क्या कायरों और पलायनवादियों को ब्रम्ह या मोक्ष उपलब्ध हो सकता है कभी ?

Bodhidharman

बोधिधर्मन

Bodhidharma was a Buddhist monk who lived during the 5th or 6th century CE. He is traditionally credited as the transmitter of Ch’an (Sanskrit: Dhyāna, Korean: Seon, Japanese: Zen) to China, and regarded as its first Chinese patriarch. According to Chinese legend, he also began the physical training of the Shaolin monks that led to the creation of Shaolinquan.

– Courtesy: wikipedia

बोधिधर्मन वह नाम जो भारत से निकला और चीन पहुँचा और जाना जाने लगा बोधिधर्मा के नाम से | बुद्ध की अहिंसा की शिक्षा का प्रचार प्रसार करते हुए बोधिधर्मन ने जो महत्वपूर्ण शिक्षा दी वह यह कि अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं है | सन्यास का अर्थ निष्क्रियता नहीं है | धार्मिक होने का अर्थ अधर्मियों के सामने नतमस्तक होना नहीं है | ईश्वर प्राप्ति का मार्ग असहाय, निर्बल और भाग्यवादी होना नहीं है |
उन्होंने चिकित्सा के साथ आत्मरक्षा और अत्याचार का विरोध करने की शिक्षा दी | उन्होंने स्वयं को शारीरिक व मानसिक रूप से सक्षम बना कर असहायों की अत्याचारियों से रक्षा करने की शिक्षा दी |
लेकिन दुर्भाग्य से हमारे ही देश के इन महान व्यक्तित्व के आदर्श को हम नहीं अपना पाए | हमने सन्यास लिया मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए | हमने सन्यास लिया हरामखोरी के लिए | हमने सन्यास लिया अपनी कायरता को छुपाने के लिए | हमने सन्यास लिया क्योंकि मृत्यु से हमें भय लगता है….. इसलिए हम मोक्ष पाना चाहते हैं, इसलिए हम ब्रम्ह को उपलब्ध होना चाहते है, इसलिए हम जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति चाहते हैं…. | क्या कायरों और पलायनवादियों को ब्रम्ह या मोक्ष उपलब्ध हो सकता है कभी ?
कुछ लोग निडर व साहसी होने का ढोंग करते हैं | वे किसी निर्बल असहाय की सहायता करने के लिए कभी आगे नहीं बढ़ते लेकिन परधर्म निंदा, जातिवाद, नेतावाद, पार्टीवाद में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं | वे भीड़ में मुँह छुपाकर निकलते हैं और निर्बलों, निशस्त्रों, अबलाओं पर अत्याचार करते हैं | वे धर्म की ओट में द्वेष के बीज बोते हैं और आपस में फूट डालते हैं | ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है | इन लोगों को न तो धर्म व समाज का कोई ज्ञान होता है और न ही राष्ट्र व मानवता के हितार्थ कोई कार्य कर पाते हैं कभी |
कोई गृहस्थ है या बैरागी, यदि वह केवल अपने स्वार्थ (मोक्ष, ब्रम्ह, ईश्वर की प्राप्ति…आदि) या केवल अपने बीवी-बच्चे अपने परिवार के विषय में ही चिंतन कर रहा है तो वह न तो धार्मिक है और न ही सन्यासी | यह माना जा सकता है कि उसका पशु योनी से मानव योनी में अभी आगमन हुआ है और कई जन्म अभी और लेना पड़ेगा उसे मानवता को समझने में व मानव होने में | ऐसे लोगों के लिए मोक्ष व ब्रम्ह तो बहुत दूर की बात है जो अभी मानव ही नहीं बन पाए | क्योंकि अपने और अपने परिवार के लिए तो पशु भी जी लेते हैं और बच्चों की देख-रेख व शिक्षा हर पशु पक्षी ऐसे मानवों से कई गुना अधिक अच्छी तरह कर लेते हैं |
लेकिन यदि कोई मानव दूसरों के साथ सहयोगी का भाव रखता है तो वह गृहस्थ होते हुए भौतिक सुख भोगते हुए भी सन्यासी है | ~विशुद्ध चैतन्य
 

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