क्या हम उस ओर तो नहीं बढ़ चुके जहाँ मानवता और भावनात्मक सम्बन्ध समाप्त हो जाता है और केवल व्यापार और मशीनों का ही वर्चस्व रहता है ?

Ellora cave complex in Maharashtra, India.प्रकृति ने एक व्यवस्था बनाई और सभी कुछ विशेष कार्य सौंपे | जैसे कि जड़ का काम है वृक्ष को स्थिरता प्रदान करना व जल व अन्य खनिजों की पूर्ति करना, पत्तियों का काम है श्वसन व जड़ को छाया प्रदान करना |
स्त्री कोमलता दी और सौंपा गर्भधारण करना, सहजता से किसी भी कार्य को करने की योग्यता दी और विपरीत परिस्थितयों में धैर्य व रखने का बल दिया | वहीँ पुरुषों को सौंपा चंचलता ताकि वे एक जगह स्थिर होकर न रह जाएँ और जीवन के लिए आवश्यक नए खोज करते रहें | शारीरिक सौष्ठव दिया ताकि आपात काल में शत्रुओं से अपनी व अपने परिवार की रक्षा कर सके |
लेकिन मनुष्य प्रकृति की अपेक्षा से अधिक बुद्दिमान निकला और पुरुषों को गर्भधारण करवाने लगा | अब मान लिया गया कि स्त्री और पुरुषों में कोई भेद नहीं है | जो काम स्त्री कर सकती है वही पुरुष कर सकता है और जो पुरुष कर सकता है वही स्त्री कर सकती है | परिणाम यह हुआ की एक दूसरे की आवश्यकता लगभग नगण्य हो गयी | अब पुरुष को किसी स्त्री की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि खाना बनाना पड़ता है या कपड़े धोने पड़ते हैं | क्योंकि ये सारे काम अब वह स्वयं ही कर लेता है और धनवान हुआ तो मशीन या नौकर रख सकता है |
वहीँ स्त्रियाँ भी वे सारे काम कर लेती हैं जो पहले पुरुष ही करते थे या उनपर निर्भर रहना पड़ता था | इसलिए स्त्रियों को भी पुरुषों की आवश्यकता नहीं रह गई | अब मात्र शारीरिक सुख के लिए ही उन्हें एक दूसरे की आवश्यकता पड़ती है अन्यथा दोनों में से किसी को किसी की आवश्यकता ही नहीं है |
सारांश यह कि क्या हम उस ओर तो नहीं बढ़ चुके जहाँ मानवता और भावनात्मक सम्बन्ध समाप्त हो जाता है और केवल व्यापार और मशीनों का ही वर्चस्व रहता है ? वह प्रेम जिसे हर प्राणी समझता है और पहचानता है क्या वह लुप्त हो जाएगा ? -विशुद्ध चैतन्य

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