तुम परमात्मा का आश्रय किसलिए खोजते हो, कभी तुमने खयाल किया? कभी विश्लेषण किया?

परमात्मा का भी आसरा तुम किन्हीं वासनाओं के लिए खोजते हो। कुछ अधूरे रह गए हैं स्वप्न; तुमसे तो किए पूरे नहीं होते, शायद परमात्मा के सहारे पूरे हो जाएँ। तुम तो हार गए, तो अब परमात्मा के कँधे पर बंदूक रखकर चलाने की योजना बनाते हो। तुम तो थक गए और गिरने लगे; अब तुम कहते हो, प्रभु अब तू सम्हाल। असहाय का सहारा है तू। दीन का दयाल है तू। पतित-पावन है तू। हम तो गिरे। अब तू सम्हाल।

लेकिन अभी सम्हलने की आकांक्षा बनी है।

इसे अगर गौर से देखोगे तो इसका अर्थ हुआ, तुम परमात्मा की भी सेवा लेने के लिए तत्पर हो अब। यह कोई प्रार्थना न हुई, यह परमात्मा के शोषण का नया आयोजन हुआ।

वासना तुम्हारी है, वासना की तृप्ति की आकांक्षा तुम्हारी है। अब तुम परमात्मा का भी सेवक की तरह उपयोग कर लेना चाहते हो। अब तुम चाहते हो, तू भी जुट जा मेरे इस रथ में। मेरे खिंचे नहीं खिंचता, अब तू भी जुट जा। अब तू भी जुते तो ही खिंचेगा। हालाँकि तुम कहते बड़े अच्छे शब्दों में हो। लफ्फाजी सुंदर है!

तुम्हारी प्रार्थनाएँ, तुम्हारी स्तुतियाँ अगर गौर से खोजी जाएँ तो तुम्हारी वासनाओं के नए-नए आडंबर हैं। मगर तुम मौजूद हो। तुम्हारी स्तुति में तुम मौजूद हो। और तुम्हारी स्तुति परमात्मा की स्तुति नहीं, परमात्मा की खुशामद है ताकि किसी वासना में तुम उसे संलग्न कर लो, ताकि उसके सहारे कुछ पूरा हो जाए जो अकेले-अकेले नहीं हो सका।

ज्ञानी वही है जिसने जागकर देखा कि पाने को यहाँ कुछ भी नहीं है। जिसे हम पाने चले हैं वह पाया हुआ है। फिर आश्रय की भी क्या खोज! फिर आदमी निराश्रय, निरालंब होने को तत्पर हो जाता है।

उस निरालंब दशा का नाम संन्यास है।

-ओशो, अष्टावक्र: महागीता

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