मेरी स्वयं की पहचान ही क्या है ?

सोचा था कि दलितों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाऊंगा, सोचा था कि मुस्लिमों में जो गरीब व शोषित हैं उनके लिए आवाज उठाऊंगा, सोचा था कि हिन्दुओं में जो शोषित वर्ग हैं उनके लिए आवाज उठाऊंगा….. लेकिन मैं होता कौन हूँ आवाज उठाने वाला ?

मेरी स्वयं की पहचान ही क्या है ?

एक सनातनी ही तो हूँ और क्या ?

फिर सभी के अपने अपने दड़बे हैं और अब तो जयभीम नारे के साथ आंबेडकरवाद खड़ा हो गया… और वह भी सभी दड़बों की तरह एक दड़बे में रूपांतरित हो हो…..तो बेहतर है जो हो रहा है होने दो….एक बार सभी को लड़-मर लेने दो | एक बार फिर से देश का बँटवारा हो ही जाने दो…. जैसे बंटवारे के बाद पाकिस्तान और बंगलादेश के सारे नागरिक दुनिया के सबसे खुशकिस्मत और समृद्ध नागरिक बन गये, वैसे ही ये नफरत के कारोबारी और उनके समर्थक भी बन ही जायेंगे | जिस प्रकार आज बंटवारे के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान से गरीबी का नाम मिट गया, बेरोजगारी मिट गयी, हर कोई सोने की थाली में भोजन करने लगा, चांदी की सड़कें बन गयीं…. वैसे ही इस बार हुए बँटवारे से भी बने देश भी समृद्ध होंगे…. लेकिन भारत में गरीबी सनातन हैं और सनातन ही रहेगी…. फिर भारत में ग़रीब लोग धर्म परिवर्तन करेंगे फिर बंटवारे होंगे….. जरा सोचिये कि इतने सारे बँटवारे होने के बाद भारत का क्षेत्रफल कितना रह जाएगा ?

इस बार बँटवारे में ईसाई अपना अलग देश मांगेंगे, मुस्लिम अलग देश मांगेंगे, अम्बेडकरवादी अलग देश मांगेंगे, दलित और अनुसूचित जाति तो आरक्षण प्राप्त हैं तो आरक्षण के अंतर्गत जितना बंटवारा होगा उसमें अपना हिस्सा मांगेंगे….|

तो एक सनातनी के लिए सबसे कठिन होता है किसी का भी साथ देना, चाहे भले के लिए ही क्यों न हो | भाईचारा भी तभी तक जब तक उनके दड़बों के विरुद्ध कुछ न कहो, क्योंकि कोई भी अपने दड़बे से बाहर निकलने को तैयार ही नहीं है और न ही तैयार है अपने दड़बे की कमियों को देखने सुनने के लिए….

ईश्वर का धन्यवाद कि मैं किसी दड़बे में नहीं हूँ, ईश्वर का धन्यवाद् की उसने मुझे ऐसा परिवार दिया जो मानसिक रूप से स्वस्थ व समृद्ध था, चाहे आर्थिक रूप से कमजोर रहे वे | ईश्वर का आभारी हूँ कि मुझे किताबी धर्म और ज्ञान से मुक्त रखा और उसी का परिणाम है कि सम्पूर्ण सृष्टि ही मेरी है और विश्व के सारे दड़बे भी मुझे अपने ही लगते हैं | बस अब मैं उन दड़बों में नहीं रहता | फिर जो पंछी एक बार खुली हवा में आ जाता है, वह किसी पिंजरे में क्यों जाना चाहेगा ? ~विशुद्ध चैतन्य

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