क्यों हमारा देश तरक्की नहीं कर पाया ?

अभी हाल ही में मुझे अधिक अच्छी तरह से समझने मिला कि क्यों हमारा देश तरक्की नहीं कर पाया ? क्यों हम हमेशा गुलाम ही बने रहे, चाहे मुग़लों के गुलाम बने चाहे अंग्रेजों के और चाहे आज अमेरिका और इटली के हैं ?

उदाहरण के लिए केजरीवाल को ही लेते हैं | चुनाव से पहले लोग कहते थे कि उसकी जमानत जब्त हो जायेगी, लेकिन उनकी पार्टी जीत गयी । जब जीत गई तो कहा गया कि उसे कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए…केजरीवाल अपनी जिम्मेदारी से भाग रहें हैं…. जब बना ली तो कहने लगे कि क्यों समर्थन लिया… कसम खाई थी….?

और ये सब बातें वे कह रहे थे जो अपने आप को अनुभवी राजनीतिज्ञ मान रहे थे | उसपर तुर्रा यह कि उनके चमचे उनसे भी दो कदम आगे… लेकिन इस पूरी घटनाक्रम में जो बात दिखाई दी वह यह कि भारत की राजनीति में देश और जनता की भूमिका केवल इतनी ही थी कि नेता और उनके चमचों को पालना और उनके अत्याचार सहना | सबके अपने अपने खेमे बंटे हुए हैं, अपने अपने चमचे पले हुए हैं | किसी को भी अपने नेता की कमियाँ दिखाई नहीं देती और दूसरे की खूबियाँ दिखाई नहीं देती | किसी को इस बात से कोई ख़ुशी नहीं होती कि कोई एक नेता कोई अच्छा काम कर गया, वह कुछ अच्छे विचार लेकर आया है |

कुछ लोग धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं और स्वयं को राष्ट्र भक्त बताते हैं | लेकिन थोड़े ही समय में पता चल जाता है कि वो कट्टरपंथी धर्म या राष्ट्र का नहीं, अपने नेता और पार्टी का है | उसका धर्म उसका नेता और उसका राष्ट्र उसकी पार्टी बस इतनी ही दुनिया में सिमटा हुआ है उनका राष्ट्रप्रेम और धर्म प्रेम |

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मैंने कई बार चाहा कि मैं भी ऐसा ही कोई कट्टरपंथी बन जाऊं, लेकिन नहीं बन पाया क्योंकि धर्म के ठेकेदारों और नेताओं के दिए चश्में और कम्बल लेकर दूसरों पर भौकना अपनी जीवन शैली नहीं है | कई लोगों ने अच्छे अच्छे नाम से ग्रुप बना रखे हैं तो कईयों ने पेज बना रखे हैं | लेकिन वे सभी किसी न किसी नेता के ही निकले, देश और जनता के लिए तो  कोई ग्रुप नहीं दिखा और न ही कोई पेज | इसलिए ही मुझे यह पेज बनाना पड़ा | क्योंकि एक पेज राष्ट्र के लिए समर्पित भी होना चाहिए जो किसी भी नेता या पार्टी या धर्म के बंधन में जकड़ा हुआ न हो | जो हर उस कार्य की सराहना करता हो जो राष्ट्र या नागरिकों के हित में है, चाहे नेता या पार्टी कोई भी हो | और जिस दिन कोई गलत दिखता है उसी समय उसे भी उतनी ही स्पष्टता से रखे भी, बिना किसी संकोच या डर के |

तो भारत की गुलामी का कारण रहा हमारी अंधभक्ति और कट्टरपंथी | जो लोग राष्ट्र हित में बलिदान दे रहे थे, तब ये ही लोग शायद उनका साथ देने के बजाय मजाक उड़ा रहे थे इसलिए विदेशियों को आसानी हुई देशभक्तों और बहादुरों को चुन चुन कर मारने में | अब बच गए लोग उनकी बहादुरी के किस्से सुनाते हैं | लेकिन खुद उनकी राह पर चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, चाहे देश जाए भाड़ में | सरकार किसी की भी रही हो चमचों को अपने सरकार में कोई दोष नहीं दिखा और वे देश को बेच कर खा गए | आज भी यही सब चल रहा है लेकिन चमचों को फुर्सत नहीं है अपने आका से मिले चश्में और कम्बल से बाहर निकलकर देखने की | 

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