बहुत ही कम लोग ऐसे हैं…

सोने पर पीतल का पानी चढ़ाया जा सकता है और पीतल पर सोने का पानी चढ़ाया जा सकता है | लेकिन दोनों का गुणधर्म नहीं बदला जा सकता | लेकिन दोनों को फिर वही व्यव्हार भी नहीं मिलता जो कि उन्हें मिलना चाहिए | दोनों ही भीतर से जानते हैं कि जो जीवन वे जी रहें हैं वह नहीं है जो उन्हें जीना था | और हमेशा अपनी खोई हुई पहचान पाने के लिए बेचैन रहते हैं |

इसलिए जब हम बच्चों से पूछते हैं कि वह किसके जैसा बनना चाहते हैं, तो हम उससे अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रहे होते हैं कि तुम जो हो जैसे हो, हमें स्वीकार्य नहीं हो |

और यहीं हम खो देते हैं उसे, जिसने हमारे घर में जन्म लिया था अपनी एक नई पहचान के साथ नई पहचान बनाने के लिए | फिर वह वैसा बनना चाहता है जैसा आप या दुनिया उसे देखना चाहते हैं, न कि वैसा, जैसा कि उसे होना चाहिए था |

बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो कह पाते हैं कि मैं वही हूँ जो मैं चाहता था |-विशुद्ध चैतन्य

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