हमारा पहला कर्तव्य है कि साफ़ सफाई रखना, वह भी ये साधू नहीं कर पाए | तो क्या सीखा सन्यास लेकर ? न तो स्वयं को जाना और न ही दूसरों को ?

यह सन्यास नहीं हुआ | ऐसा संन्यास कहीं नहीं पहुंचायेगा | ऐसा सन्यास केवल अध्यात्मिक पतन की ओर ही लेकर जाएगा | ~विशुद्ध चैतन्य 

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