यह मंदिर की मूर्ति है, ये हम पुजारी हैं, यह हमारी पूजा है, यह व्यवसाय है।

एक बड़ा मंदिर, उस बड़े मंदिर में सौ पुजारी, बड़े पुजारी ने एक रात स्वप्न देखा है कि प्रभु ने खबर की है स्वप्न में कि कल मैं आ रहा हूं। विश्वास तो न हुआ पुजारी को, क्योंकि पुजारियों से ज्यादा अविश्वासी आदमी खोजना सदा ही कठिन है। विश्वास इसलिए भी न हुआ कि जो दुकान करते हैं धर्म की, उन्हें धर्म पर कभी विश्वास नहीं होता।

तो अपने निकट के पुजारियों को उसने कहा कि सुनो, बड़ी मजाक मालूम पड़ती है, लेकिन बता दूं। रात सपना देखा कि भगवान कहते हैं कि कल आता हूं। दूसरे पुजारी भी हंसे; उन्होंने कहा, पागल हो गए !

तो मंदिर धोया गया, पोंछा गया, साफ किया गया, फूल लगाए गए, दीये जलाए गए; सुगंध छिडकी गई, धूप—दीप सब; भोग बना, भोजन बने। दिन भर में पुजारी थक गए; कई बार देखा सड़क की तरफ, तो कोई आता हुआ दिखाई न पड़ा। और हर बार जब देखा तब लौटकर कहा, सपना सपना है, कौन आता है !

सांझ हो गई। फिर उन्होंने कहा, अब भोग हम अपने को लगा लें। जैसे सदा भगवान के लिए लगा भोग हमको मिला, यह भी हम ही को लेना पड़ेगा। दूसरे पागल बनते हैं न जानते हुए, हम…….हम जो जानते हैं भलीभांति कभी कोई भगवान नहीं आता। भगवान है कहाँ ? बस यह मंदिर की मूर्ति है, ये हम पुजारी हैं, यह हमारी पूजा है, यह व्यवसाय है।

आधी रात गए कोई रथ मंदिर के द्वार पर रुका। रथ के पहियों की आवाज सुनाई पड़ी, रथ द्वार पर रुका, कोई मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ा, फिर किसी ने द्वार खटखटाया। फिर किसी पुजारी की नींद खुली, उसने चिल्ला कर बाकियों को जगाया, फिर उसने कहा कि मालूम होता है वह आ गया मेहमान जिसकी हमने प्रतीक्षा की ! कोई द्वार खटखटाता है!

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लेकिन दूसरों ने कहा कि कैसे पागल हो, रात भर सोने दोगे या नहीं ? हवा के थपेडे हैं, कोई द्वार नहीं थपथपाता है। उन्होंने व्याख्या कर ली, फिर वे सो गए।

फिर सुबह वे उठे, फिर वे द्वार पर गए। किसी के पद – चिह्न थे, कोई सीढ़ियां चढ़ा था, और ऐसे पद – चिह्न थे जो बिलकुल अशात थे। और किसी ने द्वार जरूर खटखटाया था। और राह तक कोई रथ भी आया था। रथ के चाको के चिह्न थे।

वे छाती पीटकर रोने लगे। वे द्वार पर गिरने लगे। गांव की भीड़ इकट्ठी हो गई। वह उनसे पूछने लगी, क्या हो गया है तुम्हें ? वे पुजारी कहने लगे, मत पूछो। हमने व्याख्या कर ली और हम मर गए। और सच यही है कि हम कुछ भी न समझते हैं, हम केवल सोना चाहते हैँ, और इसलिए हम व्याख्या कर लेते हैं।

तो वह तो सभी के द्वार खटखटाता है। उसकी कृपा तो सब द्वारों पर आती है। लेकिन हमारे द्वार हैं बंद। और कभी हमारे द्वार पर दस्तक भी दे तो हम कोई व्याख्या कर लेते हैं।

पुराने दिनों के लोग कहते थे, अतिथि देवता है। थोड़ा गलत कहते थे।

देवता अतिथि है। देवता रोज ही अतिथि की तरह खड़ा है। लेकिन द्वार तो खुला हो ! उसकी कृपा सब पर है।

~ ओशो ~

(जिन खोजा तिन पाइयां, प्रवचन #4)

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