… हमें एक ही पहचान मिलेगी वह है लाश !

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था, “असंगठित होना पाप है !” और उन्होंने बिलकुल सही कहा था |

लेकिन हम यदि भारत का इतिहास उठाकर देखें तो राष्ट्रीय एकता व अखंडता के विरुद्ध ही सारे नेता और राजनैतिक पार्टियाँ कार्य करतीं रहीं | चाहे वह हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर हो, चाहे वह दलित-सवर्णों के नाम पर हो, चाहे वह ब्राह्मण-शूद्र के नाम पर हों….. कोई भी राजनैतिक पार्टी ने सामाजिक भेदभाव् को दूर करने में योगदान नहीं दिया, उलटे इस भेदभाव को और हवा दी और उसपर अपनी रजनैतिक रोटियाँ सेंकीं |

बहुत से दोष होते हैं हर व्यक्ति व समाज में लेकिन हमें उन्हें तब तक ही स्वीकारना चाहिए जब तक कि वह हमारे राष्ट्र के अन्य समाज के लिए घातक न हो जाएँ | जैसे कोई क्रोधी स्वभाव का है तो वह उसका व्यक्तिगत स्वभाव है, लेकिन उसके क्रोध से निर्दोष और मासूमों को हानि हो रही है, तो उसे रोकना सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व है | लेकिन यदि हम हर क्रोधी व्यक्ति को सूली पर चढ़ाने लगें तो यह मानसिक विक्षिप्तता को जन्म देता है | उसी प्रकार माँसाहार कुछ मानवों की प्रवृति होती है और कुछ की शाकाहार…. लेकिन यदि माँसाहारी मानवों का ही माँस खाना शुरू कर दे तो वह समाज के लिए घातक हो जाएगा और उसे रोकना सभी का दायित्व हो जाता है | अब यदि शाकाहारी खुद को श्रेष्ठ कहने लगें और माँसाहारियों पर प्रतिबन्ध लगाने लगें, तो समाज में अस्थिरता व अराजकता उत्पन्न हो जायेगी |

सभी को हम नौ नंबर का जूता नहीं पहना सकते और सभी को चालीस नंबर की शर्ट नहीं पहना सकते… अब नौ नंबर जूते वाले बाकी नंबरों को पहनने वालों को देश से बाहर करने लगें या उनके साथ भेदभाव करने लगें तो अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाएगी….. तो संगठित होने का अर्थ यह नहीं कि ब्राह्मण दलितों के विरुद्ध संगठित हों और दलित ब्राहमणों के विरुद्ध | संगठित होने का अर्थ यह नहीं कि हिन्दू-मुस्लिमों के विरुद्ध संगठित हों और मुस्लिम हिन्दुओं के विरुद्ध | संगठित होने का अर्थ है बुराई के विरुद्ध हम संगठित हों | संगठित होने का अर्थ है हम सब भारतीय हैं और राष्ट्रहित के लिए संगठित हों |

READ  एक बीज में पूरा एक पौधा समाया हुआ होता है

लेकिन आज जो वातावरण बना हुआ है, वह राष्ट्रीयहित से जुड़ा नहीं दिख रहा | आज हिन्दू-मुस्लिमों के विरुद्ध संगठित हो रहे हैं और मुस्लिम हिन्दुओं के विरुद्ध, आज ब्राहमण दलितों के विरुद्ध संगठित हो रहे हैं और दलित ब्राहमणों के विरुद्ध….. और ऐसा करके हम अपने ही देश को खतरे में डाल रहे हैं | हम अपने ही देश में गृहयुद्ध का वातावरण तैयार कर रहे हैं | हम सामूहिक आत्महत्या करने के लिए बारूद का ढेर इकठ्ठा कर रहे हैं | और ये धूर्त और पूंजीवादियों के गुलाम नेता किसी दिन इसी ढेर में आग लगा कर हमें मौत की नींद सुला देंगे और तब हम न हिन्दू रहेंगे, न मुस्लिम रहेंगे, न दलित रहेंगे, न सवर्ण रहेंगे न ब्राहमण रहेंगे…. हमें एक ही पहचान मिलेगी वह है लाश, शव, मृत शरीर | ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of