आज इस देश में धर्म "नाम" की "दुकान" "सज संवरकर" तैयार रहती हैं अपनी "निजी इच्छाओं" की पूर्ति के लिए !

(1) ०४ दिसंबर २०१२ को लिखा गया यह लेख… – Purushottam N. Koranne

@ सीधे दिल से……..जो समझा वो लिखा……..बुरा लगे तो क्षमा !!!!

धर्म के नाम पर तथा इसका “सहारा” लेकर अपनी “विचारधारा” को धर्म के उपदेश बताने का “प्रचलन चरम” पर हैं ! आज इस देश में धर्म “नाम” की “दुकान” “सज संवरकर” तैयार रहती हैं अपनी “निजी इच्छाओं” की पूर्ति के लिए ! संत,प्रवचनकार,महाराज या बाबा बनकर मंदिरों और मठों के “माध्यम” से अपनी जरूरतों को पूरा करने का सशक्त माध्यम हैं मंदिर,मठ और आश्रम ! इस प्रकार की “धार्मिक विकृति” सिर्फ और सिर्फ हिंदू धर्म में नहीं बल्कि मुस्लिम तथा ईसाई धर्म में भी “व्याप्त” हैं ! सिख पंथ में ऐसे “उदाहरण” देखने को नहीं मिलते हैं पर जैनमत में ऐसे “धर्म” के “नाम” पर “बोली” लगाने के “असंख्य” “उदाहरण” हैं !

स्वयं को “पूजाने” और “सदगुरू” कहलाने की “इच्छा” के कारण हम “धर्म” को बदनाम करते जा रहे हैं और इसका “मजाक” बनाते और उड़ाते जा रहे हैं ! योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा उपदेशित गीता, आद्यगुरु शंकराचार्य के “अद्वैत सिद्धांत”, स्वामी विवेकानंद के उपदेश और संत कबीरदास की वाणी का “मर्म” और “जीवन दर्शन” भूलकर हम आज के “स्वांगी और प्रपंची” तथा “आडंबरी” लोगों के “चक्कर” में उलझकर अपने जीवन के “हेतु” और “पथ” से “भ्रष्ट” हो रहे हैं ! देश में “व्याप्त” “आर्थिक भ्रष्टाचार” को “ख़त्म” करने की “माँग” “पुरजोर” तरीके से उठ रही हैं पर समाज में “बढ़ते” “नैतिक भ्रष्टाचार” पर कोई बात नहीं करना चाहता ! जिसके लिए “सार्थक” “पहल” की आवश्यकता हैं जिसकी “शुरुवात” हमें “स्वयं” से करनी होगी अपने “मनोविकारों” तथा “स्वार्थ” को “त्याज्य” करने से !

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मैं ज्योतिष विधा से संबंधित व्यक्ति हूँ पर मानसिक कष्ट होता हैं जब “परिलक्षित” होता हैं की “वेदांग ज्योतिष विज्ञान” आधुनिक स्वार्थी लोगों ने अपनी “निजी” जरूरतों की “पूर्ति” का “माध्यम” बना लिया हैं ! ज्योतिष विज्ञान “जीवन दर्शन” में “सहायक” हैं पर आजकल यह “डर” का “पोषक” हैं ! ज्योतिष की दुकान में “डर और स्वार्थ” को सजाया तथा बेचा जा रहा हैं ! उपाय,गंडे,ताबीज से मनुष्य के “कर्मफल” को “परिवर्तित” करने का “दिवास्वप्न” दिखाकर आधुनिक “ज्योतिष कम दुकानदार” अपनी “सजाई” दुकान का माल बेच रहे हैं ! स्वयं के “स्वार्थ केंद्र” में “आसक्त” मनुष्य इनकी “खोखली दलीलों” से “प्रभावित” होकर अपने “दुःख दर्दों” की “सुपारी” इन्हें देते हैं “तंत्र-मंत्र-यन्त्र” के “निमित्त” ! यदि “यन्त्र-मंत्र-तंत्र” या “जादूटोने” से मनुष्य का “भाग्य या कर्मफल” परिवर्तित हो सकता तो ज्योतिष या तांत्रिक स्वयं “ऐश्वर्य परिपूर्ण” होते और देश के “शासक” भी ! किसी भी “मंत्र” की “गर्भ” “शक्ति” और अन्य “माध्यम” आपके “मनोबल और आत्मिक बल” में “वृद्धि” मात्र कर सकते हैं आपके “दुष्कर” समय में “संबल” के निमित्त !

आज आवश्यकता “देह बुद्धि” के त्याग की तथा “विवेक बुद्धि” को जागृत करने की हैं पर उसके लिए जरुरी हैं की “हम” भगवान को “मंदिर या मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्तियों” में तथा “आधुनिक स्वांगी संतों,मठाधीशों,प्रवचनकारों,महाराजों,साधुओं” में “खोजने” की “बजाय” “स्वयं” एवं” “पर” “आत्मा” तथा “दीन-हीन” और “जरुरतमंदों” में “खोजे” और “आत्मानंद” प्राप्त करे !

“मंदिरों के बुतों को तराशा हैं इंसान की ही जरूरतों ने

अब वक्त हैं खुद में छिपे ब्रह्म को खोजने का………………”

-आनंद का राही

इदं दत्तं न मम

आनंद आनंद आनंद

श्री गुरुदेव दत्त

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