यदि राजनीतिक दल अपने पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी

आज ईराक और सीरिया जीवंत उदाहरण है, धार्मिक कट्टरवाद से उपजे हिंसा व सर्वनाश के | आज उनके अपनी ही धार्मिककट्टरवाद उनके अपने ही देश के लिए बारूद बन गयी, जिसपर विदेशियों ने बस चिंगारी दिखा दी और देश खुद ही जल उठा उनका | वे यह भी समझ नहीं पाए कि वे अपने ही देश को तबाह कर रहे हैं क्योंकि धर्म की पट्टी उनकी आँखों में बंधी हुई थी |

हम अपने ही देश में यह सब देख रहे हैं, धार्मिक व जातिवादी उत्पाती दिन-प्रतिदिन अधिक उग्र होते जा रहे हैं और हम यह कहकर आँखें मूँद रहे हैं कि यह सब तो चलता है कौन सी बड़ी आफत आ रही है | इराक और सीरिया में भी सभ्य लोग रहे ही होंगे जो आँखें मूंदे बैठे रहे जब ये धर्मों और जाति के नाम पर सड़कछाप लफंगे धर्मों की रक्षा करने निकले होंगे.. सोचा होगा कि भटके हुए हैं… अल्लाह इनको सही राह दिखा देगा…. और परिणाम यह हुआ कि अल्लाह ने उनको राह दिखा दिया जो घरों में दुबके पड़े हुए थे, जो मस्जिदों में नमाज पढ़ने गये हुए थे, जो स्कूलों में पढ़ने गये हुए थे… लेकिन इन लफंगों की संख्या बढ़ती ही चली गई |

आज दुश्मनों ने सीधी लड़ाई करनी बंद कर दी है और हमारे अपने ही धार्मिक कट्टरवादी, जातिवादी बारूद से हमें ही ध्वस्त करने का आसान तरीका अपना लिया है | हमारे अपने ही लोग उनका साथ दे रहे हैं, नफरत फैलाकर, धार्मिक उन्माद भड़काकर केवल निजीलाभ व व्यक्तिगत मतभेद के चलते | कहते हैं इतिहास से सबक लेना चाहिए, लेकिन हम तो इतने अधिक पढ़े-लिखे हो चुके हैं कि वर्तमान से भी सबक लेने को तैयार नहीं हैं |

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डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने नवम्बर १९४९ के अपने भाषण में कहा था, “जातियों तथा सम्प्रदायों के रूप में हमारे पुराने शत्रुओं के अलावा, विभिन्न तथा परस्पर विरोधी विचारधारा रखनेवाले राजनीतिक दल बन जायेंगे | क्या भारत वासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश से ऊपर रखेंगे ? मैं नहीं जानता | लेकिन यह बात निश्चित है कि यदि राजनीतिक दल अपने पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी और संभवतः हमेशा के लिए ख़त्म हो जाये | हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए | हमें अपनी आजादी की, खून की आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए |”

आश्चर्य होता है मुझे कि संविधान के निर्माता कितने दूरदर्शी थे, जबकि आज के जातिवादी राजनेता नेता और धर्मो के ठेकेदारों के साथ-साथ पढ़े-लिखे अंग्रेजी बोलने वाले विद्वान कितने बड़े कूपमंडूक हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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Farooq Ahmed
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विचरोत्तेजक लेख।