कोई धर्मों के ठेकेदारों को नहीं कोसता लेकिन सरकार को पूरी ईमानदारी से कोसता है

सदियाँ बीत गयीं, कितने शासक आये और चले गये, कितने नेता आये और चले गये, कितने मार्गदर्शक और समाजसुधारक आये और चले गये….. लेकिन समाज वहीं का वहीं ठहरा रहा | जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं वे कमजोर ही बने रहे और जो आर्थिक रूप से समृद्ध हैं वे भी खुद को पिछड़ा वर्ग दिखाकर ऐश करते रहे….. लेकिन मूलमूल भूत समस्या वहीँ की वहीँ रही | राजनैतिक नेता आज भी वही गरीबी हटाओ, गरीबों, मजदूरों को इन्साफ दो के नारे लगा कर सत्ता में आते रहे और लूट-खसोट कर जाते रहे | बदलता कुछ भी नहीं |

इसी प्रकार भीमराव अम्बेडकर भी दलितों को अधिकार दिलाने के लिए मसीहा बनकर आये और चले भी गये, लेकिन दलितों की स्थिति आज भी वहीं की वहीँ है | जो समृद्ध हो गये, वे आज भी दलित ही हैं, मायावती तक आज भी दलित ही है, चाहे करोड़ों की संपत्ति हो गयी उसके पास लेकिन है वह आज भी गरीब ही और उन सारी सुविधाओं लाभ भी उन्हें मिलता ही होगा जो आर्थिक रूप से कमजोरों को मिल रहा है | खैर…. मेरा मुद्दा यह नहीं नहीं था कि किसे क्या मिलता है | मेरा मुद्दा यह है कि क्यों स्थिति में सुधार नहीं हो पाता और क्यों अम्बेडकर जैसी महान आत्माओं के महत्वपूर्ण प्रयासों के बाद भी लोग हाथ फैलाए बैठे रहते हैं ?

कारन जानने का प्रयास करता हूँ तो प्रमुख कारण दिखाई देता है अपनी लाचारी के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराना | हर बार किसी नेता की आस में आँखें बिठाए बैठे रहना, एक गया तो तो अगले की प्रतीक्षा में बैठ जाना | धरना करना हो, दंगा करना हो, तोड़-फोड़ करना हो तो हज़ारों नहीं, लाखों में लोग इकट्ठे हो जायेंगे | लेकिन यदि इन्हें ही कहा जाये कि आपस में ही सहयोगी हो जाओ, एक दूसरे का हाथ बंटाओ, तो गधे के सर से सींग की तरह गायब हो जायेंगे | मुफ्त में कहीं कुछ बंट रहा हो, चाहे दारु ही बंट रही हो तो सारा ईमान-धर्म बेचकर पहुँच जायेंगे, लेकिन जब अपने पडोसी की सहायता करनी हो तो इतने व्यस्त हो जायेंगे कि साँस भी लेने की फुर्सत नहीं रहेगी इनके पास |

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इसी प्रकार धार्मिक उन्माद में इन असहाय व बेरोजगारों का उत्साह तो देखते ही बनता है | किसी का घर जलाना हो, किसी से मार-पीट करनी हो… तो सारे एकजुट हो जायेंगे, लेकिन कहो कि आओ सभी मिलकर एक एक पेड़ लगाएँ तो इनकी दिहाड़ी मारी जायेगी, दुनिया भर का काम सर पर आ जायेगा |

तो यदि ध्यान दें तो यह गरीबी और बेरोजगारी मूल मुद्दा है ही नहीं, मूल मुद्दा है नैतिकशिक्षा का आभाव | असल समस्या है आपसी सौहार्द व भाईचारे का आभाव | ऊँच-नीच, जात-पात, हिन्दू-मुस्लिम और अब ब्राह्मणवाद-अम्बेडकरवाद… में बंटा भारतीय समाज यह देख ही नहीं पा रहा कि हमारी आपसी फूट ही हमारी गरीबी का कारण है | हमारी आपसी फूट का ही फायदा उठा कर नेता हमे आपस में लड़वाते हैं और हमारी ही चिताओं पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकते हैं | हम मानसिक रूप से मानव तो रह ही नहीं गये हैं, केवल भेड़ों के झुण्ड मात्र ही रह गये हैं | बस किसी ने चारा फेंक दिया और दौड़ गये, किसी ने दारु दे दी और लोट गये उनके चरणों में… बस फिर जो भी करवाना हो करवा लो….सही गलत का कोई चिंतन ही नहीं |

अब तो बेरोजगार होना भी एक गर्व की बात हो गई है क्योंकि अपने नाकारापन के लिए सरकार को कोसने का बहाना मिल जाता है | कोई धर्मों के ठेकेदारों को नहीं कोसता लेकिन सरकार को पूरी इमानदारी से कोसता है | कभी यह नहीं सोचते कि हम यदि कोई छोटा-मोटा काम भी करें, अपने हाथों के हुनर का प्रयोग करें तो कम से कम दो वक्त की रोटी तो हम कमा ही सकते हैं…. लेकिन नहीं करेंगे क्योंकि नौकरी करना स्वरोजगार करने से अधिक सम्मानित काम है | विदेशों में दस-बारह साल के बच्चे भी अख़बार बेचकर अपनी जेबखर्च निकाल लेते है | कितने हैं जो रेस्टोरेंट में वेटर का काम करलेते हैं, वहां इसे गलत नहीं माना जाता, लेकिन हमारे यहाँ तो लोग अपनी खेत बेचकर नौकरी पाना चाहते हैं |

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तो गरीबी का कारण यह नही कि सरकार कुछ नहीं करती, बल्कि यह है कि हम ही खुद कुछ नहीं करना चाहते… बस कोई मसीहा आ जाये, आरक्षण दिलवा दे, मुफ्त में लंगर बंटवा दे, कपड़े बाँट जाए….बस इससे आधिक कुछ नहीं चाहता हमारे ये मजबूर पिछड़ावर्ग | और जहाँ थोड़ी सी एकता बनती भी है, तो ब्राहमणों को कोसने, सरकार को कोसने में खर्च कर देते हैं | और ये नेता जो इनकी हितैषी बने फिरते हैं, ये धर्म-गुरु जो धर्मपरिवर्तन करवाते फिरते हैं, वे भी इनका प्रयोग नेताओं को कोसने और राजनीती करने में ही करते हैं | कभी अपने ही ईश्वरीय किताबों पढ़कर नहीं देखते कि आपसी सहयोग व एक दूसरे की सहायता करना ही मूल शिक्षा है उनमें | कभी देखते ही नहीं अपनी ही किताबों में कि लिखा है आत्मनिर्भर बनो, ईश्वर उसी की सहायता करता है जो अपनी सहायता खुद करने में सक्षम हो | मुझे नहीं लगता कि किसी भी ईश्वरीय किताब में लिखा है कि सरकार को कोसो, सरकारी संपत्तियों को नुक्सान पहुँचाओ, यातातात जाम करो….. क्या लिखा है कहीं ? ~विशुद्ध चैतन्य

इस विडियो को ध्यान से देखें, कैसे इन्होने जिंदगी की जंग जीती और कैसे आज फिर से आत्मनिर्भर हुईं |

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