"यह जगत तो केवल माया है, कौन यहाँ कुछ लेकर आया है !!!"

कहते हैं कि जिसने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह असीम शान्ति से भर जाता है | वह जानता है कि सब कुछ मिथ्या है, कुछ भी सत्य नहीं है | वह शांत चित रहता है, चाहे कोई उसे गालियाँ दे, चाहे निंदा करे, चाहे उसका मकान तोड़े, चाहे उसकी जमीन छीने…. क्योंकि वह जानता है कि ऐसा करने वाले मुर्ख हैं, वे नहीं जानते जिस चीज के लिए वे झगड़ रहें हैं एक दिन सब छूट जाना है | 


कई हज़ार साल पुरानी बात है | किसी गाँव में ऐसे ही एक परमज्ञान को प्राप्त संत अपनी उम्र से भी आधी उम्र कि सुन्दर पत्नी व दो छोटे बच्चों के साथ रहते थे | उनका कभी किसी से कोई विरोध नहीं होता था | उनकी हर ओर जयकार हुआ करती थी, बहुत ही मान सम्मान था उनका | उनके पास से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता था | वे हमेशा कहा करते थे, “यह जगत तो केवल माया है, कौन यहाँ कुछ लेकर आया है !!!”


एक दिन उसके छोटे बेटे ने आकर बताया कि उनके खेत में किसी ने अपना मकान बनवाना शुरू कर दिया है | संत ने कहा कि बेटा कोई बात नहीं वे लोग मुर्ख हैं, नहीं जानते कि सब कुछ एक दिन यहीं छूट जाना है |  उनकी पत्नी को क्रोध आ गया और स्वयं चली गयी उन्हें रोकने | लेकिन पीछे पीछे संत दौड़े दौड़े आये और अपनी पत्नी को पकड़ कर वापस ले आये और बोले, “भाग्यवान, तुम भी आम जनमानस की तरह का व्यवहार करोगी तो लोग क्या कहेंगे ? कि देखो एक संत की पत्नी अज्ञानियों की तरह व्यवहार कर रही है |” पत्नी बेचारी बडबडाती हुई अपनी रसोई में चली गयी |


कुछ दिनों बाद दो निःसंतान दंपत्ति उनके पास आये और उनसे अपने बच्चे दान करने के लिए कहा | संत ने तुरंत अपने दोनों बच्चे उन दम्पत्तियों को सौंप दिए | बच्चे बहुत रोये चिल्लाये, पत्नी बेहोश हो गयी रो रो कर… लेकिन संत तो संत थे | उनपर कोई असर नहीं पड़ा | उनके शिष्यों भक्तों ने उसे बहुत भला बुरा कहा, लेकिन वे तो परमज्ञान को प्राप्त हो चुके थे उन्होंने उनकी बातों का बुरा नहीं माना |


उस घटना के कुछ दिनों बाद  एक युवक वहाँ आया और बताया कि उसकी शादी नहीं हो पा रही है, कोई लड़की देने को ही तैयार नहीं हो रहा उसको क्योंकि वह गरीब है | संत को उसपर दया आ गयी और अपनी पत्नी उसे दान में दे दी | पत्नी ने बहुत हाथ पैर जोड़े, लेकिन संत ने उसे समझाया कि यहाँ कुछ भी अपना पराया नहीं है सभी केवल माया है |इस प्रकार उन संत का सब कुछ चला गया और एक दिन उन्हें गाँव छोड़ कर जाना पड़ा |


वे एक छोटी से टूटी फूटी नाव में नदी पार कर रहे थे और अभी बीच नदी में ही पहुँचे थे कि कुछ बदमाश एक दूसरी नाव से वहां पहुँच गए और बोले कि यह नाव हमारी है, तुरंत हमें वापस करो नहीं तो बहुत बुरा होगा | संत बोले, “यह नाव तो केवल माया है, कौन यहाँ कुछ लेकर आया है” यह कहकर नाव से नदी में कूद गये और पानी की गहराई में विलीन हो गये |


इस कहानी से आपने क्या समझा ???


यह कहानी कुछ वैसी ही है जैसी कि हमारे ज्ञानीजन हमें समझाते रहते हैं | लेकिन समझने और समझाने वाले मूल तत्व को नहीं पकड़कर केवल खोल को पकड़ लेते हैं | परमज्ञान प्राप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि हम सृष्टि के मायावी खेल को न खेलें | यदि ऐसा ही होता तो श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए न कहते | वह भी कह सकते थे कि सब माया है, कौन यहाँ कुछ लेकर आया है | राम सीता के लिए मारे मारे वन में न फिरते और रावण का वध न करते | वह भी कह सकते थे कि सब माया है, कौन यहाँ कुछ लेकर आया है |


जिस प्रकार हर खेल के कुछ सिद्धांत होते हैं, नियम होते हैं, ठीक उसी प्रकार जीवन के भी कुछ नियम हैं | भजन कीर्तन मन को शान्ति प्रदान करते हैं, लेकिन जब तक जीवन है उस जीवन को सुचारू रूप से चलाने के इए आवश्यक भौतिक वस्तुओं व सह्जनो कि सुरक्षा का दायित्व भी हमारे ऊपर रहता है | उसका पालन करना भी आवश्यक है | आपके पास इतना विवेक होना ही चाहिए कि कब और किस बात का विरोध करना है और कब नहीं करना है समझ पायें | आपके पास विवेक होना चाहिए कि कब उग्र होना है और कब शांत वह समझ पायें | क्योंकि जल और अग्नि दोनों ही आवश्यकता है जीवन के लिए, केवल जल से जीवन नहीं चल सकता |


सृष्टि के निर्माण में भी पंचतत्वों की आवश्यकता पड़ती है और हम भी पंचतत्वों से ही निर्मित हैं | यदि यही मान कर चलें कि यह तो सब मिट जाना है तो पैदा होते ही आत्महत्या कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह शरीर भी एक दिन मिट जाना है तो काहे को इतना खर्चा करें उसके देख रेख में ? -विशुद्ध चैतन्य  
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