मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ

2013-05-27-SpiritualPathअपने साथ जुड़े सभी शुभ आत्मन से निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और न ही कोई शास्त्र मुझे कंठस्थ हैं और न ही कोई गोल्डमेडलिस्ट स्कॉलर हूँ | मैं न तो ज्ञानी हूँ और न ही ब्रम्हज्ञानी | न तो पंडित-पुरोहित हूँ और न ही कोई कर्म-कांडी |

मैं केवल एक पथिक हूँ जो पिछले कई हज़ार साल से भ्रमण कर रहा है | केवल शरीर बदलता रहता है और समयानुकूल वस्त्र भी बदलते रहते हैं | तो आप सभी से सादर निवेदन है कि मुझे गुरूजी कहकर संबोधित न करें |

मैं किसी का गुरु नहीं बनना चाहता और न ही मुझमें गुरु बनने का सामर्थ्य है | मैं मुक्त स्वाभाव का व्यक्ति हूँ और मुक्त ही रहना चाहता हूँ | ईश्वर ने जैसा मुझे बनाया है वैसा ही रहना चाहता हूँ |

मैं नहीं चाहता कि गुरु बनने के चक्कर में विशुद्ध चैतन्य कहीं खो जाए | मैं किसी के घर में राखी मूर्ति नहीं हूँ कि आप जैसा चाहेंगे और जहाँ चाहेंगे वहीँ पड़ा रहूँ | मैं कोई बेजान पत्थर भी नहीं हूँ कि जैसा आज हूँ वैसा ही कल भी रहूँ | मैं कोई वृक्ष भी नहीं हूँ कि आप चोट करेंगे और मैं उफ़ भी न करूँ |

केवल मैंने गेरुआ वस्त्र धारण किया हुआ है इसलिए आप मुझे गुरूजी कहें या कई लोग आकर पैर छूते हैं, वह भी मुझे पसंद नहीं है | यह कोई अनिवार्यता नहीं है है कि हर गेरुआधारी गुरु ही हो | यह कोई अनिवार्यता नहीं है कि अच्छी बातें करने वाला और किस्से कहानियाँ सुनाने वाला गुरु ही हो |

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इसलिए मैं किसी का गुरु नहीं हूँ लेकिन स्वयं का गुरु अवश्य हूँ | मैंने स्वयं को अपना गुरु माना है क्योंकि मैं जैसा हूँ वैसा ही हूँ | मैं स्वयं को गुरु माना है अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ | लेकिन किसी और का गुरु होने का अर्थ होगा कि मुझे उनके अनुसार जीवन जीना होगा | मैं एक कठपुतली का जीवन जीने के लिए विवश हो जाऊँगा | मेरा चलना उठाना बैठना सब उनकी पसंद के अनुरूप करना पड़ेगा, वरना गुरु की पदवी कोई भी कभी भी छीन ले सकता है |

तो मैं ईश्वरीय वरदान को त्याग कर किसी मानव का दिया हुआ वह चीज क्यों लूँ जो शर्तों पर आधारित हो ? किसी ऐसे चीज के लिए मैं चिंतित क्यों रहूँ जो कोई भी कभी भी छीन ले सकता है ? और दे कौन लोग रहें हैं, वे जो स्वयं हाथ फैलाए खड़े रहते हैं मंदिरों और दरगाहों में ? एक सन्यासी को दस-बीस रूपये का दान भी देते हैं तो इस आशा में कि पुण्य मिल जाए ? गुरु की सेवा भी करते हैं तो इसलिए कि कोई लाभ मिल जाए ? जिस दिन गुरु से लाभ न दिखे उस दिन गुरुभक्ति समाप्त और गुरु पाखंडी घोषित हो जाएगा |

नहीं चाहिए मुझे ऐसी गुरु की पदवी | इसलिए एक बार पुनः निवेदन है कि मुझे मेरे नाम से ही संबोधित करें न कि गुरूजी, महाराज, बाबाजी, स्वामीजी जैसे संबोधन से | ये सारे संबोधन मुझे बोझ और बनावटी लगते हैं | ये सारे संबोधन मुझे व्यावसायिक लगते हैं | आज इन संबोधनों में श्रद्धा, प्रेम और गरिमा का भाव नहीं होता | आज ये केवल व्यवसायिक संबोधन मात्र बनकर रह गए हैं | -विशुद्ध चैतन्य

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