क्या भारतवासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश से ऊपर रखेंगे ? -डॉ० भीम राव अम्बेडकर

संविधान व धर्म-ग्रन्थ दोनों ही आज दयनीय स्थिति में है और दोनों ही अपने उद्देश्यों में विफल होते जान पड़ रहे हैं | मैं इस निष्कर्ष में इसलिए पहुँचा क्योंकि संविधान और धर्मग्रंथों की स्थिति लगभग समान हो रखी है वर्तमानकाल में | जिस प्रकार संविधान राष्ट्र के लिए सर्वोच्च सम्मानित ग्रन्थ है, ठीक वैसे ही सभी सम्प्रदायों, पन्थो के अपने अपने धर्मग्रंथ हैं और वे भी उतने ही सम्मानित हैं उनके लिए | कुछ लोगों के लिए संविधान से भी अधिक महत्व है धार्मिकग्रंथो का |

लेकिन जब हम व्यवहारिकजगत में आते हैं और जब यह जानने का प्रयत्न करते है कि व्यवहार में कितने लोग लाते हैं, तो अधिकांश ऐसे मिलेंगे जिन्होंने कभी न तो संविधान को पढ़ा और न ही कभी धर्मग्रंथो को | लगभग सभी वकीलों, जजों, पंडितों, मौलवियों, पादरियों पर ही निर्भर हैं | फिर यह आवश्यक नहीं कि जज या वकील, धर्मग्रंथों के आदेशों या दिशा निर्देशों का अनुसरण करते हों | तो यह भी आवश्यक नहीं कि ये लोग संविधान का सदुपयोग ही करते हों और न्यायोचित कार्यो में ही संलग्न हों | आये दिन हम देखते हैं कि संविधान जो कि राष्ट्र की जनता को हित में रखकर तैयार किया था, उससे लाभ केवल पूंजीपतियों, नेताओं, राजनैतिक पार्टियों को ही होता है, आम जन शोषित और पीड़ित दर-दर भटकता रहता है | कई बार तो न्याय की आस में जीवन बीत जाती है किसी की और वह देख नहीं पाता कि न्याय मिला या नहीं मिला | संविधान को ही आधार बनाकर जातिगत राजनीती इतनी बलवती हो चुकी है कि अब यह खुद ही एक नासूर बन गया है राष्ट्र के लिए | अब दलितों के हिमायती भी सपने देखने लगे हैं कि एक दिन पूरे देश में उनका कब्ज़ा होगा और फिर सबसे चुन-चुनकर बदला लिया जाएगा | तो संविधान वास्तव में गलत लोगों के हाथों में चला गया या गलत लोगों को हमने संविधान सौंप दिया |

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ठीक इसी प्रकार धार्मिकग्रंथों की स्थिति है | दया, धर्म, परोपकार, सेवा, सहयोग… जैसी बातें अब केवल किताबी रह गयीं और हिंसा, दंगा, तोड़-फोड़, आगजनी… आज धार्मिक कर्मों में गिना जाने लगा | अब धर्म के नाम पर आप आगजनी करो, तोड़-फोड़ करो, हत्याएं करो, बलात्कार करो… सब जायज है और ईश्वर ख़ामोशी से सब देख रहा है | वह बेचारा उतना है असहाय है आज जितना कि संविधान के निर्माता हैं | शायद दोनों ही आसमान से अपनी लाचारी और बेबसी पर आँसू बहा रहे होंगे |

२५-२६ नवम्बर, १९४९ को भाषण करते हुए संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने कहा था;

