मुझे भी दुःख होता था जब मैं जवान था, कि मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है

नफरतों का खेल इतना व्यापक रूप से फ़ैल चुका है कि अब यह महामारी का रूप ले चुकी है | आजकल देख रहा हूँ कि बुद्ध के अनुयाई भी इसी खेल में शामिल हो रहे हैं और ब्राहमणों के विरुद्ध जितना ज़हर उगल सकते है उगल रहे हैं | अगर ये लोग यह समझ रहे हैं कि बदला लेने का यही तरीका है तो फिर न बुद्ध को समझे और न ही बौद्ध हुए | पहले बुद्ध को समझो, फिर उनके दिखाए मार्ग को जानो…. इन दड़बों के खेल से बाहर निकलो, तभी वास्तव में बुद्ध का सम्मान होगा | वरना तो बौद्ध पंथ भी पंथ न रहकर इस्लाम, ईसाई, हिन्दू आदि की तरह पोखर और दड़बा बनकर ही रह जायेगा और फिर आध्यात्मिक उत्थान के सारे मार्ग बंद हो जायेंगे | यह भी ठेकेदारों के हाथों में चला जाएगा और फिर सिवाय नफरत और दंगों के कुछ नहीं रह जाएगा इसमें |

अगर हम थोड़े भी होश में आ जाएँ और ध्यान दें तो समझ पाएंगे कि नफरतों से भरे नेता और पार्टियाँ अधिक सफल होते हैं | जो जितना नफरत फैलाए, जितना उत्पात मचाये वह उतना ही महान नेता कहलाता है | आइसिस, अलकायदा, सिम्मी, रामसेना, कृष्ण सेना, बजरंग दल… आदि से लेकर हिन्दू धर्म सभा और अन्य धर्मो के नाम पर बनी संस्थाएं व संगठन सभी नफरत के कारोबार में लिप्त हैं | शायद यही कारोबार आज सबसे सफल कारोबार है क्योंकि हर व्यक्ति भीतर ही भीतर न जाने कितने क्रोध व नफरत पाले बैठा हुआ है | बचपन में जबरदस्ती स्कूल भेज दिया यह कहकर कि पढ़ाई करोगे तो नौकरी मिलेगी… बड़े होने के बाद बेरोजगार होने का तमगा मिल गया | अब इस लायक भी नहीं कि खुद का ही कोई रोजगार खोल लें क्योंकि डिग्री बड़ी महँगी वाली ले रखी है | कोई क्या कहेगा यदि ढाबा खोल लिया या चाय की दूकान खोल ली तो ?

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फिर जलन है पडोसी से, फिर जलन है खुबसूरत लडकियों को लेकर घुमने वालों से, फिर जलन है महँगी गाड़ी और कोठी रखने वालों से, फिर जलन है अच्छे ओहदों में बैठे लोगों से…. तो हर व्यक्ति के भीतर इतना नफरत भरा हुआ है कि नफरत के सौदागरों को ग्राहक बिलकुल वैसे ही मिल जाते हैं, जैसे कहीं कोई शराब का ठेका खुल जाये तो ग्राहक मिल जाते हैं शराब के ठेके वाले को |

मुझे भी दुःख होता था जब मैं जवान था, कि मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है | मुझे भी जलन होती थी अपने उन साथियों से जो मुझसे भी कम उम्र के थे लेकिन उनकी शादियाँ ही नहीं, बच्चे भी हो गये थे और कोई लड़की मुझे घास डालने को तैयार ही नहीं थी क्योंकि मैं अनपढ़ था और ऊपर से मुझे अंग्रेजी भी नहीं आती थी, फिर सरकारी नौकरी भी नहीं थी… तो मुझे भी लगता था कि यह दुनिया बेकार है | मुझे भी लगता था कि जीने का कोई कारण ही नहीं बचा अब… लेकिन एक दिन खुद से ही प्रश्न किया कि क्या मेरा जन्म लड़की खोजने के लिए ही हुआ है ? क्या लड़की नहीं मिली तो जीवन व्यर्थ हो गया ? क्या जीवन का उद्देश्य शादी करना, बच्चे पैदा करना और उनकी शादी करवाना ही है ?

जब भीतर से उत्तर मिला कि लड़की जीवन में महत्वपूर्ण नहीं है, स्वयं को जानना ही जीवन में महत्वपूर्ण है | लड़की मिले न मिले जीवन को व्यर्थ मत करो… कुछ न भी करो तो कम से कम मरने से पहले खुद को खोज लो | बस उस दिन से लड़की की खोज बंद हो गयी और आज जानता हूँ कि मैं गलत दिशा में दौड़ रहा था इसलिए परेशान था | अब मुझे लड़कियों के सपने नहीं आते… अब नफरत तिरोहित हो गया समाज के प्रति जो था | अब नफरत नहीं रही दूसरे किसी भी सम्प्रदाय से | अब नफरत नहीं रही स्वयं से भी | हाँ जो गलत करते हैं दूसरों के प्रति, उनके लिए अभी भी नफरत बची हुई है | हो सकता है कि एक दिन मैं भी राजनेताओं की तरह बुद्धत्व को प्राप्त कर लूँ और भ्रष्टाचारी, घोटालेबाजों, अपराधियों, दंगाइयों को गले लगा पाऊँ, उन्हें फूल माला पहना पाऊँ |

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तो यदि हम सभी स्वयं को खोजने में अपना समय लगायें तो मेरा मानना है कि नफरत के कारोबारियों की दुकाने बंद की जा सकतीं हैं | और स्वयं को जानने का सबसे बेहतर उपाय है ध्यान | और कोई विधि इतनी कारगर नहीं है जितनी की ध्यान, त्राटक आदि | सोते समय स्वयं से प्रश्न करें, “मैं कौन हूँ और दुनिया में क्यों आया हूँ ?” ~विशुद्ध चैतन्य

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