सांझ आयी, रुक रहे, सुबह हुई, चल पड़े। मुसाफिरखाना है।

बुद्ध ने जिस दिन घर छोड़ा, अपने सारथि से कहा था–क्योंकि सारथि दुःखी था। बूढ़ा आदमी था। बुद्ध को बचपन से बढ़ते देखा था। पिता की उम्र का था। वह रोने लगा, उसने कहा, मत छोड़ो। कहां जाते हो? जंगल में अकेले हो जाओगे। कौन संगी, कौन साथी?

तो बुद्ध ने कहा, महल में भी कौन संगी था, कौन साथी था? धोखा था। महल में भी जंगल था। आज नहीं कल जंगल जाना ही होगा। और किन्हीं और कंधों पर चढ़कर जाऊं, इससे बेहतर है अपने ही पैरों से चला जाऊं। मरकर जाऊं, इससे बेहतर है जिंदा चला जाऊं तो शायद कुछ कर पाऊं।

सारथि ने बहुत समझाया : इतनी संपदा, इतना साम्राज्य छोड़कर कहां जाते हो? बुद्ध ने कहा, मौत आएगी। तू भी जानता है मौत आएगी। सभी जानते हैं मौत आएगी। और यह सब छिन ही जाएगा। जो छिन ही जाना है, उसे नासमझ पकड़ते हैं। जो छिन ही जाता, छिन ही गया। उसको पकड़ने का कोई सवाल नहीं है।

इस जिंदगी से समझदार लोग तो ऐसे गुजरते हैं जैसे कोई सराय से गुजरता है; इस जिंदगी में ऐसे ठहरते हैं जैसे कोई धर्मशाला में ठहरता है। सांझ आयी, रुक रहे, सुबह हुई, चल पड़े। मुसाफिरखाना है।

और जिसको यह जिंदगी मुसाफिरखाना दिखाई पड़ती है उसकी ही आंखें मोक्ष की तरफ उठती हैं। क्योंकि अगर यह मुसाफिरखाना है तो फिर घर कहां है? तभी सवाल उठता है। अगर इस दुनिया की संपदा झूठी है तो फिर सच्ची संपदा कहां है? क्योंकि हृदय में तलाश तो है। संपदा की तलाश है। किसके मन में नहीं है तलाश?

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अगर इस जिंदगी की संपदा झूठी है तो फिर यह तलाश क्यों है? और फिर यह एकाध दिल में ही नहीं है, यह हर दिल में है। यह हर प्राण में छिपी है। यह हर प्राण के भीतर दबी है। यह अंगारा सबके भीतर है। तो कहीं न कहीं होगी असली संपदा भी। अगर इस जगत् के पद व्यर्थ हैं तो फिर असली पद कहां है?

कृष्णमूर्ति ठीक कहते हैं कि जो असार की भांति देख लेता है, उसकी सार की खोज शुरू हो जाती है। जो असार को ही सार समझता रहता है उसकी तो सार की खोज कैसे शुरू होगी? जिसने नकली सिक्कों को असली समझ लिया वह असली की तलाश करेगा क्यों? वह तो मानता है, असली उसे मिल ही गए।

~ ओशो
नाम सुमिर मन बावरे-(जगजीवन)–प्रवचन–7

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