हम रिश्तों को भौतिक तल से ऊपर ले जाने का कभी प्रयास ही नहीं करते

कई ऐसे लोग होंगे जिन्होंने रिश्ते टूटते हुए ही देखे होंगे, कई लोग ऐसे होने जिन्होंने रिश्ते बचाने की कई कोशिशें की फिर भी रिश्ते टूट गए…. लेकिन कभी हमने यह जानने की कोशिश नहीं की कि रिश्ते टूटते क्यों हैं ?

मैंने अपने अनुभव से जाना कि हर रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होता है | केवल माँ-बच्चों के रिश्तों को छोड़ दें तो लगभग सभी रिश्ते स्वार्थ पर ही आधारित होता है | हम रिश्तों को भौतिक तल से ऊपर ले जाने का कभी प्रयास ही नहीं करते | जो रिश्ते जन्म जात मिले उन्हें हमने महत्व देना छोड़ दिया क्योंकि हमने ईश्वर को मानना छोड़ दिया | हमने समझने की कोशिश ही नहीं की कि कुछ रिश्ते जो हमें मिले हुए हैं, जीवन में उनका कितना योगदान है या होने वाला होगा  |

शादी हो गई तो लगा कि चलो हो गया काम हमारा, बस फेरे ले लिए बच्चे पैदा कर दिए हो गया धर्म पूरा | नहीं ! शादी करना बच्चे पैदा करना ही मुख्य उद्देश्य नहीं होता मानव जीवन का | उद्देश्य होता है दोनों शक्तियाँ (स्त्री और पुरुष) आपसी सहयोग से मूलाधार में सुशुप्त कुण्डलिनी को जागृत करके ब्रम्ह तत्व को समझ पायें और उन्नत आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचे | लेकिन हम चूल्हा चौकी, दाल रोटी को ही जीवन मान लेते हैं | -विशुद्ध चैतन्य

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