मैंने तुझे दुनिया में भेजा था कि तू मुझे लोगों से जोड़ना, तूने तो तोड़ना शुरू कर दिया !

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मोज़िज़ एक जंगल से गुजरते हैं और एक आदमी को प्रार्थना करते देखते हैं। एक गड़रिया गरीब आदमी, फटे चीथड़े पहने हुए भगवान से प्रार्थना कर रहा है। महीनों से नहाया नहीं होगा, ऐसी दुर्गंध आ रही है। अब भेड़ों के पास रहना हो तो नहा-धोकर रह भी नहीं सकते। दुर्गंध का अभ्यास करना होता है। बड़ी दुर्गध आ रही हैं। उस आदमी से–भेड़ की दुर्गंध आ रही है। चारों तरफ भेड़ें मिमिया रही हैं। और वह बैठा वहीं प्रार्थना कर रहा है। वह क्या कह रहा है, वह भी बड़े मजे की बात है। मोज़िज़ ने खड़े होकर सुना। वह बहुत हैरान हुए। उन्होंने बहुत प्रार्थना करनेवाले देखे थे, ऐसा आदमी नहीं देखा। वह भगवान से कह रहा है कि “हे भगवान, तू एक दफे मुझे बुला ले। ऐसी तेरी सेवा करूंगा कि तू भी खुश हो जाएगा। पांव दबाने में मेरा कोई सानी नहीं। पैर तो मैं ऐसे दबाता हूं कि तेरा भी दिल बाग-बाग हो जाए। और तुझे घिस-घिसकर नहलाऊंगा और तेरे सिर में जुएं पड़ गए होंगे तो उनकी भी सफाई कर दूंगा।’ अब उसके बेचारे के सिर में पड़े होंगे, तो स्वभावतः आदमी अपनी ही धारणा से भगवान को सोचेगा। “तेरे जुएं पड़ गए होंगे, वे भी बीन दूंगा। पिस्सू इत्यादि तेरे शरीर पर चढ़ जाते होंगे, पता नहीं कोई फिक्र तेरी करता है कि नहीं करता. . .।

मोज़िज़ के लिए तो बरदाश्त के बाहर हो गया कि यह आदमी क्या कह रहा है ! और कहा कि मैं रोटी भी अच्छी बनाता हूं, शाक-सब्जी भी अच्छी बनाता हूं। रोज भोजन भी बना दूंगा। थका-मांदा आएगा, पैर भी दाब दूंगा, नहला भी दूंगा। तू एक दफा मुझे मौका तो दे।

मोज़िज़ के बरदाश्त के बाहर हो गया, जब उसने कहा कि जुएं तेरे बीन दूंगा और तेरे शरीर पर गंदगी जम गयी होगी, घिस-घिस कर साफ कर दूंगा और पिस्सू इत्यादि पड़ ही जाते हैं, पता नहीं कोई तेरी वहां फिक्र करता है कि नहीं. . .। मोज़िज़ ने कहा :”चुप ! चुप ! शैतान ! तू क्या बातें कर रहा है? तू किससे बातें कर रहा है? भगवान से?

और उस आदमी की आंख से आंसू बहने लगे। वह आदमी तो डर गया। उससे कहा कि मुझे क्षमा करें। कोई गलत बात कही?

मोज़िज़ ने कहाः गलती बात ! और क्या गलती हो सकती है–भगवान को जुएं पड़ गए, पिस्सू हो गए ! उसका कोई पैर दबानेवाला नहीं ! उसका कोई भोजन बनानेवाला नहीं ! तू भोजन बनाएगा? और तू उसे घिस-घिसकर धोएगा? तूने बात क्या समझी है? भगवान कोई गड़रिया है?

वह गड़रिया रोने लगा। उसने मोज़िज़ के पैर पकड़ लिए। उसने कहाः मुझे क्षमा करो ! मुझे क्या पता, मैं तो बेपढ़ा-लिखा गंवार हूं। शास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है, अक्षर सीखा नहीं कभी, यहीं पहाड़ पर इसी जंगल में भेड़ों के साथ ही रहा हू, भेड़िया हूं, मुझे क्षमा कर दो ! अब कभी ऐसी भूल न करूंगा। मगर मुझे ठीक-ठीक प्रार्थना समझा दो।

तो मोज़िज़ ने उसे ठीक-ठीक प्रार्थना समझायी। वह आदमी कहने लगा : यह तो बहुत कठिन है। यह तो मैं भूल ही जाउंगा। यह तो मैं याद ही न रख सकूंगा। फिर से दोहरा दो।

फिर से मोज़िज़ ने दोहरा दी। वे बड़े प्रसन्न हो रहे थे मन में कि एक आदमी को राह पर ले आए–भटके हुए को। वह आदमी फिर बोला कि एक दफा और दोहरा दो। वह भी दोहरा दी। और फिर जब मोज़िज़ जंगल की तरफ अपने रास्ते पर जाने लगे, बड़े प्रसन्न भाव से, तो उन्होंने बड़े जोर की आवाज में गर्जना सुनी आकाश में और भगवान की आवाज आयी कि मोज़िज़, मैंने तुझे दुनिया में भेजा था कि तू मुझे लोगों से जोड़ना, तूने तो तोड़ना शुरू कर दिया !

अभी गड़रिए की घबड़ाने की बात थी, अब मोज़िज़ घबड़ाकर बैठ गया, हाथ-पैर कांपने लगे। उन्होंने कहाः क्या कह रहे हैं आप, मैंने तोड़ दिया ! मैंने उसे ठीक-ठीक प्रार्थना समझायी।

परमात्मा ने कहाः ठीक-ठीक प्रार्थना का क्या अर्थ होता है? ठीक शब्द? ठीक उच्चारण? ठीक भाषा? ठीक प्रार्थना का अर्थ होता हैः हार्दिक। वह आदमी अब कभी ठीक प्रार्थना न कर पाएगा। तूने उसके लिए सदा के लिए तोड़ दिया उसकी प्रार्थना से मैं बड़ा खुश था। वह आदमी बड़ा सच्चा था। वह आदमी बड़े हृदय से ये बातें कहता था और रोज कहता था। मैं उसकी प्रतीक्षा करता था रोज कि कब गड़रिया प्रार्थना करेगा। ऐसे तो तेरे जैसे बहुत लोग प्रार्थना करते हैं। उनकी प्रार्थना की मैं प्रतीक्षा नहीं करता। वे तो बंधी-बंधायी, पिटी-पिटायी बातें हैं। वे रोज वही-वही कहते रहते हैं। यह आदमी हृदय से कहता था। यह आदमी ऐसे कहता था जैसा प्रेमी कहता है। और फिर बेचारा गड़रिया है, तो गड़रिए की भाषा बोलता है। तू वापिस जा, उससे क्षमा मांग। उसके पैर छू, और उसे राजी कर कि वह जैसा करता था वैसा ही करे। तेरी प्रार्थना वापिस ले।

यह यहूदी कथा बड़ी प्यारी है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे शब्द क्या हैं। इससे ही फर्क पड़ता है कि तुम क्या हो। तुम्हारे आंसू सम्मिलित होने चाहिए तुम्हारे शब्दों में। जब तुम्हारे शब्द तुम्हारे आंसुओं से गीले होते हैं, तब उनमें हजार-हजार फूल खिल जाते हैं।

❇ अजहूं चेत गंवार, प्रवचन # १३, ओशो❇

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