तीसरा विकल्प…?

Vishuddha Chaitanya
ओशो से एक बार किसी ने पूछा, “आप तो सन्यासी हैं, आपको इतनी लग्ज़री की क्या आवश्यकता है ? महँगी घड़ी, महँगे कपड़े, महँगी विदेशी गाड़ियाँ और ऊपर से ९५ रोल्स रोयस कर….इतनी रोल्स रोयस तो अमेरिका के राष्ट्रपति के पास भी नहीं है ?”
ओशो बोले, “मुझे इन सब चीजों की कोई आवश्यकता नहीं है, ये सब तो तुम लोगों के लिए है | आज तुम लोग जो मेरे पास आ आ रहे हो, वे इन्हीं चीजों के के कारण आ रहे हो | तुम यह जानने के लिए आ रहे हो कि ये सब मेरे पास कैसे आईं ? तुम लोग यहाँ यह भेद जानने के लिए आ रहे हो कि शायद में कोई मन्त्र बता दूं और तुम लोग भी यह सब प्राप्त कर लो….”
ओशो की यह बात मुझे बहुत ही सार्थक लगी | मुझे यहाँ आये लगभग एक साल हो गया | जब आश्रम में आया तो मुझे पता चला कि यहाँ कई उपद्रव हो रहे थे, लेकिन आज वह सब शांत हो गया है | मैं स्वयं एक समाज सेवी संगठन से जुड़ा हुआ था इसलिए मैं गांववालों को कई तरह से मदद पहुँचाना चाहता था | लेकिन जब गांववालों को पता चला आश्रम की माली हालत ठीक नहीं है तो वे भी कटना शुरू हो गए |
आज मुझे ओशो की वह बात याद आयी तो मुझे बहुत ही जोर से हँसी आयी कि दुनिया भी अजीब है ! किसी की सहायता भी करना चाहो तो जेब में पहले नोट होना चाहिए वर्ना लोगों को आप पाखंडी नजर आयेंगे | लेकिन मेरा उद्देश्य लोगों को जोड़ना है और यही इस आश्रम का मिशन था जो यहाँ के सन्यासी चूक गये और “मैं सुखी तो जग सुखी” के सिद्दांत पर चल पड़े |
मैं यह परम्परा और यह सिद्धांत तोड़ना चाहता हूँ, इसलिए मुझे ऐसे विकल्पों पर अब ध्यान देना पड़ेगा, जो मुझे आर्थिक रूप से भी समृद्ध करने योग्य हो | एक विकल्प तो यह है कि किसी राजनैतिक पार्टी का सदस्य बनूँ ताकि एक राजनैतिक पहचान बन पाए और इसी बहाने लोग मुझसे जुड़ पायें | लेकिन पुरानी राजनैतिक पार्टियों में ऐसी कोई भी नहीं जिनका सिद्धांत महर्षि दयानंद, ठाकुर दयानंद देव, स्वामी विवेकानंद या ओशो से मिलता हो |
एक पार्टी तो नज़रों से इतनी गिर चुकी है कि नाम लेना भी ठीक नहीं लगता और दूसरी पार्टी धर्म, जाति और गुंडागर्दी की परम्परागत राजनीति से नहीं निकल पायी है | एक नई पार्टी सर्वधर्म समभाव के साथ है लेकिन वह भी कॉर्पोरेट पार्टी है, जो भारतीय संस्कृति व सिद्धांत से परे है | बची खुची पार्टियों का कोई दीन ईमान नहीं है….ठीक है लोग नई नवेली पार्टी की ओर आकर्षित हो रहें हैं, लेकिन उनका अपना स्वार्थ है | किसी को पानी मुफ्त में चाहिए तो किसी को बिजली, किसी को चावल मुफ्त में चाहिए तो किसी को चीनी…. लेकिन ये मुफ्त की चीजें भविष्य में कितनी महँगी पड़ेगी इसका अंदाजा नहीं लगा रहे लोग | जब पूरे भारत में अंग्रेजी सभ्यता छा जायेगी और संस्कृत की तरह हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ भी लुप्त हो जायेंगी |
मैं नहीं चाहता कि भारत में बच्चे पैदा करने वाले कारखाने खुलें और हमारी माँ बहन लोगों के लिए बच्चे पैदा करने के नए धंधे को अपनाए | मैं नहीं चाहता कि भारत में पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा मिले और वैवाहिक मान्यताएँ लिव-इन-रिलेशनशिप के नाम पर मजाक बन कर रह जाएँ | मैं नहीं चाहता कि भारत विदेशियों के लिए बाजार मात्र बन कर रह जाए और भारतीय नागरिक दुधारू गाय |
तो वर्तमान में कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसका सदस्य बनने में मैं गौरवान्वित हो सकूं | इसलिए राजनैतिक सदस्य बनने का विचार त्याग देता हूँ |…वैसे भी हर पार्टी के पास लाखों समर्थक हैं, मेरे होने न होने से कौन सा फर्क पड़ जाएगा ? 
दूसरा विकल्प यह है कि प्रवचन करना शुरू कर दूँ क्योंकि पूरे सवा साल से आंशिक मौनव्रत और एकान्त वास में हूँ | लेकिन इसमें भी जो दुविधा है वह यह कि फिर मैं भी अन्य सन्यासियों की तरह पूजनीय हो जाऊँगा और मेरी बातें उनके सर के ऊपर से निकल जायेंगी | जैसा कि हमेशा होता आया है | आज लोग ऋषि महर्षियों के विचार पोस्ट करते रहतें हैं बिना यह समझे कि उनका अर्थ क्या है | कोई प्रवचन करनेवाला आ गया तो सभी सात्विक आत्माएं वहाँ प्रवचन सुनने पहुँच जाती हैं, लेकिन बाहर निकलते ही भूल जाती है कि क्या कहा था | यदि प्रवचन से ही देश का भला होना होता तो पिछले पाँच हज़ार सालों में हो गया होता | न जाने कितने प्रवचन करने वाले आज भी देश भर में घूम रहें हैं और न जाने कितने लाख लोग रोज कहीं न कहीं प्रवचन सुन ही रहे होते हैं |
तो यह विकल्प भी बहुत प्रभावी नहीं लगता इसलिए इस पर फिर कभी सोचा जा सकता है, क्योंकि यह काम तो बुढ़ापे में भी किया जा सकता है |
तीसरा विकल्प…?
क्या आप में से कोई विद्वान् सुझाव दे सकता है ? -विशुद्ध चैतन्य

 

READ  भीड़ केवल भीड़ होती है

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of