भीड़ बस भीड़ है. बिना दिमाग की

कल यह पोस्ट बहुत ही शेयर हो रही थी और इसे कुछ लोग मुस्लिमों के प्रति घृणा व द्वेष भड़काने के लिए भी प्रयोग कर रहे थे | जो लोग ऐसा कर रहे थे, वे धर्म से अनजान थे और भीड़ और नागरिकों में अंतर कर् पाने में असमर्थ थे | यही सब हम हड़ताल, बंद आदि में भी देखते हैं क्योंकि यह सब करने वाले कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं होते और न ही सभ्यमानव होते हैं | ये वही लोग होते हैं जो राह चलते लोगों को लूट लेते हैं, अकेली लड़की को देखकर छेड़-छाड़ करते हैं, निहत्ते और निर्दोषों पर हथियारों का प्रयोग करते हैं….. तो ये लोग भीड़ में निकलते हैं क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता और न ही कोई ईमान धर्म | भीड़ शब्द शायद भेड़ों के झुण्ड के लिए प्रयोग होता रहा हॉट पहले कभी, लेकिन जब मानवों को भी भेड़ों के झुण्ड के रूप में व्यवहार करते देखा तो मानवों के झुण्ड को भी भीड़ ही कहने की प्रथा प्रचलित हो गयी होगी |

तो ये ढाई लाख मुसलमान नहीं थे, बल्कि ढाई लाख भेड़ों की एक बड़ी भीड़ थी जिनके पास अपना विवेक ही नहीं था | बस किसी ने हाँक दिया और निकल पड़े सड़कों में और इन्हीं में शामिल थे कुछ भेड़िये भी भेड़ों की खाल पहने, जिन्होंने हिंसा, लूटपाट और आगजनी की | मैं दावे से कह सकता हूँ कि एक भी मुस्लिम इस भीड़ में नहीं था क्योंकि सच्चा मुसलमान कभी ऐसी भीड़ में शामिल हो ही नहीं सकता | जिसने भी क़ुरान को पढ़ा हो समझा हो, वह इस भीड़ का हिस्सा हो ही नहीं सकता था | ऐसी भीड़ यदि यदि हिन्दुओं के रूप में आती तो भी मैं यही कहता कि ये हिन्दू नहीं थे… बस भेड़ों की भीड़ से अधिक कुछ नहीं थे |

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क्योंकि पैगम्बर यानि पैगाम देने वाला जिसके प्रति हर मुसलमान श्रृद्धा का भाव रखता है, अपनी जान से भी अधिक प्यार करता है, वह एक टुच्चे नेता को पैगम्बर के समकक्ष विरोधी के रूप में खड़ा करने जैसा गुनाह कभी नहीं करता | जैसे हम हिन्दू उसे कभी भी इतना महत्व नहीं देते जो हमारे ईष्ट, या अराध्य की निंदा करता है | उदाहरण के लिए राम के समकक्ष विरोधी केवल रावण ही हो सकता है उसके अलावा और कोई नहीं | क्योंकि कोई भी विरोधी रावण के जितनी योग्यता नहीं रखता आज के युग में | दो हाथियों का आपस में टकराव हो तो बात समझ में आती है, लेकिन यदि हाथी को देख किसी कुत्ते ने भौंक दिया और हाथी के समर्थक कुत्ते के पीछे दौड़ पड़ें या हाथी ही दौड़ पड़े तो हास्यापद स्थिति हो जाती है | तो ऐसा ही कुछ हुआ इस घटना में भी क्योंकि इनमें कोई मुसलमान था ही नहीं |

फिर जरा सोचिये यदि ये लोग वास्तव में इस्लाम को समझे हुए, जाने हुए लोग होते तो क्या किसी नेता के बयान के लिए उनकी संपत्ति का नुक्सान करते जिनका उस नेता या उसके बयान से कुछ लेना देना ही नहीं था ? क्या ये सरकारी या किसी की निजी संपत्ति का नुक्सान करते या लूटपाट करते जिनका कोई लेना देना ही नहीं था उस नेता से ?

