आज अकेले ही सही

सुप्रभात शुभ आत्मन | आप सभी के लिए आज का दिन मंगलमय हो !
1623711_285481261576530_1639337126_nकहते हैं कि ज्ञान हमें विनम्र बनाता है | कहते हैं कि धर्म हमें अहंकार से मुक्त होने में सहायक होता है व सभी के लिए प्रेम का भाव उत्पन्न करता है |
लेकिन मैंने जो अनुभव किया वह यह कि जिस ज्ञान से व्यक्ति में विनम्रता आ सकता था वह विलुप्त हो गया और उसके स्थान पर व्यावहारिक व भौतिक ज्ञान का महत्व बढ़ गया | व्यावहारिक में भी अंग्रेजी, कॉमर्स व साइंस जैसे विषय की अब ज्ञान के पर्याय बन चुके हैं |
धर्म व्यक्ति को कितना उपद्रवी व अहंकारी बना देता है वह इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर से पता चलता है | धर्म के नाम पर धमकी देने से लेकर दूसरों को उकसाने व लड़ाने तक के काम हो रहें हैं लेकिन सभी कुछ धर्म के ठेकेदारों के नजर में वैध हैं | क्योंकि उनके लिए धर्म राजनैतिक व आर्थिक स्वार्थपूर्ति का माध्यम मात्र है न कि समन्वयता व सौहार्द की भावना का विकास | इनका सारा रुझान इस बात पर रहता है कि कैसे देश में दंगा भड़के और लोगों की चिताओं और लाशों के पर राजनीति करके अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकी जा सके |
तो, न ज्ञान से विनम्रता आती है और न धर्म से मानवीय प्रेम व सौहार्द की भावना विकसित होता है | इसलिए जो लोग स्वयं को ज्ञानी मानते हैं वे या तो अहंकारी होंगे या कायर | जो लोग स्वयं को धार्मिक मानते हैं, वे या तो अत्याचारी या दंगाई होंगे या कायर | पर मानवीय गुण उनमें विकसित होने में कई जन्म और लगेंगे |
इसलिए आज मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ कि उसने न तो मुझे ज्ञानी बनाया और न ही धार्मिक | उसने मेरे लिए आध्यात्म का मार्ग चुना और मुझे प्रेरित किया कि मैं ज्ञानी या धार्मिक भेड़ों के झुण्ड से अलग एकांत वास कर आत्मसाक्षात्कार करूँ | उसके बाद अन्तः प्रेरणा से जो उपयुक्त लगे उस दिशा में बढ़ूँ न कि भेड़ों के झुण्ड के साथ झूठी धार्मिकता व ज्ञान के नारे लगाऊँ |
मैंने अतःप्रेरणा से जनकल्याण का जो मार्ग चुना है वह अन्य राजनैतिक व आर्थिक लाभ के उद्देश्य से बने जनकल्याण संगठनों से पुर्णतः अलग है | मैं जिस संस्था की नींव रखने जा रहा हूँ उसमें स्वार्थी, व्यवसायी, राजनैतिक व तथाकथित कट्टर धार्मिक मानसिकता के व्यक्तित्वों के लिए कोई स्थान नहीं होगा | यह एक ऐसी संस्था होगी जिसका उद्देश्य राजनीतिज्ञों को लाभ पहुँचाना नहीं, अपितु राष्ट्र को सबल व आत्मिनिर्भर बनाना होगा | राष्ट्र को आत्म-निर्भर बनाने का अर्थ यह नहीं कि मैं स्वयं भूखा नंगा रहूँगा या संस्था में कार्यरत लोगों को केजरीवाल या गांधी जैसा आम आदमी का मुखौटा डालकर घूमना पड़ेगा | इस संस्था में सभी समान रूप से विकसित होंगे लेकिन सहयोगी भाव के साथ विकसित होंगे |
यदि एक के पास धन है तो वह धन से सहयोग करेगा और दूसरे के पास बल है तो वह बल से सहयोग करेगा | चूँकि केंद्र में संस्था रहेगी इसीलिए न धनवान बलवान का दुरुपयोग कर सकेगा और न ही बलवान धनवान का दुरूपयोग कर सकेगा | यह संस्था सदस्यों को धन या बल के आधार पर नहीं, आध्यात्मिक व राष्ट्रीय चिंतन के आधार पर सदस्य के रूप में मनोनीत करेगी |
आज मैंने निश्चय कर लिया है कि शीघ्रातिशीघ्र इस संस्था की नींव रख दी जाए व अब उस विशिष्ट व्यक्ति की प्रतीक्षा (जिसकी प्रतीक्षा में बचपन से करता रहा) न कर अपने उद्देश्य को साकार रूप दे दूं | हो सकता है कि वह विशिष्ट व्यक्ति ने इस बार मेरे साथ जन्म नहीं लिया और अगले किसी जन्म में उससे भेंट हो जाए | तब मेरे उद्देश्य को बल व उत्साह मिल जाए | लेकिन अभी कम से कम मैं और प्रतीक्षा नहीं कर सकता |
लेकिन आशा करता हूँ कि अगले जन्म में उसका साथ मिल जाएगा इस संस्था को सम्पूर्ण सामर्थ्य व प्रभाव के साथ काम करने योग्य होने के लिए | तब तक मैं अपने आसपास के ग्रामीणों को ही जितना हो सके लाभ पहुँचाने का प्रयत्न करूँगा |-विशुद्ध चैतन्य

READ  फिर भी खुद को धार्मिक, सात्विक कहते हो.....??

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