“मैं महसूस करता हूँ कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकलें तो निश्चित रूप से संविधान भी ख़राब ही सिद्ध होगा | दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, अच्छी हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा | संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरुप पर निर्भर नहीं करता | संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता है | राज्य के उन अंगों का संचालन लोगों पर, उनके द्वारा अपनी आकांक्षाओं तथा अपनी राजनीती की पूर्ति के लिए बनाये जानेवाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है | कौन कह सकता है कि भारत के लोगों तथा उनके राजनीतिक दलों का व्यवहार कैसा होगा ? जातियों तथा सम्प्रदायों के रूप में हमारे पुराने शत्रुओं के अलावा, विभिन्न तथा परस्पर विरोधी विचारधारा रखनेवाले राजनीतिक दल बन जायेंगे | क्या भारत वासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश से ऊपर रखेंगे ? मैं नहीं जानता | लेकिन यह बात निश्चित है कि यदि राजनीतिक दल अपने पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जायेगी और संभवतः हमेशा के लिए ख़त्म हो जाये | हम सभी को इस संभाव्य घटना का दृढ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए | हमें अपनी आजादी की, खून की आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए |”

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यह तो था अम्बेडकर साहब की वह आशंका जो आज फलित होती दिख रही है | आज कुछ वैसा ही हो रहा है जैसे माँ-बाप ने दिन रात एक करके संपत्ति बनाई, बच्चों को पालापोसा और जब माँ-बाप मर गये तो बच्चों में सम्पत्ति के बंटवारे के लिए, या मालिकाना हक पाने के लिए मार-काट छिड़ गयी | लोग शायद महाभारत का युद्ध भूल गये |

डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने अपने समापन भाषण में कहा;

“यदि लोग, जो चुनकर आयेंगे, योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो वे दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे | यदि उनमें इन गुणों का अभाव हुआ तो संविधान देश की कोई मदद नहीं कर सकता | आखिरकार, एक मशीन की तरह संविधान भी निर्जीव है | इसमें प्राणों का संचार उन व्यक्तियों के द्वारा होता है, जो इसपर नियंत्रण करते हैं तथा इसे चलाते हैं | और भारत को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो ईमानदार हों तथा जो देश के हित को सर्वोपरि रखें | हमारे जीवन में विभिन्न तत्वों के कारण विघटनकारी प्रवृति उत्पन्न हो रही है | हम में साम्प्रदायिक अंतर है, जातिगत अंतर है, भाषागत अंतर है, प्रांतीय अंतर है | इसके लिए दृढ़ चरित्र वाले लोगों की, दूरदर्शी लोगों की, ऐसे लोगों की जरूरत है, जो छोटे-छोटे समूहों तथा क्षेत्रों के लिए देश के व्यापक हितों का बलिदान न दें और उन पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ सकें जो इन अंतरों के कारण उत्पन्न होते हैं | हम केवल यही आशा कर सकते हैं कि देश में ऐसे लोग प्रचुर संख्या में सामने आयेंगे |”

तो डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी ने जो शंका व्यक्त की वह भी आज सही सिद्ध हो रही है | हर कोई अपने अपने दड़बे में सिमटा हुआ बस उतनी ही दुनिया देख पा रहा है जो उस दड़बे से उसे दिखाई देती है | उससे आगे न तो कोई देखना चाहता है और न ही समझना चाहता है |

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इस प्रकार हम देखें तो धार्मिक ग्रंथों और संविधान की आज जो दुर्दशा हो रखी है उसके जिम्मेदार हम ही हैं | हम ही हैं दोषी जो व्यक्तिगत स्वार्थो के लिए नफरत के ज़हर बोने में लगे हुए हैं | हम ही हैं जो देश को फिर से टुकड़ों में बिखेरने के लिए तत्पर हुए पड़े हैं | क्योंकि हमारी जाति, हमारा पंथ, सम्प्रदाय, देश से ऊपर है | देश टुकड़ों में बंटता है तो बंट जाए, हमारी बला से | हमें तो अपनी जाति, अपनी सम्प्रदाय से प्रेम है | देश रहे न रहे, हमारी जाति, हमारा पंथ बना रहना चाहिए | शायद यही शिक्षा मिलती है धर्मों के ठेकेदारों और नेताओं के धार्मिक/पब्लिक स्कूलों में | शायद यही शिक्षा मिलती है धार्मिक ग्रंथो को पढ़ाने व समझाने वाले विद्वानों से | ~विशुद्ध चैतन्य

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