चलिए मान भी लिया कि जिनके घर लुटे, जिनकी संपत्ति नष्ट की, वे उस नेता के समर्थक रहे होंगे… तो भी क्या इस्लाम इस बात कि अनुमति देता है ?

यदि धर्म की ही बात की जाए तो भारत का महाभारत युद्ध किसी शहर या राज्य के रिहायशी इलाके में नहीं, बल्कि खाली मैदान चुनकर पूरे नियम और कानून के साथ किया गया था | शहरों में जाकर उत्पात मचाने के प्रावधान भारतीय धर्म में कभी रहा ही नहीं | आज जो भीड़ राष्ट्रीय व निजी संपत्तियों को क्षति पहुँचाते हैं, लूट-पाट, हिंसा, बलात्कार और आगजनी करते हैं विरोध के नाम पर, दंगों के नाम पर…. वे सभी आतंकवादियों की तरह ही अधर्मी हैं | ऐसी भीड़ का कोई इमानधर्म नहीं होता, बस ये हिन्दू या मुस्लिम या किसी और धर्म के अनुयाइयों के कपड़े पहनकर वैसे ही निकलते हैं, जैसे आतंकवादी सेना के ड्रेस में निकलते हैं, या आम नागरिकों की तरह साधारण कपड़े पहनकर निकलते हैं ताकि वे उनमें अलग से पहचाने न जा सकें | ~विशुद्ध चैतन्य

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किसी सज्जन ने भीड़ पर बहुत ही अच्छी पोस्ट लिखी वह मैं यहाँ रख रहा हूँ….

::”पागल भीड़”::

आपको इखलाक वाली घटना पता होगी लेकिन जो मैं बताने वाला हूँ वो शायद न पता हो.

अफगानिस्तान में २०१५ की शुरुआत में एक लड़की, फर्खंदा, की किसी मुल्ला से कहा सुनी हो गई. मुल्ला ने खबर उड़ा दी कि लड़की ने कुरआन जलाया है. भीड़ इकट्ठा हो गई. पुलिस भी मौजूद थी. भीड़ ने उस लड़की को पीटना शुरू कर दिया. पुलिस ने उस लड़की को बचाने की कोशिश की. उसे एक छत पार कराने की कोशिश की गई. लेकिन भीड़ में से लोगों ने फर्खन्दा को नीचे खींच लिया. उसे बेतहाशा पीटा गया. फिर एक बड़ी कार के पहियों के नीचे उसे कुचला गया. फिर उसे काबुल नहर के किनारे पत्थर मारे गए और अंत में जला दिया गया.लड़की खत्म.

बाद में अफगानिस्तान की सरकार ने माना कि फर्खन्दा ने कोई कुरआन नहीं जलाई थी. जिन लोगों ने उसे मारा उन्हें लम्बी सजायें दी गई. पुलिस वालों को भी कुछ सज़ा हुई.

अब आप इस सारे वाकया को इखलाक वाले वाकया से मिला कर देखिये. कोई ख़ास फर्क नज़र नहीं आएगा. इखलाक के मामले में भीड़ शायद हिन्दू हो, इस मामले में मुसलमान.

लेकिन नतीजा मेरा यही है कि भीड़ बस भीड़ है. बिना दिमाग की. यदि आप हिन्दू, मुस्लिम आदि हैं तो आप एक पागल भीड़ के हिस्से से ज़्यादा कुछ भी नहीं.

जब तक दुनिया हिन्दू, मुस्लिम, इसाई आदि बनी रहेगी, एक अंधेरी गुफा में रहेगी, रोशनी से बहुत दूर.
आपको ऐसी घटनाएँ, एक नहीं अनेक मिलेंगी. पीछे भी और आगे भी, अगर दुनिया दीन, धर्म, से बाहर नहीं आती तो.

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