मूर्ति का उपयोग कर लो, लेकिन गुलाम मत हो जाना।

चीन में एक बड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक फकीर के संबंध में खबर उड़ी कि वह परमज्ञान को उपलब्ध हो गया है। तो एक दूसरा फकीर उससे मिलने गया। यह दूसरा फकीर जब पहुंचा तो पहला फकीर अपनी गुफा के द्वार पर एक चट्टान पर बैठा था, बड़ी भयंकर जगह थी। सिंह दहाड़ रहे थे। यह पहला फकीर जाकर पहुंचा वहा और अचानक एक सिंह दहाड़ा। उसकी छाती कैप गयी उसके हाथ—पैर कैप गये। उस गुफा में रहनेवाले फकीर ने कहा, तो अभी तुम्हारा भय गया नहीं? आगंतुक फकीर ने कहा—मुझे बड़ी प्यास लगी है; लंबी यात्रा से पहाड़ चढ़कर आ रहा हूं र पानी मिल सकेगा? तो उस गुफा में रहनेवाला फकीर गुफा के भीतर पानी लेने गया। जब तक पानी लेने गया, इस आगंतुक फकीर ने जिस जगह यह फकीर बैठा था—पहला फकीर बैठा था—उस जगह ‘नमो बुद्धाय’—बौद्धों का मंत्र—लिख दिया। बुद्ध को नमस्कार! पत्थर उठकर पत्थर पर लकीर खींच दी, लिख दिया— ‘नमो बुद्धाय’। गुफा में रहनेवाला फकीर आया और जब वह बैठने को था तब उसकी नजर पड़ी। उसका पैर ‘नमो बुद्धाय’ पर पड़ गया। वह एकदम कैप गया। आगंतुक फकीर हंसने लगा और उसने कहा; भय तो तुम्हारा भी अभी नहीं गया। मेरा भय तो स्वाभाविक भय है, तुम्हारा भय बड़ा अस्वाभाविक है। और कहते हैं कि यह कहते ही, अतिथि के द्वारा यह कहे जाते ही आखिरी बात टूट गयी वह गुफा में रहनेवाला फकीर हंसा और बैठ गया ‘नमो बुद्धाय’ पर। और उसने कहा—बस आखिरी बंधन रह गया था, तुम भले आए, तुमने वह भी तोड़ दिया। अब उसका भी भय नहीं।

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स्वाभाविक। ‘नमो बुद्धाय’ जप—जप कर उसे बड़ी शांति मिली थी, बड़ा आनंद हुआ था। ‘नमो बुद्धाय ‘ उसकी भित्ति थी, उसका मंत्र था, उसके ही आधार पर सारा भवन खड़ा किया था। स्वाभाविक है कि भय लगे कि कहीं बुद्ध के ऊपर पैर न पड़ जाए। तुम्हारा भी पैर अगर गीता में लग जाता है तो जल्दी से छूकर नमस्कार कर लेते हो न गीता को! मंदिर की मूर्ति से अगर धक्का लग जाए तो एकदम गिर पड़ते हो साष्टाग कि क्षमा करना! एकदम घबड़ाहट हो जाती है। तो साधन मालिक हो गया। मालिक गुलाम हो गया और गुलाम मालिक हो गया।

मूर्ति का उपयोग कर लो, लेकिन गुलाम मत हो जाना। मूर्ति आखिर मूर्ति है और किताब आखिर किताब है और मंत्र आखिर मंत्र है। मंत्र में जो बल है वह मंत्र में नहीं है, मंत्र में जो बल है, वह तुम ही डालते हो। वह तुम्हारा ही बल है, जो मंत्र में प्रतिफलित होता है। असल में यह आदमी ‘नमो बुद्धाय’ कह—कह कर शांत नहीं हुआ है; क्योंकि दूसरे लोग हैं जो और कुछ कह कर शांत हो गये हैं।

अंग्रेजी के महाकवि टेनिसन ने लिखा है कि मुझे तो दूसरा कोई मंत्र कभी जमा ही नहीं। मैं तो अपना ही नाम दोहराता हूं और बड़ी शांति मिलती है—टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन। उसे बचपन से यह पकड़ गया। जंगल से निकलता था, घबड़ाहट लगी, अकेला था, कुछ और सूझा नहीं क्या करूं, तो जोर—जोर से टेनिसन, टेनिसन— अपने को जगाने लगा कि मत घबड़ा टेनिसन! याद कर अपनी। क्यों ड़रता है! टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन। और उसे बड़ी शांति मिली। सूत्र हाथ लग गया। फिर जब भी उसे बेचैनी होती, यह बैठकर अपना नाम दोहरा लेता। रात नींद न आती, अपना नाम दोहरा लेता और नींद आ जाती। और बेचैनी होती तो बेचैनी शांत हो जाती। फिर तो हाथ लग गयी कला। फिर तो वह बूढ़ा भी हो गया तो भी उसे दोहराता रहा।

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खयाल रखना, राम में कुछ भी नहीं है। न कृष्ण के नाम में कुछ है, न बुद्ध के नाम में कुछ है। नाम में तो तुम डालते हो। तुम जो डालते हो वही तुम्हें मिल जाता है। इसलिए मुहम्मद का नाम लेकर भी लोग पहुंच जाते हैं, महावीर का नाम लेकर भी पहुंच जाते हैं। अब यह मजा देखो, यह टेनिसन को अपना ही नाम लेकर पहुंचना हो गया। तुम जरा किसी फौत में बैठकर कभी अपना ही नाम दोहराना, बड़ी शांति मिलेगी। तब तुम चकित होओगे कि महर्षि महेश योगी से मंत्र लेने की कोई जरूरत नहीं। कोई भी शब्द। शब्द का मूल्य नहीं है। जब एक शब्द पर तुम आरूढ़ हो जाते हो, उसे आरूढ़ता का मूल्य है—शब्द कौन है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। शब्द का तुम्हें अर्थ भी पता न हो तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ता। एक ही शब्द रह जाता है, एक ही शब्द घूमता है और सारे शब्दों को हटा देता है। एक ही शब्द पर सारे प्राण केंद्रित हो जाते हैं, एकाग्र हो जाते हैं, उस एकाग्र हो जाने से शांति का अनुभव होता है। उसी एकाग्रता में धीरे— धीरे एक अपूर्व नयी केंद्रित चेतना पैदा होने लगती है। एक समग्र चेतना का आविर्भाव होने लगता है। लेकिन खेल सब तुम्हारा है।

इसलिए ऐसा हो जाता है कि तुम्हारी मूर्ति को अगर तुम पूजते हो जरा पैर लग जाता है तो तुम दिन भर डरे रहते हो कि भूल—चूक हो गयी, अब क्या होगा, क्या नहीं होगा। उसी मूर्ति को आकर कोई तोड़ जाता है, जिसको मूर्ति में भरोसा नहीं, उसको कुछ भी नहीं होता। मूर्ति में कुछ भी नहीं है, तुम्हारे भाव में सब कुछ है। भक्ति अर्थात मौलिक रूप से भाव। तुम जितना डालते हो उतना पाते हो। यही तो भ्रांति हो गयी।

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