क्यों सोचता हूँ मैं….????

“कभी कभी सोचता हूँ कि क्यों सोचता हूँ …???

1016386_661805957198601_1713435344_nजीवन के दो पहलू हैं और जीवन सभी तो जी ही रहें हैं |

किसको किसकी चिंता है ?

साधना करना कहीं व्यक्तिगत है तो कहीं व्यवसाय है |

भीख माँगना कहीं विवशता है तो कहीं व्यवसाय है |

जिस्म बेचना कहीं विवशता है तो कहीं व्यवसाय है |

भूखा रहना कहीं धनाभाव की विवशता है तो कहीं राजनैतिक लाभ के लिए अनशन है |

मानव जीवन अब केवल दो धरातल पर ही टिका है विवशता और व्यवसाय |

जो इन दो से अन्यथा सोचता है वह मेरी तरह पागल हो जाता है |

जिसकी बातें किसी की समझ में नहीं आती और लोग कहते हैं कि अपना इलाज करवाओ |”

-विशुद्ध चैतन्य

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